Sunday, 7 August 2011

गद्दार के नाम पर होगा दिल्ली का चौक



     भारत के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह ने दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास जनपथ पर बने विंडसर प्लेस नाम के चैराहे का नाम सर शोभा सिंह, के नाम पर करने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री केा सिफारिश पत्र लिखा है। सरदार शोभा सिंह, औरतों पर भोण्डा एवं मरी हुई शक्सियत पर मनचाहा लेखन करने वाले सरदार खुशवन्त सिंह के पिता हैं। शायद आपको पता न हो कि सरदार खुशवन्त के पिता गद्दार और देशद्रोही थे जिन्होंने देशभक्त भगत सिंह के खिलाफ अंग्रेजों की अदालत में उनके विरुद्ध गवाही दी थी।
    खुशवन्त सिंह का नाम उन्हीं पत्रकारों की लिस्ट में है जिसमें कुलदीप नैय्यर,  बरखा दत्त,  वीर सिंघवी, निर्मला देशपाण्डे, अरुंधति राय, प्रभु चावला और राजेन्द्र सच्चर जैसे लोग हैं। ये सारे पत्रकार, समाजसेवी या आप जो समझें देश की प्रतिश्ठा दांव पर लगाते रहे हैं। फिर चाहे यह एक आई.एस.आई. एजेन्ट गुलाम नबी फई के सेमिनार/कार्यशला में उसके द्वारा उपलब्ध कराई गई सेवा पर विदेश जाने का ही मामला क्यों ना हो। इन सारों को फई की कोटरी का सदस्य समझना ही ज्यादा मुफीद होगा।
    यहॉं हम सरदार खुशवन्त सिंह की ही बात करते हैं, जो सुरा-सुन्दरी के शौकीन होने के साथ-साथ दिवंगत हुई महान हस्तियों पर ही खबर लिखने में महारत हासिल किये हुये हैं। चूंकि मुर्दे तो इनके लेख का खंडन करने आने वाले नहीं! इसलिए इनके जो मन में आता है और जो इनकी इज्जत में चार चॉंद लगा दे,वैसा ही लेख यह प्रस्तुत कर देते हैं। खुशवन्त सिंह के मुंह में दांत नहीं और पेट में आंत नहीं लेकिन लड़कियों के मामले में एकदम गिद्ध हैं। इन्हीं महोदय के पिता श्री थे शोभा सिंह, जिन्होंने शहीद भगत सिंह के खिलॉफ अंग्रेजों की अदालत में गवाही दी थी जिसके कारण भगत सिंह केा फांसी पर लटकाया गया।
     अंग्रेज बड़ी सरगर्मी से भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने के लिए किसी गद्दार की तलाश कर रहे थे। आखिरकार उन्होंने एक नहीं बल्कि दो लालची, देशद्रोही और गद्दारों को ढंढ ही लिया। उनमें एक निकले सरदार खुशवन्त सिंह के बाप और दूसरा निकला शादी लाल। दोनों का ही नाम श से शुरु होता है और अब जिस चौक को इस गद्दार के नाम पर किये जाने की सिफारिश जिस मुख्यमंत्री से की गई है, उस भद्र महिला का नाम भी श से शीला दीक्षित है, जो दिल्ली राज्य की मुख्यमंत्री हैं।
     शहीद भगत सिंह के खिलाफ गवाही देने के कारण ही शोभा सिंह और शादी लाल को अंग्रेजों ने खूबसारी दौलत के साथ ‘सर’ की उपाधि से भी नवाजा। शोभा सिंह को दिल्ली में बेशूमार दौलत और करोडों के सरकारी निर्माण कार्य के ठेके मिले जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार सम्पत्ति मिली। शयामली, मुजफ्फरनगर में आज भी शादीलाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब का कारखाना है। यह अलग बात है कि शादी लाल को गॉंव वालों का तिरस्कार भी झेलना पड़ा एवं उसके मरने पर वहॉं के किसी भी दुकानदार ने कफन का कपड़ा तक नहीं दिया।
     शादी लाल के लडकों को कफन का टुकड़ा भी शोभा सिंह ने दिल्ली से उपलब्ध कराया, तब जाकर इस गद्दार एवं देशद्रोही शादी लाल का क्रियाकर्म हुआ। शोभा सिंह इस मामले में किस्मत वाला रहा। इसे और इसके पिता सुजान सिंह, जिसके नाम से यमुनापार दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है, को राजधानी दिल्ली में हजारेां एकड जमीन मिली और खूब दौलत भी। इसी के बेटे खुशवन्त सिंह ने अपने बाप का दाग मिटाने के लिए अपने पिता के कुकर्मो को छिपाने के लिए आईएसआई एजेन्ट गुलाम नबी फई की ही तरह मैमोरियल लेक्चर/पत्रकारिता शुरु करके बड़ी-बड़ी हस्तियों से सम्बन्ध बनाने शुरु कर दिये।
