Thursday, 29 September 2011

चलिए भारत सरकार का ठप्पा तो लगा

आईसीसीएमआरटी ऑडीटोरियम में आयोजित सेमिनार
               मीडिया का एक वर्ग जो हमेशा सरकारी मान्यता, सरकारी आवास, सरकारी भूखण्ड, सरकारी अनुदान (मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री विवेकाधीन कोष से वितरित राशि) सरकारी बख्शीश या कहिए सरकारी न्यौते की जुगाड़ में ही रहता है,  उसे खुश होना चाहिए कि जिस तरह से भारत सरकार ने देश के चुनिन्दा दिखने वाले एवं क्षद्म पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को, आय से अधिक सम्पत्ति रखने वाले आरोपी बालाकृष्णनन के मानवाधिकार आयोग के मीडिया एवं मानवाधिकार ग्रुप का सदस्य बनाया है,  उसी के नक्शे-कदम पर चलकर प्रदेश की सरकारें भी ऐसा ही कदम उठाने पर मजबूर होंगी। लेकिन ध्यान रहे सरकार उन्हीं पत्रकारों को इस योग्य मानती है,  जिन्होंने ऊपर वर्णित सभी में से कम से कम एक सुविधा का भरपूर उपयोग किया हो अथवा कर रहा हो, वही सरकार की निगाह में सबसे बड़ा पत्रकार होता है। वर्तमान में ऐसे पत्रकार,  ग्रुप/झुण्ड में पाये जाते हैं। झुण्ड में रहने की प्रवृत्ति ही सिद्ध करती है कि या तो वे दहशत में हैं, अथवा समाज के किसी दूसरे प्राणी को दहशत में रखना चाहते हैं। जिस भी व्यक्ति के अन्दर समाज की टीस होगी वह एकला चलो की राह पर ही चलता दिखाई देगा, क्योंकि ना तो वह अपने ऊपर किसी का खतरा समझता है और ना ही वह किसी दूसरे के लिए खतरा होता है।
               भारत की दीन-हीन लेकिन 26 रुपये प्रतिदिन में भरपेट भोजन करके मजे में जीवन व्यतीत कर रही देश की 96 करोड़ खुशहाल जनता को सोते से जगाने वाले 74 वर्ष के एक बुजुर्ग नौजवान श्री अण्णा हजारे के 12 दिन के अनशन से देश अथवा देश की जनता को जो मिला, इसका आंकलन बडे़-बडे़ समझदार लोग नहीं कर सकते। लेकिन इस आन्दोलन की कवरेज करने वाली मीडिया बिरादरी के 12 पत्रकारों को आखिरकार सरकार ने उपकृत करते हुए मीडिया एवं मानवाधिकार ग्रुप का सदस्य बना ही दिया। श्री अण्णा हजारे के आन्दोलन को दिये गये मीडिया कवरेज से खीज़ी सरकार ने वह काम कर दिखाया जो कोल्ड ब्लडेड (Cold Blooded) अंग्रेज भी नहीं कर पाया था।
               अभी हाल ही में लखनऊ के आईसीसीएमआरटी ऑडीटोरियम में आयोजित एक सेमिनार में इलैक्ट्रानिक मीडिया के एक पुरोधा ने उवाच किया कि अण्णा हज़ारे नाम के 74 वर्षीय बुजुर्ग से भारत सरकार नहीं घबराई थी, यह तो इलैक्ट्रानिक मीडिया की दहशत थी कि रामलीला मैदान पर 40 चैनलों की ओ0बी0वैन से सरकार डर गई, वरना कौन पूछ रहा है, अण्णा हजारे को! एक दूसरे चैनल के हेड, जिसने अपने कार्यक्रम में आलोक मेहता जैसे लोगों को मंच पर आसीन किया,जिन्होंने बड़ी चालाकी से सरकार का बचाव ही नहीं किया अपितू अण्णा हज़ारे और सिविल सोसाइटी को उसकी सीमा बताते हुए मूल मुद्दे से जनता को भटकाने की हरसम्भव कोशिश की। अतिरिक्त इसके चैनल हेड ने यह भी बताया कि किस तरह से उनके चैनल ने कई करोड़ के विज्ञापनों की हानि उठाकर लगातार अण्णा हज़ारे के अनशन की कवरेज की और देश पर एहसान किया।
