Monday, 15 August 2011

हताशा और निराशा की जननी है मंहगाई


वर्ल्ड बैंक के तथाकथित अनुभवी एवं अर्थ विशेषज्ञ डा0 मनमोहन सिंह एवं उनकी टीम के आहलूवालिया, उपाध्यक्ष केन्द्रीय योजना आयोग, डा0 सुब्बाराव, गवर्नर आर.बी.आई. रंगराजन, भूतपूर्व गवर्नर, आर.बी.आई, वर्तमान गृहमंत्री चिदम्बरम एवं वर्तमान वित्तमंत्री प्रणव दा की मंहगाई घटाने की सारी कवायद धरी की धरी रह गई। दरअसल ये टीम और इसके लीडर अंग्रेजी मानसिकता के द्योतक हैं। डा0 मनमोहन सिंह और योजना आयोग के उपाध्यक्ष आहलूवालिया अर्थशास्त्री नहीं बल्कि अनर्थशास्त्री हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक, जिसका नेतृत्व वर्तमान में डा0 सुब्बाराव कर रहे हैं, ये सब धरातल से ऊपर 25वीं मंजिल पर बैठे हैं, जहॉं से हर भारतीय कॉंकरोच दिखाई देता है। इसी के विदर्भ में रहे रंगराजन भी वैसी ही मानसिकता वाले हैं।

भारतीय रिज़र्व बैंक एकदम सफेद हांथी है, उसपर तुर्रा यह कि वह भारत की सभी बैंकों का केन्द्रीय बैंक है। वह बैंकों की नियामक संस्था माना जाता है, उसकी सफलता जीरो भी हो तो ठीक है, लेकिन वह तो माइनस में घुसी हुई है। देखिए, अमेरिका को! उसकी क्रेडिट रेटिंग ट्रिपल ए से फिसलकर डबल ए प्लस पर आने के बाद भी उसके मुकाबले भारत का रुपये का अवमूल्यन होता जा रहा है। दिनांक 8 अगस्त 11 को 1000 डॉलर, 44761 रुपये का था जो रेटिंग घटने के बाद 1000 डॉलर, दिनांक 11 अगस्त 11 को 45407 रुपये का हो गया। उपरोक्त सारे अर्थशास्त्रीयो की टीम बताये कि ऐसा कैसे हो रहा है?  अगर किसी कन्ट्री की साख गिरने के बाद भी उसकी करेन्सी मजबूत हो रही है तो इससे सुखद और कोई दूसरी बात हो ही नहीं सकती!

अगर क्रेडिट रेटिंग घटने से करेन्सी मजबूत होती तो, सबसे नीचे के पायदान पर पड़ी कन्ट्री की करेन्सी सबसे मजबूत होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा भी तो नहीं है। ये सारा जगलरी का खेल है, जो अमेरिका से संचालित हो रहा है, जिसकी संचालन टीम में हमारी उपरोक्त टीम भी बराबर की पार्टनर है, जो हिन्दुस्तान की ऐसी की तैसी करने में पूरे मनोयोग से लगी है। ये टीम पूरे भारत से बदला ले रही है। किस बात का बदला ले रही है, यह तो मनमोहन सिंह और आहलूवालिया ही बता सकते हैं। तीन साउथ इण्डियन, एक कम्यूनिस्टी विचारधारा का पोषक और एक सरदार की पूरी टीम का लीडर भी एक घुन्ना और चुप्पा सरदार है, जो सम्भवतः 1984 के सिख दंगों का बदला पूरे भारतवर्ष से लेने की ठान चुका है,  इसीलिए वह ना तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ बोलता है और ना ही भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कार्रवाई करता है। उसे अन्ना हजारे भ्रष्ट दिखाई देतें हैं, करोड़ों करोड़ का घोटाला करने वाले उसकी कैबीनेट में हैं, जिनकी सरपरस्ती वह करता है, लेकिन उनकी बात वह नहीं करता है। यह विदेशी आक्रांताओं से भी बड़ा आक्रान्ता है जो अपनी ही धरती का है। अलावा इसके कोई अन्य कारण नज़र ही नहीं आता है।

बैंक कर्ज की लगातार बढ़ती ब्याज दरों के बाद भी मंहगाई रुकने का नाम नहीं ले रही, इसका सीधा मतलब है कि कर्ज की दरों और मंहगाई का कोई आपसी रिस्ता नहीं है। आरबीआई ने बेशर्मी के साथ कह दिया कि खाद्य वस्तुओं की मंहगाई घटने वाली नहीं बल्कि इसी चोट पर एक और चोट करते हुए उसने लगे हांथ यह भी कह दिया कि उसके सर्वे आंकलन के अनुसार जून 2012 तक यह दर 12.9 प्रतिशत तक पहुंच जायेगी, जबकि मार्च 2011 को यह दर 10.05 प्रतिशत ही थी।  इसका सीधा मतलब है कि मंहगाई की दर अभी 28 प्रतिशत और बढ़ेगी! यानी आगे के लगभग एक साल तक भी आरबीआई कुछ उपाय करने में अक्षम है। ऐसे रिजर्व बैंक से क्या फायदा? इसे या तो समाप्त कर देना चाहिए अथवा इसकी स्वायत्ता खत्म कर देनी चाहिए।