     शोभा सिंह के नाम पर एक चैरिटेबिल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा मैनेज करता। दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखम्भा रोड़ पर जिस स्कूल को मार्डन स्कूल के नाम से लोग जानते हैं वह इसी गद्दार शोभा सिंह को खैरात में मिली जमीन पर शान से खड़ा है।
     खुशवन्त सिंह ने भी माना है कि उसका पिता शोभा सिंह 8 अर्पैल 1929 को उस वक्त सेन्ट्रल असेम्बली में मौजूद था जहॉं भगत सिंह और उनके साथियों ने धुंए वाला बम फेंका था। पिता को बचाने के लिए सरदार खुशवन्त सिंह यह तो कह रहे हैं कि उसके पिता असेम्बली में मौजूद थे, लेकिन यह नहीं बता रहे हैं कि उनके बाप और शादी लाल की गवाही पर ही भगत सिंह को फांसी पर लटकाया गया। यदि शोभा सिंह और शादी लाल, भगत सिंह के खिलाफ गवाही न देते तो निष्चित रुप से भगत सिंह को फांसी पर लटकाना अंग्रेजों के लिए मुमकिन न हो पाता।
     खुशवन्त सिंह का बाप शोभा सिंह 1978 तक जिन्दा रहा और दिल्ली के हर छोटे-बडे आयोजन में बाकायदा आमंत्रित अतिथि जाता रहा। हांलाकि बहुत सी जगह उसे अपमानित भी होना पडता था, लेकिन इसका वह अभ्यस्त था, क्योंकि अगर उसके पास करेक्टर नाम की चीज होती तो वह ऐसा घिनौना कृत्य न करता। हराम की मिली दौलत और जमीन से खुशवन्त सिंह ने एक ट्रस्ट बना लिया और हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाने लगे जैसा कि पाकिस्तानी एजन्ट गुलाम नबी फई आयोजित कराता रहा जिसमें हमारे देश के नामचीन और देशभक्त पत्रकार, समाजसेवी और पूर्व जज बड़े मजे से शिरकत करते रहे हैं, वह भी इस खुशफहमी में कि का कोई जाने पईय्ये। 
     मैमोरियल लेक्चर में आने वाले बहुत से लोग अज्ञानतावश ही इस गद्दार की फोटो पर माल्यार्पण कर देते थे, जैसे कि हम और आप किसी प्रसिद्ध मन्दिर में जाये तो कईएक मूर्ति आपको ऐसी मिल जायेंगी कि आप जानते ही नहीं कि ये देवता हैं या राक्षस लेकिन आप पुश्प अर्पित कर देते हैं। भले ही वहॉं पुजारी के स्व0 पर-दादा की मूर्ति लगी हो लेकिन आप भोलेपन में अज्ञानतावश उसपर भी पुश्पवर्षा कर देते हैं। ठीक वैसा ही शोभा सिंह की फोटो के साथ होता रहा, वरना मैमोरियल लेक्चर के स्थान पर फोटो रखने का क्या औचित्य?
     अब इस देश के नन्हे, जो एकदम भोलेभाले हों और जिन्हें कुछ न पता हो, उन्हें नन्हा कहा जाता है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जो कि एक सरदार हैं, एक दूसरे सरदार खुशवन्त सिंह के गद्दार स्व0 पिता सरदार शोभा सिंह के नाम से दिल्ली के विन्डसर प्लेस का नाम, सर शोभा सिंह के नाम पर रखने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सिफारिशी पत्र लिखा है। घ्यान रहे इनका भी नाम श से शीला दीक्षित ही है।
     अब आप स्वयं समझ लाजीए एक देशद्रोही को पुरस्कार कौन देगा? अंग्रेजों ने दिया क्योंकि शोभा सिंह ने उनके लिए हिन्दुस्तानी देशभक्त के साथ गद्दारी की और वर्तमान में सरदार मनमोहन सिंह उसे पुरस्कृत करने जा रहे हैं, तो यह कौन हुए! इससे तो अच्छा था कि इस चौक का नाम भिंडरावाला चौक रख दिया जाता। एकसाथ कईएक सरदारों को खुश किया जा सकता था। इससे एक नहीं लाखों सरदार खुश हो जाते, इस एक को खुश करने से क्या फायदा?
      इससे तो हमारे लखनऊ के वे पत्रकार ज्यादा अच्छे हैं जो औरतों के विषय में भौण्डा लेखन तो नहीं कर पाते, बल्कि औरतों को इज्जत के साथ बड़े-बड़े नेताओं से मिलवाने का काम करते हैं। लेखन-वेखन को मारिये गोली, वे तो इतने भोले हैं कि जिस भाषा के अखबार में काम करते हैं उस भाषा में अपना और अपने बाप का नाम भी नहीं लिख सकते लेकिन उनके बाप ने खुशवन्त सिंह के बाप की तरह गद्दारी नहीं की, किसी देशभक्त को सूली पर नहीं चढ़वाया। इसीलिए उनकी पहचान खुशवन्त सिंह के स्तर की नहीं हो पाई है, लेकिन बड़ी सिद्दत से वे दूसरे प्रयोजन से अपना नाम अमर करने में लगे हैं। वाह रे खुशवन्त सिंह खूब बढ़ाई तेरे बाप शोभा सिंह ने इस भारत की शोभा, और इस पर आलम यह कि उसके नाम पर दिल्ली का चौक होने जा रहा है।
सतीश प्रधान

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