Tuesday, 26 July 2011

सुप्रीम कोर्ट इतना सक्रिय क्यों


       सुप्रीम कोर्ट इसलिए सक्रिय है कि देश की जनता को न्याय मिले, उसके संवैधानिक अधिकारों का हनन न हो तथा कार्यपालिका संवैधानिक दायरे में रहकर सार्वजनिक हित में कार्य करे। देश की जनता से सवाल यह है कि वह सुप्रीम कोर्ट को माननीय कपाडिया के नेतृत्व में सक्रिय देखना चाहती है अथवा निष्क्रिय करके अपना दमन देखना चाहती है।
      जिस अमेरिका के नेतृत्व में हमारी भारत की सरकार चल रही है, उसकी दुहाई चन्द बेवकूफ हिन्दुस्तानी भी देते हैं। देखिए अमेरिका और यूरोप की सरकारें अपने यहॉं निजी उद्योगों के लिए भूमि का अधिग्रहण नहीं करती हैं। जिस कानून के जरिए भारत की सरकारों ने ऐसे कानून का सहारा लिया हुआ है, वह अंग्रेज का बनाया हुआ है, लेकिन अंग्रेज ने कभी भी इस कानून का दुरुपयोग नहीं किया। उसे रेल लाइन बिछाने के लिए जितनी जमीन की आवश्यकता थी, उतनी ही अधिग्रहीत की, उससे ज्यादा नहीं। वह भी चाहता तो रेल लाइन के किनारे की सारी जमीन अपने वतन के लोगों के रिहायशी आवास बनाने के लिए कौडियों में  अधिग्रहीत कर लेता, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसे पता था कि वह दूसरे देश में शासन कर रहा है जिसकी कुछ सीमा और कुछ मर्यादायें भी हैं।
      अंग्रेज के बनाये इसी कानून का चहुं ओर जबरदस्त विरोध इसके अनुपालन के कारण हो रहा है, वरना मेरा मानना है कि इस कानून में भी कोई कमी नहीं है। इस कानून को सरकार अपने मनमानी तरीके से लागू कर रही है, इसीलिए यह उपहास का कारण बनता जा रहा है। यह मुद्दा अब सरकार बनाने और गिराने की हद तक जा पहुचा है, इसीलिए सरकारें अब इसमें कुछ संशोधन का दिखावा करने को मजबूर हो रहीं हैं। इसमें संशोधन से भी कुछ खास फर्क पड़ने वाला नहीं है जबतक कि सरकार की मंशा ठीक नहीं होगी।
       सरकार ने जो नयी नीति का मसौदा तैयार किया है उसके अनुसार 80 फीसदी जमीन निजी क्षेत्र को स्वयं अधिग्रहीत करनी है, बाकी की 20 प्रतिशत सरकार उसे अधिग्रहीत करके देगी, इसी के साथ भूमि के रजिस्टर्ड मूल्य का छह गुना मुआवजा दिया जायेगा। इस मुआवजे का फार्मूला भी एकदम गलत एवं भरमाने वाला है। सवाल सीधा है कि सरकार को निजी उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहीत करने की आवश्यकता ही क्या है?  अधिग्रहण केवल शुद्ध सरकार के कार्य के लिए होना चाहिए, और सरकार की परिभाषा में ना तो सरकारी प्राधिकरण आते हैं, ना ही नगर निगम, ना ही बिजली कार्पोरेशन, ना ही भारत संचार निगम अथवा आवास विकास परिषद या कोई अन्य अथारिटी और कार्पोरेशन। निजी क्षेत्र को आपसी सहमति से जमीन खरीदने के लिए क्यों नहीं कहा जाता? जब निजी क्षेत्र जमीन क्रय करले तब सरकार उस भूमि का उपयोग, जिस उद्देश्य के लिए उसने जमीन क्रय की है, उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर दे। ये ट्रिपल पी क्या बला है? पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप को ही ट्रिपल पी कहा जाता है। अब इसमें सरकार बीच में कहॉं से आ गई। मामला दो बिल्लीओं का है, ये बन्दर बीच में कहॉं से आ गया! अब जब बन्दर बीच में आयेगा तो सारी रोटी तो वही खाने के फेर में रहेगा।