भारत में खाद्यान का सर्वोच्च 24.1 करोड़ टन उत्पादन हुआ। अनाज इतना पैदा हुआ कि रखने की जगह नहीं मिली, अनाज खुले में पड़ा सड रहा है। सरकार के पास बफर स्टॉक में 6.5 करोड़ टन अनाज पड़ा है। आलू और प्याज का भी इफरात में उत्पादन हुआ है। करोड़ों टन अनाज सड़ने की स्थिति के बाद भी जब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि इससे तो अच्छा है कि इसे गरीबों में बॉंट दिया जाये तब भी सरकार ने अपनी    संवेदनहीनता, हठधर्मिता दिखाते हुए,सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को दरकिनार करते हुए टिप्पणी की गई कि सरकार अपनी नीति अपने हिसाब से तय करेगी एवं उसने अनाज मुफ्त बांटने से साफ इंकार कर दिया। ऐसी नीति तो अंग्रेज की ही हो सकती थी कि अनाज को सड़ा दो लेकिन ब्लडी इण्डियन को मुफ्त में ना बांटो।

हिन्दुस्तान अब अमेरिकियों द्वारा संचालित हो रहा है। वह जमाने गये जब ईस्ट इंण्डिया कम्पनी यहॉं राज करती थी और उसके कर्ता-धर्ता भी भारत में ही रहते थे। अब तो कई एक ईस्ट इण्डिया कम्पनियां भारत में हैं, लेकिन उनके असली मालिक यहॉं भारत में नही बैठते हैं। जबसे यूनियन कार्बाइड का भोपाल गैस काण्ड हुआ है, एक भी मल्टी नेशनल कम्पनी का मालिक भारत में नहीं बैठता है, वह विदेश से ही इसका संचालन करता है। भारत में इन मल्टीनेशनल कम्पनी में यहीं के भारतीय इण्डिया हेड बनाकर बैठा दिये जाते हैं जो अपने और अपने परिवार की सुख-सुविधा के लिए वह सब करते हैं, जो देश के विरुद्ध होता है। ये सारे विदेशियो के गुलाम हैं, इनकी सोच बिल्कुल गुलामों वाली है और इनकी नियति ही गुलाम बने रहने की है। जिस प्रकार मुम्बई के डिब्बेवाले प्रतिष्ठान के प्रबन्धन ने पूरे विश्व को चौंका दिया था और बड़े-बड़े प्रबन्ध संस्थानों के कर्ता-धर्ता समेत इंग्लैण्ड की महारानी भी डिब्बेवाले के यहॉं उसके प्रबन्धन के गुर सीखने आई थीं, ठीक उसी प्रकार महगाई पर रोक लगाने का फार्मूला शुद्ध भारतीय ही दे सकता है, ना कि कोई विदेशी अथवा उसका गुलाम! भारतीय करेन्सी को विदेशी बैंकों में जमा करने वाले तो कदापि नहीं।


भारतीयों की सोच में बदल की गुंजाइश रखने वाला हमारा मीडिया तंत्र, यह तो नहीं कहा जा सकता कि नकारा हो गया है, लेकिन यह स्पष्ट रुप से कहा जा सकता है कि वह लालची, मौकापरस्त और खुदगर्ज अवश्य हो गया है। मीडिया का एक बुजुर्ग हिस्सा आई.एस.आई. एजेन्ट गुलाम नबी फई के तंत्र में है और मजा लूटकर भारतीयता को चोट पहुंचा रहा है। कुछ हिस्सा भारत में दिनोंदिन बढ़ती मंहगाई पर भारत सरकार को आडे हांथों लेने के बजाय, अमेरिकी कर्ज के मर्ज का इलाज ढूँढ रहा है। दैनिक जागरण के राजनीतिक सम्पादक, प्रशांत मिश्र ने अमेरिका के काल्पनिक संकट के इलाज की दुकान खोली है, उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था की मृत्यु शैय्या पर पड़ी लाश नहीं दिखाई देती। वे जनता को यह बताने में सक्षम नहीं हैं कि भारत के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री नहीं बल्कि भारत के लिए अनर्थशास्त्री हैं, जो केवल अमेरिका के भले के लिए भारत के प्रधानमंत्री का पद घेरे हुए हैं, लेकिन वह तबका अमेरिका की गिरती साख से चिंतित है।

प्रशांत मिश्र जी ने 1917 में प्रथम बार स्थापित अमेरिकी साख का गुणगान करते हुए वर्तमान में पहली बार ही उसकी साख को गिरते हुए देखा है, जबकि वास्तविकता यह है कि उसकी साख वर्ष 1981 में भी गिरी थी। ओवरआल साख तो उसकी गुण्डई और बदमाशी की है, जिसमें वह नम्बर वन है, जो उसका अन्त होने पर ही गिरेगी। हमारे नीति नियन्ताओं ने मंहगाई बढ़ाने के ही फार्मूले पढ़े हैं, उन्होंने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजाबाद, दुष्टता और एकबार येन-केन-प्रकारेण चुन लिए जाने के बाद पूरे पांच साल तक राज करने के ही पाठ पढ़े हैं, इसलिए उनको मंहगाई घटाने के प्रयास करने ही नहीं हैं। जब उनके अपने व्यक्तिगत खजाने बेशुमार दौलत से भरे पड़े हैं तो उन्हें मंहगाई से क्या लेना देना। केक और बर्गर खाने वालों को गेहू और दाल की बढ़ती कीमत से क्या सरोकार।
सतीश प्रधान

1 comments:

George[USA] said...

This is a world wide problem.Re-session & increasing budgets put a hole in our pocket.

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