Wednesday, 31 August 2011

देश को मिल गया मसीहा



          भारत गणराज्य के वर्तमान प्रधानमंत्री किसी समस्या का राजनीतिक समाधान तलाशने में एकदम असमर्थ हैं। जनलोकपाल के प्रति पहले ही सहानुभूति पूर्वक विचार के लिए तैयार हो जाते तो एक 75 वर्षीय बुजुर्ग मा0 अण्णा हजारे जी को इतने दिनों तक अनशन पर नहीं रहना पड़ता,  इसलिए उनकी जगह पर कांग्रेस को प्रणव दा को प्रधानमंत्री बना देना चाहिए। मनमोहन को सार्वजनिक-राजनीतिक जीवन में सबकुछ मिल चुका है। सात वर्ष से वह लगातार प्रधानमंत्री पद पर हैं। यह साधारण उपलब्धि नहीं कही जायेगी, क्योंकि ऐसा सिर्फ हिन्दुस्तान में ही सम्भव है, वरना देखिए गद्दाफी लुका-छिपा घूम रहा है। ईमानदारी के सिरमौर बनने वाले सरदार जी  को अब राष्ट्रहित में स्वंय ही प्रधानमंत्री पद से मुक्ति पा लेनी चाहिए, वरना आगे क्या हो कौन जाने। इस देश को वास्तव में मसीहा मिल गया है।
      अण्णा के मामले में सरकार ने असंवेदना, अपरिपक्वता, अदूरदर्शिता का परिचय ही नहीं दिया अपितु एक नेक आन्दोलन को सिब्बल के जरिए स्वामी अग्निवेष जैसे एजेन्ट को अण्णा टीम में घुसाने और उसे बदनाम करने की पूरी कोशिश की। तभी तो मनीष जैसे लोगों से गाली दिलवाई गई, और बाद में वक्त की नजाकत को देखते हुए उससे माफी भी मंगवाई। ऐसे को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया, क्योंकि पता नहीं ये खोटे सिक्के कब काम आ जायें। जो निर्णय प्रारम्भ में हो सकता था,  उसके लिए देश आन्दोलित हुआ, लेकिन अच्छा हुआ। वयोवृद्ध अण्णा को अनशन करना पड़ा, क्योंकि भगवान ऐसा चाहते थे। इस अवधि में ज्ञात हुआ कि सरकार अपना इकबाल पूरी तरह समाप्त कर  चुकी है। बेशक वह बहुमत में होगी,  लेकिन अण्णा ने पूरी दुनिया के सामने सिद्ध कर दिया  कि असल में जनता उनके साथ है।
      प्रधानमंत्री और उनकी टीम ने अण्णा के आन्दोलन को असंवैधानिक बताया, संविधान, प्रजातंत्र और संसद की सर्वोच्चता के बेतुके तर्क रखे । वस्तुतः मनमोहन सिंह राजनीतिक रूप से किसी समस्या को समाधान की स्थिति तक पहुंचाने में सक्षम नहीं हैं। यह उनकी नियुक्ति से जुड़ा मसला  है। वह प्रजातंत्र की बात करते हैं लेकिन उनको इस पद पर आसीन करने में प्रजा की इच्छा बिल्कुल शामिल नहीं है। इसलिए महत्वपूर्ण पद पर होने के बाद भी वह आठ दिन तक राजनीतिक पहल करने की स्थिति में नहीं थे। गनीमत यहीं तक नहीं थी, उन्होंने कपिल सिब्बल और पी. चिदम्बरम जैसे सहयोगियों को आगे रखा, सोचा कि उनकी वकालत लोकपाल पर भारी पड़ जायेगी।
      कपिल भी उन्हीं की तरह निकले,  जिनका राजनीति में आना घटना प्रधान है। वह जमीनी पृष्ठभूमि से राजनीति में नहीं है। केवल इतना अन्तर है कि कपिल सिब्बल संयोग कहिए या जनता की गलतफहमी कि वह लोकसभा चुनाव जीत गए। मनमोहन को चुनाव जीतना अभीतक नसीब    नहीं हुआ है। लेकिन जमीन से इनकी भी दूरी में ज्यादा फर्क नहीं है। इसलिए ये मनीष तिवारी या दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को किनारे करने की बजाय इनकी छिछली हरकत पर इतराते रहे।   इनको ए राजा, कलमाड़ी आदि नेता सिर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबे नजर नहीं आये,       जो शब्द उन्होंने अण्णा के लिए प्रयुक्त करवाये। सरकार और पार्टी खामोश रही। इस    प्रकार सरकार और पार्टी  दोनों का नजरिया जाहिर हुआ। उसकी नजर में भ्रष्ट किसे माना जाता     है, यह पता चला। प्रधानमंत्री प्रभावशून्य और कठपुतली ही दिखाई दिए, या समझिये वह अपने को कठपुतली ही दिखाना चाहते हों।