      अन्तरराष्ट्रीय कानून संस्था ने सिद्धान्त बनाया है कि जब आप किसी की जमीन लें तो उसे भी उस प्रक्रिया में भागीदार बनायें। मूल सवाल यह है कि आखिरकार आप जमीन किस उद्देश्य के लिए अधिग्रहीत करना चाह रहे हैं। यदि आप मॉल, सिनेमा हाल, जिम, गोल्फ कोर्स, रेस कोर्स और स्टेडियम के लिए ले रहे हैं तो ये सारे प्रोजेक्ट जबरन भूमि अधिग्रहण कानून के तहत आ ही नहीं सकते। ये सब मौज-मस्ती और सम्पन्नता की निशानी हैं, जहॉं की सरकार 20 रुपये में 2400 कैलोरी का भोजन देने की बात करती हो, उस देश की जनता की गरीबी का हाल इसी से जाना जा सकता है कि उसका नागरिक कितना मजबूर है कि वह 20 रुपये भी नहीं कमा पा रहा है, तभी तो सरकार को इस जनहित के कार्य के लिए योजना आयोग से ऐसी स्कीम लाने के निर्देश दिये गये हैं। 20 रुपये की एक पॉव दाल जिस देश में बिक रही हो, उस देश के नीति निर्माणकर्ता 20 रुपये में 2400 कैलोरी देने की बात राष्ट्रीय स्तर से कर रहे हैं। जो बालक कभी भट्टा-पारसौल, कभी अलीगढ़, कभी पडरौना, कभी सुल्तानपुर, कभी पूर्वी उ0प्र0 और कभी पश्चिमी उ0प्र0 में घूमघूमकर यह प्रचारित कर रहा हो कि देशवासियों चिंता मत कीजिए हमारी सरकार आपके लिए 20 रुपये में 2400 कैलोरी का भोजन उपलब्ध कराने जा रही है, तो उस देश के भविष्य को अपने आप समझ लेना चाहिए! किसानों को उन्हें अपने यहॉं रोककर कहना चाहिए कि राहुल जी हम आपको 20 रुपये की दर से तीन दिन का 60 रुपये देते हैं, लेकिन आप यहॉं से कहीं नहीं जायेंगे, 60 रुपये में तीन दिन खाकर, रहकर और 7200 कैलोरी लेकर दिखाइये, हम उ0प्र0 नहीं पूरा भारत आपको पूरी मेजारिटी से देने को तैयार हैं। इस पर राहुल जी को बगल झांकते भी नहीं मिलेगा।
       कुछ खास वर्ग के लिए बनाई जाने वाली ऐसी स्कीम का अमीर भारत देश की गरीब जनता से कोई लेना-देना नहीं, ये यहॉ की जनता का उपहास उड़ाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। नोएडा एक्सटेंशन में निवेश करने वाले ज्यादातर लोग इलीट क्लास की श्रेणी में ही आते हैं, 80 प्रतिशत पैसा नम्बर दो का लगा है, याकि एनआरआई का। वहॉं का सारा खेल मुनाफे पर ही आधारित है, फिर चाहे यह बिल्डर हो या प्राधिकरण अथवा सरकार अथवा किसान। जिस काम के लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया था उसके विपरीत इसका इस्तेमाल किया गया, इसी कारण न्यायालय को इसकी अधिसूचना को ही रद्द करना पड़ा। जमीन अधिग्रहण से पूर्व उन किसानों के पर्नवास की व्यवस्था सुनिश्चित करने से पूर्व उसका अधिग्रहण करना मान्य नैतिक मूल्यों से परे है। इसी प्रकार खेती/फसली भूमि का भी अधिग्रहण किया जाना, राष्ट्रीय उन्नति के एकदम खिलाफ है। कुलमिलाकर यदि सार्वजनिक हित में भूमि का अधिग्रहण एकदम आवश्यक है तो भी इसके लिए बंजर भूमि का ही अधिग्रहण किया जाना चाहिए, जिसकी इस देश में कमी नहीं है, क्योंकि ऐसी भूमि को उपजाऊ बनाने के नाम पर भी इस देश में कई हजार करोड़ का बजट लूटा जा रहा है।
        सार्वजनिक हित के नाम पर जो भी हो रहा है, आखिरकार इसे किसका विज़न माना जाये! निजी उद्योगपतियों का, ब्यूरोक्रेट्स का या सत्ता में बैठे नेताओं का। ऐसे विजन के लोग भारत को क्या बनाना चाह रहे हैं! कहीं इनका विजन अपना खजाना किलोमीटरों के दायरे में बढ़ाना और अपने लिए 9000 करोड़ का रिहायशी आवास बनाना ही तो नहीं। सारी जनता को फिर से गुलाम बनाना तो नहीं! या इस देश को बेचने का तो नहीं!
