Monday, 25 July 2011

जिसे होना चाहिए था मीडिया के निशाने पर उसी ने लिया मीडिया को निशाने पर


कमजोर, अक्षम और ईमानदार समझे जाने वाले प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह, भारत की मीडिया से नाराज हैं, इसलिए अपनी नाराजगी उन्होंने यह कहकर व्यक्त की है कि भारत का मीडिया, खुद ही अपील, दलील और मुंसिफ की भूमिका निभा रहा है। क्षेत्रीय अखबारों के सम्पादकों से उन्होंने यह शिकायत करते हुए कहा है कि मीडिया आरोप भी लगाता है, मुकदमा भी चलाता है और फैसला भी खुद ही सुना देता है।

डा0 मनमोहन सिंह यह भूले हुए हैं कि मीडिया तो विगत 2004 से यह नजरअन्दाज किये बैठा है कि डा0 सिंह को तो प्रधानमंत्री के पद पर होना ही नहीं चाहिए था। जिन मान्य परम्पराओं, संवैधानिक व्यवस्था और चुने हुए सांसदों की छाती पर पैर रख कर वह प्रधानमंत्री के पद पर बैठे हैं, उनकी इस करनी से तो हमारे लोकतन्त्र की धज्जियॉं ही उड़ गई हैं, बावजूद इसके मीडिया ने आजतक इस घपले को दबाये रखा है। मीडिया ने आज तक कहाँ शोर मचाया कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति लोकतंत्र और संविधान का मजाक उड़ाते हुए कितनी बेशर्मी से शासन कर रहा है. इतने बड़े लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति लोकतंत्रिक तरीके के बजाय मनोनयन के बल पर भारत की सत्ता अपनी हठधर्मिता और मनमर्जी से चला रहा है।

मीडिया के प्रति ऐसी तल्ख टिप्पणी करने वाले डा0 मनमोहन सिंह ने क्या कभी अपने गिरेबां में झांका है? या कभी गम्भीरता से सोचा है कि इस देश के प्रधानमंत्री का पद कोई खैरात में दी जाने वाली वस्तु नहीं है कि लोकसभा में चुनकर आये कांग्रेसी सांसदों के संसदीय दल की अध्यक्षा सोनिया गॉंधी चुनी जायें और वह संसदीय दल के नेता का पद डा0 मनमोहन सिंह को गिफ्ट कर उन्हें प्रधानमंत्री बना दें। प्रधानमंत्री का पद कोई गिफ्ट की वस्तु नहीं है। कहा जाता है कि सोनिया गॉंधी के इशारे पर मनमोहन सिंह चल रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि सोनिया गॉधी मनमोहन के इशारे पर उसी दिन से चल रही हैं, जिस दिन वह प्रधानमंत्री की शपथ लेने जा रही थीं और रास्ते में एक विदेशी कॉल ने सोनिया को मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाने और उनके इशारे पर चलने को मजबूर कर दिया।

क्या यह चुनी हुई लोकसभा के सांसदो के उस अधिकार का सीधा हनन नहीं है जो उन्हें आम मतदाता से मिला है। जनता ने उन्हें इस विश्वास के साथ सांसद बनाया था कि वे संसद में जायें और सांसदों के सबसे बड़े दल में से उसके मुखिया को चुनें और उसे भारत का प्रधानमंत्री बनायें। डा0 साहब गलतफहमी में हैं और जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं, इसीलिए वह गाहे-बगाहे सभी को धौंस में लेने की कोशिश करते रहते हैं। कौन कहता है कि वह एक कमजोर, अक्षम और ईमानदार प्रधानमंत्री हैं। वह जब चाहते हैं सुप्रीम कोर्ट को हड़काने लगते हैं, और जब चाहे मीडिया को। यह बात दीगर है कि सुप्रीम कोर्ट उनके हड़काने में न तो आया है और ना ही आयेगा। ऐसा ही चरित्र इस मीडिया का भी है।