      संप्रग सरकार संवेदनहीनता का परिचय शुरू से ही देती रही, उसे खाद्यान्न का सड़ जाना मंजूर हुआ, लेकिन भारत के सुप्रीम कोर्ट के निर्देष के बावजूद, निर्धनों में उस अनाज को बांटना मंजूर नहीं हुआ। मंहगाई रोकने के प्रयास नहीं किए गये। सामान्य जनता को होने  वाली कठिनाई के प्रति उसने कभी संवेदना नहीं दिखाई। पछहत्तर वर्षीय अण्णा हजारे के अनशन का सातवां दिन था। मनमोहन सिंह इस गम्भीर मसले पर विचार विमर्श करने के बजाय कोलकाता की एक दिवसीय यात्रा पर चले गये। यह ठीक है कि उनका कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था। वहां आई.आई.एम. में गाउन ओढ़कर उन्हें लिखित भाषण पढ़ना था। प्रधानमंत्री पद के दायित्व और मानवीय संवेदना का तकाजा यह था कि मनमोहन सिंह इस कार्यक्रम में शामिल होने का कार्यक्रम स्थगित कर देते। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि वहां के लोग मनमोहन सिंह को देखने-सुनने के लिए एकदम व्याकुल थे। वह सुसज्जित बन्द हॉल में भाषण पढ़ रहे थे। बाहर कोलकाता के नागरिक उनकी यात्रा का विरोध कर रहे थे, और अन्दर मेधावी छात्र उनसे डिग्री न लेने के लिए काली पट्टी बांधकर विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि अण्णा के अनशन का समाधान निकालने के लिए प्रधानमंत्री को नईदिल्ली में ही रहना चाहिए था। वापस लौटने के दो दिन बाद रायता फैलाने के लिए सरदार जी ने सर्वदलीय बैठक रखी। तब तक अन्ना की सेहत बिगड़ती रही।
     किसी को खुली लूट की छूट देना, उसका बचाव करना, आरोपों को जानबूझ कर नजरअंदाज   करना ईमानदारी का लक्षण नहीं है। एक ईमानदार प्रधानमंत्री की सुख-सुविधा, सुरक्षा, आवास आदि पर सरकारी खजाने से बहुत बड़ी धनराशि खर्च की जाती है। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद अनेक खर्चीली सुविधाओं की गारण्टी मिलती है। ऐसे में निजी ईमानदारी पर आत्ममुग्ध होना,  कोई उदाहरण पेश नहीं करता है। उन्हें अपने सहयोगियों व प्रशासन को ईमानदार रहने के लिए बाध्य करना चाहिए था। अन्यथा उनकी निजी ईमानदारी भी भ्रष्टाचार के साथ समझौते के दायरे में ही आती है। वैभवशाली प्रधानमंत्री पद के लिए बेईमानी से समझौता करना किस आक्सफोर्ड की डिक्शनरी में ईमानदारी के अंतर्गत आता है।
      वैसे यहॉं कि जनता को इस पर भी विचार करना चाहिए कि इतने बड़े लोकतांत्रिक देश,      भारत के प्रधानमंत्री पद पर बैठे सरदार मनमोहन सिंह के कितने ही अरमान मन में ही धरे रह   जाते हैं। बतौर प्रधानमंत्री समय-समय पर दिखने वाले उनके अरमानों पर नजर डालिए, वह मंहगाई रोकना चाहते है, वह भ्रष्टाचार समाप्त करना चाहते हैं, वह आतंकी हमले रोकना चाहते हैं,वह दोषियों को कड़ी सजा दिलाना चाहते है, पर विडम्बना देखिए उनके भाग्य की कि वह कुछ कर नहीं पाते। अपनी दुरदशा पर दृश्टिपात करते हुए ही उन्होंने कहा कि वह अब हर हालत में शक्तिशाली लोकपाल चाहते  हैं। साथ ही कहीं जनता यह न समझ ले कि वह तुरन्त अपने से तगडे लोकपाल की नियुक्ति न कर दें, यह भी जोड़ दिया कि संसदीय प्रक्रिया में समय लगता है, इसलिए अभी इंतजार कीजिए।