      सरकार द्वारा सार्वजनिक हित के फरेब में जबरन किया जाने वाला भू अधिग्रहण कहीं इस देश की जनता को फिर से गुलाम बनाने की साजिश तो नहीं! सरकार के ऐसे कृत्य को कौन रोक सकता है, किसान?, आमजन?, मीडिया या कोई और! दरअसल मीडिया और आमजन तो सरकार की आलोचना ही कर सकता है। मीडिया गैलरी में तो सरकार के खिलाफ चिल्ला सकता है, लेकिन सत्ता के मुख्य कमरे में तो वह भी नतमस्तक ही दिखाई देता है। देखा नहीं आपने कि गुलाम नबी फई द्वारा आयोजित सेमिनार में कितने धुरन्धर पत्रकार कविता पाठ करने जाते थे! अन्त में आलोचना से होता क्या है। जब देश के सबसे बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद सभालने वाला व्यक्ति यह उद्गगार व्यक्त करता हो कि अखबार जो चाहें छापे, उससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं क्योंकि उसका मतदाता बिना पढा लिखा है और अखबार नहीं पढ़ता, ऐसी सोच अगर मुख्यमंत्री की हो तो, उस प्रदेश का तो बंटाधार ही है ।
        ले-देकर बचता है सुप्रीम कोर्ट, और केवल वही ऐसी स्थिति में है कि उसका आदेश ही कुछ बदलाव ला सकता है वरना तो स्थिति बड़ी भयंकर है। सुप्रीम कोर्ट ही सरकार को निर्देश दे सकता है, दे भी रहा है और देना भी चाहिए। इसे कोर्ट की अति सक्रियता कदापि नहीं कहा जा सकता एवं जो ऐसा कह रहे हैं या चैनल पर प्रचारित कर रहे हैं, दरअसल वे प्रभु चावला, हरिशंकर व्यास, वीर संघवी, हिन्दुस्तान टाइम्स के शर्मा और इन्हीं की थाली के चट्टे-बट्टे हैं।
       हम जिस लोकतंत्र में रह रहे हैं उसमें ना तो सरकार बड़ी है, ना ही न्यायालय। हमारा संविधान बराबरी के सिद्वान्त पर काम करता है। संविधान हमें बराबरी का अधिकार देता है। इस अधिकार का हनन सरकार नहीं कर सकती, फिर चाहे यह केन्द्र की सरकार हो या प्रदेश की। सरकारें इस भूमि अधिग्रहण अधिनियम का बेजा और गैर कानूनी इस्तेमाल करके अवैध कमाई करने के लिए आमजन के बराबरी के हक को छीन रही हैं, इसी कारण सुप्रीम कोर्ट को सक्रिय होना पड़ा। क्योंकि यदि राज्य, संविधान में अंकित व्यवस्था के विपरीत आचरण कर रहा है तो इसे सुप्रीम कोर्ट को ही देखना होगा कि सरकार संविधान के दायरे में रहे।
       कोई दो दशक पूर्व मध्य प्रदेश में म0प्र0विद्युत बोर्ड ने एक बिजली परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहीत की। सरकार ने इसका मुआवजा दस से पन्द्रह हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से किसानों को दे दिया। लेकिन यह परियोजना शुरू ही नहीं की गई तथा बाद में सरकार ने यह जमीनें निजी ठेकेदारों को मोटे मुनाफे, लाखों रुपये प्रति एकड़ पर बेंच दी। इलाहाबाद जनपद के बारा क्षेत्र में भारत सरकार के हिन्दुस्तान पैट्रोलियम कार्पोरेशन ने हजारों एकड़ भूमि अधिग्रहीत कर रखी है, लेकिन उसपर एक दशक से कोई भी प्रोजेक्ट शुरू नहीं किया है, क्या ये जमीन किसानों को वापस नहीं दी जानी चाहिए? क्या सरकार और इन कार्पारेशन का गठन मुनाफाखोरी के लिए किया गया है? कदापि नहीं। जमीन अधिग्रहण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी निहितार्थ/निश्कर्श यही है।