क्षेत्रीय अखबारों के कुल पॉंच सम्पादकों के साथ बैठकर उन्हें पटा लेना और अपनी बात उनके मुख से निकलवा लेना अलग बात है। लेकिन सम्पूर्णं मीडिया को अपनी तड़ी में लेना कोई गुड़िया-गुड्डे का खेल नहीं है। सिविल सोसाइटी के पॉच व्यक्तियों से बात करना प्रधानमंत्री को नागवार लगता है लेकिन इतने बड़े मुल्क के भारी-भरकम मीडिया में से केवल पॉच सम्पादकों से वह भी क्षेत्रीय स्तर के अखबारों से वार्ता किये जाने पर वह अपने आपको आह्लादित महसूस कर रहे हैं। यह कृत्य न तो ईमानदारी के बैनर तले आता है, ना ही निर्बलता के तहत और ना ही यह दर्शाता है कि वे एक अक्षम प्रधानमंत्री हैं। इस सबसे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि वे एक निहायती चालाक, बुद्विमान, क्रूर और कपटी राजा हैं। इसमें कहीं से भी ईमानदारी नाम की कोई चीज दिखाई नहीं देती।

मीडिया को प्रधानमंत्री कैसे गलत ठहरा सकते हैं, जब वह खुद ही सारी मान्य परम्पराओं और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को धता बताते 2004 से शासन करते-करते डा0 मनमोहन सिंह इतने मजबूत हो चुके हैं कि अब चाहकर भी सोनिया गॉंधी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। सोनिया और राहुल गॉंधी भूल जायें कि डा0 मनमोहन सिंह के रहते हुए  वे हिन्दुस्तान के कभी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। प्रधानमंत्री के पद पर ठीक सीवीसी थॉमस की तरह बैठे हैं जिनका पद उच्चतम न्यायालय ने शून्य घोषित कर दिया था। यदि वह वास्तव में ईमानदार हैं तो लोकतन्त्र को अपनी गरिमा में बनाये रखने के लिए उन्हें अपने पद से स्वंय इस्तीफा दे देना चाहिए।

विश्व के दरोगा अमेरिका के लिए डा0 मनमोहन सिंह से इतर कोई दूजा बढ़िया प्रतिनिधि हो ही नहीं सकता सिवाय मोंटेक सिंह आहलूवालिया के। अभी हिन्दुस्तान में ऐसा भी मीडिया है जिसका प्रबन्धतंत्र विदेशी सोसाइटी के हांथ में नहीं है, जिसका पत्रकार विदेश घूमने का शौकीन नहीं है, जो सत्ता की दलाली बरखा दत्त, प्रभु चावला और वीर संघवी की तरह नहीं कर रहा है, एवं जिसके प्रबन्धतंत्र के पास विदेशी सोसाइटियों से ब्लैंक चेक नहीं आ रहे हैं।

दरअसल उस मीडिया से डा0 मनमोहन सिंह को विषेश आपत्ति है जिसे वह धौंस देकर चुप नहीं करा पा रहे हैं, इसीलिए चाटुकार पत्रकारों को उन्होंने न्यौता दिया। इसे प्रधानमंत्री की अकर्मण्यता कहिए या संलिप्तता कि उन्हीं के नेतृत्व में 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाला हुआ ;हवा में पैसे बनाने का खेल, उन्हीं की सरपरस्ती में कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला बदस्तूर चालू रहा, उन्हीं के निर्देश पर सीवीसी पद पर थॉमस जैसे भ्रष्टतम व्यक्ति की नियुक्ति हुई। इसके बावजूद भी वह अपने को ईमानदार मानने के मुगालते में हैं तो यह उनका भ्रम है। ये सारे घोटाले मीडिया के दबाब में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस में लिए हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को भी के0जी0बालाकृष्णनन कैसी स्थिति में छ़ोडकर गये थे यह वहॉं के मुख्य न्यायाधीश एच0एस कपाड़िया से बेहतर और कौन जान सकता है।

डा0 मनमोहन सिंह, मीडिया के क्षेत्र में आई जबरदस्त क्रान्ति से परेशान हैं। इलैक्ट्रानिक मीडिया, पल-पल की खबरों को बड़ी तत्परता से लोगों तक तुरत-फुरत पहुचाने का काम कर रहा है। इस अफरा-तफरी में और प्रभु चावला जैसे धुरन्धरों द्वारा मीडिया में अपरिपक्व और कम पढ़े-लिखे लोगों की एन्ट्री ने उसे इस मुकाम पर पहुंचा दिया है कि मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव जैसे लोगों का इन्टरव्यू एक सोलह साल की लड़की लेती है अथवा ऐसा लड़का जो सिर्फ दलाली का काम करता है, के कारण कुछएक गल्तियां हो जाती हैं, लेकिन वे सुधार भी ली जाती हैं। 