               मैं नाम नहीं लेना चाहता था, लेकिन बगैर नाम लिए किसी भी तथ्य को समझने में परेशानी होती है, इसीलिए लिखना अपरिहार्य है कि-सीएसडीएस के विपुल मुदगल ने बड़े दम्भ के साथ उदघाटित किया कि भारत की सरकार अण्णा हजारे से नहीं घबराई थी, बल्कि हम इलैक्ट्रानिक चैनल वालों द्वारा दी जा रही कवरेज से घबराई थी। यदि रामलीला मैदान पर अण्णा हजारे के आन्दोलन की कवरेज इलैक्ट्रानिक मीडिया नहीं कर रहा होता तो कौन पूछता अण्णा हजारे को? मेरा मानना है कि यह एक प्रकार का नशा है जो खून में सरकारी नमक की अत्यधिक मात्रा होने के कारण परिलक्षित होता है। वैसे तो उन्होंने पत्रकारों को अपने दम्भ में न रहने की हिदायत भी दी, लेकिन अपना दम्भ दिखाने से कतई बाज नहीं आये।
               मुदगल जैसे लोग यह भूले हुए हैं कि ये ही चालीस कैमरे बाबा रामदेव के मंच के चारों ओर भी लगे थे, लेकिन सरकार न तो कैमरों से घबराई थी, ना ही बाबा रामदेव से। उसने ऐसा नंगा नाच किया कि उसे इन्हीं चालीस कैमरों ने कवर भी किया था, फिर भी सरकार ने इन कैमरों की परवाह नहीं की, एवं सारी कवरेज करने के बाद भी असली रिकार्डिग को दिखाने की किसी भी चैनल की हिम्मत नही हुई अथवा यह समझा जाये कि उस रिकार्डिंग से सौदेबाजी कर ली गई।। चालीसों कैमरों का जमघट, उ0प्र0 में भी लगा रहता है, बहुत सी घटनाओं की उल-जुलूल कवरेज करता है लेकिन प्रदेश सरकार तो कभी भी विचलित होती नहीं दिखाई देती। मंच पर उन्हीं के बगल बैठे धुआंधार चैनल के ब्यूरो प्रमुख के साथ उ0प्र0 की पुलिस ने क्या किया, क्या नहीं किया यह सच्चाई तो सारा मीडिया जानता है, लेकिन उन पुलिस अधिकारियों को निलंबित कराने के लिए पूरा मीडिया (विशेष तौर पर प्रिन्ट) जुट गया, यह जाने बगैर कि माज़रा क्या है। यह सत्ता की मीडिया पर दहशत थी अथवा मीडिया ने सत्ता को दहशत में लेने की कोशिश की, 21वें पैनल डिस्कशन के बाद निकल कर आये तो नीचे दिये ईमेल पते पर ईमेल कीजिएगा।
               आज के समय में जब इलैक्ट्रानिक मीडिया अपनी दहशत बनाने की कोशिश में है तो सरकारें यदि दहशत कायम किये हुए हैं तो क्या गलत है। सत्ता का मतलब ही है अपना इकबाल कायम रखना, और इकबाल बगैर दहशत के कायम हो ही नहीं सकता। सत्ता, दहशत और मीडिया के पैनल डिस्कशन में श्री मुदगल ने बहुत ही चतुराई से उपस्थित लोगों का मूंह सच्चाई से उलट फेरने की असफल कोशिश की और वे भूल गये कि वहां उपस्थित सारी ऑडीयेन्स, आईसीसीएमआरटी की स्टूडेन्ट नहीं थी। वे पत्रकार भी थे जो गली-कूचे की पत्रकारिता तो करते हैं,  लेकिन उनके अपने आंगन हैं, वे किसी दूसरे की गोदी में बैठकर नहीं खेल रहे हैं।  मंच पर भाषण दे रहे मि0 मुदगल किसे बेवकूफ समझ रहे थे,  कालचक्र के विनीत नारायण को, कोबरा पोस्ट के अनिरूद्ध बहल को, आईबीएन-7 के आशुतोष को,  द वीक के उप्रेती को अथवा कैनबिज टाइम्स के प्रभात रंजन दीन को। अथवा उन्हें वे पत्रकार बेवकूफ नज़र आये जो दुर्भाग्यवश उनका भाषण सुनने किसी की विनती पर पहुंच गये थे। 