       इसी के साथ कालेधन की बात करें तो देश के पैसे को विदेशी खाते में गुपचुप तरीके से जमा करना देश के कानून का उल्लंघन है। सरकार का यह फर्ज है कि वह कानून का उल्लंघन ना होने दे। मीडिया भी कालेधन की आलोचना कर रहा है। आमजन भी सवाल उठा रहा है, लेकिन सरकार है कि सभी की आवाज दबाने पर तुली है। क्या रामदेव, क्या अन्ना हजारे। रामदेव के साथ सरकार ने क्या गुण्डागर्दी की किसी से छिपी नहीं है। अन्ना हजारे को कांग्रेश का एक पागल नेता वही हश्र दिखाने की बात करता है।
       इसी कालेधन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महसूस किया कि 17-18 सुनवाई के बाद भी सरकार अपनी ढ़िठाई पर अड़ी है, और उसने उच्चस्तरीय समिति गठित कर कोर्ट को लॉली पॉप पकड़ाने की कोशिश की है तो संविधान की रक्षा के लिए उसे आगे आना ही पड़ा। यही सोचकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फर्ज निभाने वास्ते अभूतपूर्व न्याय देने की शुरूआत की है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस उच्च स्तरीय समिति को ही एसआईटी में तब्दील कर दिया, इससे कौन सा आसमान फटा जा रहा है। अगर वह ऐसा नहीं करता तो अपने कर्तव्य पालन में कोताही बरते जाने का दोष करार दिया जाता, जो उसके लिए बहुत ही लज्जा की बात होती।
       इसलिए कालेधन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ भी किया वह उसके अधिकार क्षेत्र का ही मामला है। यह न तो विधायिका के काम में हस्तक्षेप है, ना ही कार्यपालिका के। यदि सरकार राह से भटक जाये, जैसे इन्दिरा गॉंधी भटक गईं थीं तो उसे राह पर कौन लायेगा? निष्चित रुप से न्यायपालिका। लोकतन्त्र में जनता को अपना हक मांगने का कानूनी अधिकार है। जब उसे उसके हक के बदले गोली मिलेगी तो आक्रोश बढ़ेगा, आक्रेाश बढ़ेगा तो तोड़-फोड़ और सरकारी सम्पत्ति को नुकसान होगा, जनहानि होगी, अराजकता फैलेगी, फिर देश का क्या होगा। ये सारे लक्षण क्रान्ति की शुरूआत ही तो हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलॉ ने इसी क्रान्ति को रोकने की कड़ी में ऐसे फैसलॉ की शुरूआत की है। उसका सारा फैसला देश और यहॉं की जनता के हित में है। समाज को बदलाव की जरुरत है और इसमें न्यायपालिका की महत्वपूंर्ण भूमिका है।
      सुप्रीम कोर्ट के ऐसे ही आदेश को कुचक्र रचकर अति सक्रियता की श्रेणी में रखते हुए सरकार ने मीडिया के माध्यम से इसकी आलोचना कराने की शुरूआत की है, जिसके तहत बहुत से स्वनाम धन्य पत्रकारों को सरकार ने अपने पैनल में सूचीबद्ध कर भुगतान भी शुरू करा दिया है। इसे आप प्रिन्ट मीडिया के सम्पादकीय पेज पर और इलैक्ट्रानिक चैनल पर आयोजित कराई जाने वाली बहस में आसानी से देख सकते हैं। 
 सतीश प्रधान

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