जाहिर है ऐसी एन्ट्री मीडिया को सन्देह के घेरे में तो लायेगी ही और इसी बिना पर डा0 मनमोहन सिंह ने मीडिया के कान उमेठने की कोशिश भी की है। लेकिन वह भूल गये हैं कि उनकी कांग्रेस पार्टी में सारे नेता मनोनीत नहीं हैं, जनता द्वारा चुनकर आने वालों की तादाद बहुत है। उनकी राजनीतिक यात्रायें जमीन से जुड़ी हुई है, जनता और मीडिया दोनों को वे अच्छी तरह पहचानते हैं। कुछ ना बोलपाना उनकी शराफत हो सकती है दब्बूपन नहीं। उन्हीं में से कोई खड़ा हो गया कि अब बहुत हुआ डा0 साहब, हमें मनोनीत प्रधानमंत्री मान्य नहीं, तो लेने के देने पड़ जायेंगे।

डा0 मनमोहन सिंह केवल क्षेत्रीय अखबार, राजीव शुक्ला के चैनल और ऐसे ही अन्य चैनल, जो निजी मामलो को खबर बनाकर पेश करते हैं, को ही पूरा मीडिया समझते हैं तो यह उनकी समझदानी का मामला है, जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं। अगर मीडिया अपील ना करे, दलील पेश ना करे और मुंसिफ की भूमिका ना निभाये तो हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री पद पर बैठा मनोनीत व्यक्ति अंधेर नगरी चैपट राजा वाली कहावत चरितार्थ करने में किंचित मात्र का भी विलम्ब नहीं लगायेगा। इतनी सी चीज ही विस्फोट का विषय होना चाहिए थी कि कांग्रेस पार्टी के चुने हुए सांसदों ने अपने संसदीय दल की बैठक में श्रीमती सोनिया गॉंधी को नेता चुना, लेकिन सोनिया गॉंधी को यह अधिकार किस जनता ने, किस सांसद ने और किस संविधान ने दे दिया कि वह प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद को मनोनयन से भर दें! 

प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार इस देश के 80 करोड़ मतदाता के पास है, किसी एक व्यक्ति के पर्स की वस्तु नहीं है कि जिसे जी चाहा उसे गिफ्ट कर दिया जाये। नेहरु जी की मृत्यू के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष स्व0 कामराज ने स्व0 लाल बहादुर शास्त्री को संसदीय दल के नेता का प्रत्याशी कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में बनाया था एवं शास्त्री जी की मृत्यु के बाद तो बाकायदा कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के लिए स्व0 मोरारजी देसाई और स्व0 इन्दिरा गॉधी के बीच मतदान हुआ था। क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र में मनोनीत प्रधानमंत्री की व्यवस्था लागू रहना 80 करोड़ मतदाताओं के मुंह पर जूता मारने जैसा नहीं है?

कांग्रेस लोकसभा में बहुमत में होगी और है भी तो मतदाताओं के कारण लेकिन क्या मजाक है कि डा0 मनमोहन सिंह ने बिना लोकसभा का चुनाव लड़े ही देश की बागडोर संभाल ली और वह भी देश की जनता द्वारा दिये गये जनमत की तौहीन करके!  फिर किस आधार पर हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र होने का दम्भ भरते हैं। भारत नौजवानों का देश है, इसे खुद डा0 मनमोहन सिंह स्वीकारते हैं। युवाओं के मन में गुणवत्ता प्रधान शिक्षा एवं कौशल प्रदान करने वाली व्यवस्था का निर्माण न होने के कारण भी रोष है। ऊपर से जबरदस्त मंहगाई, लूट और भ्रष्टाचार ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया है। उनके पास डा0 मनमोहन जैसा बुजुर्गियत वाला धैर्य भी नहीं है, क्योंकि ऐसा धैर्य जब उम्र 70 के पार हो गई हो और आदमी मालामाल हो, तभी रह सकता है। ऐसे ही बुर्जुग व्यक्ति में समस्या का निदान करने के बजाय उस पर कुण्डली मारकर बैठने का भीषड़ अनुभव होता है, जैसा डा0 मनमोहन सिंह के पास है। 

