Monday, 8 August 2011

बुन्देलखण्ड में पनपेगा नक्सलवाद-राजा बुन्देला


बुन्देलखण्ड में सरकारी आँकड़ों के अनुसार विगत जनवरी से अब तक 570 किसान आत्महत्या कर चुके हैं, जबकि सच्चाई निश्चित रुप से इससे अलग और चौकाने वाली ही है। इसी बुन्देलखण्ड से सात विधायक उ0प्र0 और म0प्र0 में मंत्री पद पाये हुए हैं। इस तरह इस क्षेत्र से उ0प्र0 के चार और म0प्र0 के पॉंच सांसद, संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह और अपने देश के लला यहॉं पहुंचकर कई एक घोषणा कर चुके है, लेकिन नतीजा ढ़ाक के तीन पात से बढ़कर कुछ भी नहीं।

मनरेगा की गडबडियों में बुन्देलखण्ड सबसे ऊपर पाया गया है, लेकिन किसी को कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। देश के नक्शे में बुन्देलखण्ड ऐसी तस्वीर पेश करता है जैसे लाचारी और बेबसी ही उसकी नियति है। यह हमारे अनर्थशास्त्री और अमेरिका के दुलारे डा0 मनमोहन सिंह, आहलूवालिया, रंगराजन, प्रणव मुखर्जी, चिदम्बरम, रिजर्व बैंक आफ इंडिया, योजना आयोग समेत पूरी कैबीनेट के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस इनसे तो लज्जा की बात करना अपने मुख पर ही थूकने जैसा है। 

उ0प्र0 के लोग हसरत भरी निगाहों से इंतजार कर रहे हैं कि किसानों के हक के लिए सियासत का जो बन्दा पदयात्रा पर निकला था, एक दिन यहॉ के लोगों का दुखदर्द भी बांटेगा, लेकिन वे यह देखकर निराश हैं कि वह बन्दा नोएडा, अलीगढ़, बुलन्दशहर छोड़कर बुन्देलखण्ड की ओर देखने को भी तैयार नहीं है।बुन्देलखण्डवासियों का कहना है कि हम अपनी सात नदियों से दूसरों को पानी पिलाते हैं लेकिन खुद प्यासे रहते हैं?  उनकी इसी प्यास को बुझाने निकले हैं बुन्देलखण्ड के राजा बुन्देला और उन्होंने इसके लिए कांग्रेस छोड़कर बुन्देलखण्ड कांग्रेस के नाम से एक नई पार्टी गठित की है, उसकी पहली प्रेस कान्फ्रेन्स में उन्होंने जो घोषणा की है, उसकी बानगी देखिए।

नवगठित बुन्देलखण्ड कांग्रेस के अध्यक्ष और बॉलीवुड सितारे राजा बुन्देला ने आगाह किया है कि यदि बुन्देलखण्ड प्रदेश अलग न बना तो वहॉं फैली भुखमरी, तबाही और उपेक्षित जनता नक्सलवाद की ओर प्रभावित होगी। राजा बुन्देला का कहना अतिश्योक्ति नहीं है, क्योंकि भारत में जहॉं भी नक्सलवाद है, वहॉं की परिस्थितियां भी ऐसी ही रही हैं। उनकी इस बात में तो सौ प्रतिशत दम है। कोई भी सरकार नक्सलवाद के रुटकॉज को ढंढ़ने का प्रयास नहीं करना चाहती, उसके निदान की बात तो दूर की कौड़ी है। यदि रुटकॉज ढूंढ़कर उसका इलाज किया जाये तो नक्सलवाद अपने आप खत्म हो जायेगा। कम और बेस्तर बुन्देलखण्ड के हालात भी ऐसे ही हैं। यहॉं की समस्या को केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार के पाले में फैंकने से काम बनने वाला नहीं। दोनों सरकारों को सम्मलित प्रयास करने ही होंगे।