     क्या मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य पर विश्वास किया जा सकता है। क्या मजबूत और प्रभावी लोकपाल के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से देश निश्चिंत हो सकता है। कठिनाई यह है कि भारत गणराज्य के वर्तमान प्रधानमंत्री किसी समस्या का राजनीतिक समाधान तलाशने की स्थिति में ही नहीं हैं। इस महत्वपूर्ण पद पर वह जनता की पसन्द से नहीं हैं। शायद इसीलिए वह जनभावना को समझने में समय गवांना नहीं चाहते हैं। शायद इसीलिए राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सलाह पर कानून बनाने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती है, और ना ही उस पर सर्वदलीय बैठक की आवष्यकता ही वह महसूस करते है। सोनिया जी का, अमेरिका का हांथ उनके सिर पर है, इसलिए वह जो चाहेंगे करेंगे, आप क्या कर लेंगे। बाकी उनके किये पर ताली बजाने के लिए पूरी कांग्रेस उनके साथ है।
     ताजा उदाहरण देखिए! स्पोर्ट्स बिल पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की जरूरत इसके लिए नही समझी गई, क्योंकि उसकी कैबिनेट में मंत्री पदपर विराजमान बहुत से मंत्री प्रदेशीय क्रिकेट एसोसियेशन के अध्यक्ष हैं, और उन्होंने ही इसका विरोध किया। सशक्त लोकपाल के प्रति पहले ही ईमानदारी से उसमें प्राविधान कराकर बिल रख देते तो ऐसे लेने के देने तो न पड़ते। मेरा तो मानना है कि अब भी कुछ करने की जरूरत नहीं है। फिर से पूरे हिन्दुस्तान को बेवकूफ बना सकते हैं। मा0 अण्णा जी को जो पत्र पहुंचाया है, उसे सिंघवी, अमर सिंह और लालू यादव से खारिज करा दें, बस हो गया काम हिन्दुस्तान का। मनमोहन सिंह अपने को कितना ही ईमानदार दिखाने का नाटक करें,   वह मा0 अण्णा हजारे जी की हद की दिवानगी का अनुभव इस जिन्दगी में तो कदापि नहीं कर सकते। इसके लिए उनको दूसरी जिन्दगी लेनी पडेगी और अण्णा बनना पड़ेगा, जो इस जिन्दगी में किसी भी तरीके से सम्भव नहीं है। मनमोहन को तो सार्वजनिक, राजनीतिक जीवन में बहुत कुछ मिल गया है, लेकिन उन्होने इस भगत सिंह के देश को क्या दिया, इसको वह बिस्तर पर सोते जाते वक्त सोचें? शायद उनके अन्तरमन से कोई आवाज आये और उनको कुछ अच्छा करने के लिए झकझोरे। अब इस देश की जनता को ईमानदारी की परिभाषा पर नये सिरे से विचार- विमर्श करने की तीव्र आवश्यकता आन पड़ी है।   सतीश प्रधान  

4 comments:

Anonymous [UAE] said...

this post is composed excellently .I'am now a big fan of ur blog.

Anonymous [Italy] said...

We now in ITALY are also doing a campaign against CORRUPTION.
" This post of yours have encouraged me to do more for my Country ".
I will keep a periodic check for future references .

EnochHill[USA] said...

Keep shedding light on corruption! Or it will happen again.

Zukenberg[Germany] said...

.... thank-you for all your journals. It is truly appreciated.

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