आज का नौजवान सूचनाओं और विचारों से लैस है, इसलिए उसे सब दिखाई दे रहा है कि देश में कब, कहॉं और क्या हो रहा है। इसी कारण वह अधीर है और अन्ना हजारे एवं रामदेव के साथ है। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी में सुप्रीम कोर्ट के दो अवकाश प्राप्त जजों में से एक को अध्यक्ष और दूसरे को उपाध्यक्ष बनाकर एवं तीसरे सदस्य के रुप में अवकाश प्राप्त रॉ के निदेशक को सम्मलित कर अपनी मानीटरिंग में कालेधन की जॉच करने का जो फैसला दिया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाये कम रहेगी।

मीडिया इन युवाओं की अधीरता की अनदेखी नहीं कर सकता। यही कारण है कि कांग्रेस के अन्दर खाने में भी नौजवान नेता विचलित हैं और घुटन महसूस कर रहे हैं। इन नेताओं को राहुल में उम्मीद दिखाई देती है, क्योंकि वह भी सीमित क्षेत्र में ही, विशेष तौर पर उ0प्र0 के पश्चिमी इलाके के सामाजिक विकास को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं, लेकिन उन्हें भी मनमोहन सिंह अपनी अंगुली पर नचा रहे हैं।मीडिया खासकर प्रतिष्ठित न्यूज चैनल इस दौर में सकारात्मक भूमिका निभा रहा है, इतना अवश्य है कि अभी इसमें विषय की गहराई की पकड़ कम है, अथवा चैबीसों घन्टे खबरों में बने रहने की मजबूरी में वह राह भटक भी जाता है, जिसे ठीक होने में समय लगेगा, लेकिन इसे नकारात्मक कदापि नहीं कहा जा सकता।

प्रधानमंत्री को यह नहीं समझना चाहिए कि वह आर्थिक उदारीकरण की बरसाती में मीडिया को ढ़ंक देंगे। उन्हें पूरी दुनिया विशेषज्ञ मानती होगी और हो सकता है कि वह अमेरिका का कोई सबसे बड़ा राष्ट्रीय पुरस्कार भी पा जायें लेकिन इस हिन्दुस्तान का जागरुक नागरिक उन्हें उनके कृत्यों के लिए कभी माफ नहीं करेगा। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि भारत का मीडिया लंगडा नहीं है और ना ही चाटूकार पत्रकारों के भरोसे चल रहा है, बल्कि हर कदम पर पैनी नज़र रखने वाले पत्रकारों के बल पर ही जिन्दा है। मीडिया और न्यायपालिका कोई रामदेव नहीं है कि रात में 2 बजे गुण्डागर्दी के बल पर टेरेराइज करके उसे बदनाम और मजबूर कर दिया जाये। डा0 मनमोहन सिंह के ग्रिप में कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा हो सकती हैं, कार्यपालिका मजबूरी में हो सकती है, लेकिन मीडिया और न्यायपालिका को हड़काकर काबू में करने की कोशिश में ही उनकी ऐंठन दम तोड़ देगी। 

अन्त में मेरी आदरणीय-माननीय डा0 मनमोहन सिंह, मनोनीत प्रधानमंत्री, भारत को सलाह है कि वह इस देश की निरीह एवं भोली-भाली जनता और इस देश के करोड़ों होनहार नौजवानों को बेवकूफ बनाने की कोशिश ना करें, और  भारत के कल्याण के बारे में सोचें ना कि अमेरिका के कल्याण के बारे में। अन्ना हजारे और उनके आन्दोलन को दिग्विजय सिंह और सिबल जैसे नेताओं के चक्कर में हल्के में लेने की कोशिश ना करें वरना अन्ना हजारे की आँधी, हजारों को नहीं लाखों को भारी पड़ेगी, क्योंकि उनके साथ देश का आम जनमानस जुड़ा हुआ है, यह अलग बात है कि वह डा0 मनमोहन सिंह और सोनिया गॉंधी को दिखाई ना दे रहा हो। 
 सतीश प्रधान

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