बुन्देलखण्ड में यह कहावत मशहूर होती जा रही है कि बुन्देलखण्डवासी अपनी सात नदियों से दूसरों को पानी पिलाते हैं लेकिन खुद प्यासे रह जाते हैं। यहॉं से 37 विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा में और 34 विधायक मध्य प्रदेश की विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी प्रकार उ0प्र0 से 4 और म0प्र0 से 5 सांसद भी चुने जाते हैं, बावजूद इसके बुन्देलखण्ड का किसान त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा है। इसका सीधा मतलब है कि यहॉं से जो प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा और लोकसभा में जा रहे हैं, वे यहॉं की जनता के लिए कोई प्रयास ही नहीं कर रहे हैं।

उत्तराखण्ड राज्य बनने के एक दशक बाद भी वहॉं की मूल समस्या का अन्त नहीं हुआ है। विशेष पैकेज के नाम पर ही वह आज भी जिन्दा है। उसने अपनी कमाई के श्रोत आजतक नहीं खोजे हैं। उसकी कमाई का क्या जरिया है और कितनी रेवन्यू उसके पास आती है, तथा कबतक वह आत्म निर्भर हो जायेगा, इसको बताने वाला कोई नहीं है। इसी परिप्रेक्ष्य में अगर राजा बुन्देला भी यह बताते चलें कि बुन्देलखण्ड की कमाई का जरिया यह होगा और उसका इस्तेमाल वहॉं की जनता के लिए ना होकर बुन्देलखण्ड के बाहर के लोगों के लिए हो रहा है तो बात समझ में आती है, लेकिन यदि उस क्षेत्र से कोई कमाई ही नहीं है तो उसे अलग राज्य बनाना वहॉं की जनता के साथ छलावा और बेईमानी है।

यदि वहॉं से चुने जाने वाले विधायक और सांसद वहॉं की जनता के लिए कुछ सोंचें तो अब भी बहुत कुछ हो सकता है। वरना तो ऐसे ही विधायक और सांसद प्रथक राज्य के बाद भी चुने जायेंगे जो फिर लालबत्ती के फेर में पडे़गे। अलग राज्य बनाने पर कई दशक तक इसे केन्द्र सरकार के विशेष पैकेज के सहारे ही चलना पड़ेगा। इसी के साथ पूरे मंत्रीमण्डल का करोड़ों रुपये का भार भी उसी केन्द्र के पैकेज से ही निकलेगा जो अनतत्वोगत्वा बुन्देलखण्ड वासियों के मत्थे ही पड़ेगा।

इस देश में तबतक सुधार आने वाला नहीं जबतक जनता के पास विधायक और सांसद को वापस बुलाने का अधिकार नहीं मिलता। जनता जिस विधायक/सांसद को जिस पार्टी के बैनर तले चुनकर भेजती है और वह उसके बाद किसी अन्य पार्टी में जाता है अथवा पार्टी उसे निकाल देती है तो उसकी सदस्यता स्वतः खत्म हो जानी चाहिए। 

राजा बुन्देला ने पूर्व में कहा है कि यहॉं की नदियों बेतवा, चम्बल, केन, धसान, टोंच, शहजाद और जामनी से ही आगरा, कानपुर, लखनऊ और इलाहाबाद को पानी भेजा जाता है। आगरा के ताज के लिए यहॉं का पानी भेजकर विश्व पर्यटन को रिझाया जाता है। मेरा कहना है कि राजा बुन्देला इसी पानी को बुन्देलखण्ड के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं करते? ऐसा करने से उन्हें कौन रोक रहा है।

राजा बुन्देला इस सच को स्वीकारें कि बुन्देलखण्ड के दबंगों ने पानी पर अपना एकाधिकार कर लिया है। सुनकर आप चैंकेंगे कि इसी आजाद भारत में आज भी बुन्देलखण्ड के कुओं के पास कमजोरॉ को फटकने नहीं दिया जाता है। ये 37 विधायक और 4 सांसद क्या कर रहे हैं? क्या ये सब दबंगों के सामने बौने हैं याकि ये ही दबंग है, अथवा इनमें से कुछ दबंग हैं! ये सारे वहॉं की जनता के लिए खड़े हो जाये तो इनसे बड़ा दबंग कौन? यदि सरकारें इनकी भी नहीं सुन रही हैं तो सुप्रीमकोर्ट में पीआईएल दाखिल कीजिए, देखिए कैसे सुप्रीमकोर्ट सुनवाई करता है।

जहॉं मात्र छह माह में 570 किसान आत्महत्या कर चुके हों वहॉ की जनता की सुप्रीमकोर्ट सुनवाई ना करे हो ही नहीं सकता। पीआईएल दाखिल करने के लिए हष्ट-पुष्ट, तन्दरुस्त, दो हांथ और दो पैर होना जरुरी नहीं है। एक हांथ एक पैर के भी हैं तो काम चलेगा। कमजोर और अन्धे हैं तो भी काम चलेगा, लेकिन भाई जान! रहियेगा जनता के प्रति ईमानदार। पीआईएल को तगड़ी कमाई का जरिया और अपने बदनाम नाम को नेकनामी में तब्दील करने के लिए पीआईएल मत कीजियेगा।

प्रथक राज्य बुन्देला को मुख्यमंत्री का पद तो दिला सकता है लेकिन वहॉं आत्महत्यायें नहीं रुकवा सकता? पहले आत्म हत्या रोकने के प्रयास होने चाहिए, बाकी बात बाद में। आत्महत्यायें रोकने के लिए जमीनी प्रयास करने होंगे, केवलमात्र पैकेज के ऐलान और प्रथक राज्य की मांग से वहॉं के निवासियों का भला होने वाला नहीं है। बुन्देलखण्ड कांग्रेस गठित करने वाले राजा बुन्देला ने लखनऊ  में आयोजित अपनी पहली प्रेसवार्ता में राहुल गॉंधी पर भरोसा तोड़ने का आरोप लगाया। साथ ही यह भी कहा कि राहुल ही नहीं सोनिया ने भी उन्हें वर्ष 2004 में फिल्मी दुनिया से बुलाकर बुन्देलखण्ड राज्य बनाने का भरोसा दिलाया था, लेकिन अब राहुल राज्य के बजाय पैकेज के जरिए क्षेत्र के विकास की बात कर रहे हैं। यदि ऐसा है भी तो क्या गलत है? पृथक राज्य बनने के बाद क्या बगैर केन्द्र के पैकेज के बुन्देलखण्ड सरवाइव कर सकता है?

राजा बुन्देला ने विधान सभा की 37 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की बात की है। राजा बुन्देला का यह नारा कि अपना सी.एम., अपना डी.एम., अपनी धरती, अपनी भर्ती सुनने में आकर्शक लगता है, लेकिन क्या यह बुन्देलखण्ड-वासियों को उत्तर प्रदेश से अलग नहीं कर देगा, जैसा कि महाराश्ट्रीयन सोचता है। क्या पूरे भारत की धरती उनकी नहीं है? जबतक पूरे भारत को एक मानकर नेतागण नहीं चलेंगे तबतक इस भारत में भुखमरी मर नहीं सकती।

राजा बुन्देला को सबसे पहले बुन्देलखण्ड के 82 प्रतिशत किसानों और मजदूरों के लिए कोई कारगर स्कीम सोचनी होगी। खुजराहो, महोबा, चित्रकूट, छतरपुर जैसे ऐतिहासिक स्थल के पर्यटन की योजना बनानी होगी। खदान और पत्थर पर आधारित उघोग की तलाश कर उसकी प्रोजेक्ट रिर्पाट तैयार करनी होगी। इसके बाद इसे लेकर वह जनता के बीच जायें और फिर अपनी बात रखें, तब बात बनेगी।

अलग राज्य बनने के बाद होगा यही कि उघोग स्थापित करने के नाम पर इन्हीं 82 प्रतिशत किसानों की जमीनें फिर से इमरजेन्सी क्लॉज लगाकर औने पौने दाम पर अधिग्रहीत कर ली जायेंगी, जो आत्महत्या कर रहे किसानों के प्रतिशत को कई गुना बढ़ा देंगी। आत्महत्या कर रहे किसानों के साथ सरकारी गोली से मरने वाले किसानों की भी तो बढोत्तरी हो जायेगी। बुन्देला जी मुख्यमंत्री बनने की सोचने से पहले इन गरीब किसानों की भी सुध लीजिए।
सतीश प्रधान

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