               धुरन्धर पत्रकारों की पारदर्शिता की हालत यह है कि आमंत्रण-पत्र पर प्रिन्ट, फाउन्डेशन फॅार मीडिया प्रोफेशनल की वेबसाइट, माइक्रोफाइंग ग्लास से देखने के बाद बड़ी मुश्किल से नज़र आई, ठीक उसी तरह जैसे टाइम्स ऑफ इण्डिया अपनी इम्प्रिंट लाइन छापता है, वह भी सण्डे टाइम्स में। दरअसल ऐसा करना उसकी मजबूरी है, क्योंकि सण्डे में टाइम्स ऑफ इण्डिया छपता ही नहीं बल्कि सण्डे टाइम्स छपता है जो एक वीकली अखबार है। इम्प्रिंट लाइन में छपा वर्ष और अंक पाठक को पढ़ने में ही न आये तो अच्छा है। यही हाल एमएफपी का दिखाई देता है, वरना क्या कारण है कि इतने छोटे अक्षरों में वेबऐड्रेस डाला गया जो साधारण ऑखों से दिखता ही नहीं। जब इस संस्था का पार्टनर FREIDRICH EBERT STIFTUNG है तो निश्चित रूप से इसके भी अपने निहितार्थ होंगे। यदि इस स्तम्भ को पढ़ने के बाद कोई आईएसआई संस्था द्वारा संचालित कश्मीर अमेरिकन काउन्सिल के पैनल पर दर्ज पत्रकारों की लिस्ट ईमेल करदे तो इस देश पर और मुझपर बहुत एहसान होगा। कम से उसे जानकारी तो मिलेगी कि जनता की आवाज को सरकार तक पहुचाने का दावा करने वाला, दरअसल मुखौटा ओढ़े पाकिस्तानी खुफिया ऐजेन्सी आईएसआई की आवाज बना हुआ है, वह भी बगैर किसी अतिरिक्त भुगतान के।
               जिन 12 पत्रकारों को आय से अधिक सम्पत्ति रखने के आरोपी एवं पाक ईमानदार, महान्यायाधिपति बालाकृष्णनन के मानवाधिकार आयोग में एक ग्रुप का सदस्य बनाया गया है, उनमें इलैक्ट्रानिक मीडिया का एक पत्रकार भी सम्मलित किया गया है। इसमें हैं, दैनिक जागरण के पुश्तैनी पत्रकार-कम-मालिक संजय गुप्त, जो वैसे तो कभी कभार ही सरकार के खिलाफ कुछ छाप पाते हैं, लेकिन जब सरकार विज्ञापन बन्द कर देती है तो माफी मांगकर पुनः विज्ञापन शुरू किये जाने की चिरौरी भी करते हैं। इनका अखबार एक अन्य गुनाह का भी भागीदार है, जिसे अभी यहॉं अंकित किये जाने का सही वक्त नहीं है। एच.टी. मीडिया लि0 के हिन्दी एवं अंग्रेजी दोनों अखबारों के क्रमशः शशी शेखर त्रिपाठी एवं संजीव नारायण। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया (सरकारी स्वामित्व की एक पब्लिक लि0 कम्पनी) के एम.के.राजदान, आजतक इलैक्ट्रानिक चैनल के कमर वाहिद नकवी, द वीक पत्रिका के दिल्ली स्थानीय सम्पादक के.एस.सच्चिदानन्द मूर्ति एवं नई दुनिया के सरकारी सम्पादक आलोक मेहता। ये सब रहेंगे बालाकृष्णनन के चाबुक के नीचे ही, क्योंकि इस ग्रुप का अध्यक्ष भी बालाकृष्णनन को ही बनाया गया है।  आय से अधिक सम्पत्ति रखने के आरोपी के ग्रुप में इन 12 पत्रकारों को इसीलिए रखा गया है कि बालाकृष्णनन को भी खबरों से राहत मिले और पत्रकारों को आय से अधिक सम्पत्ति छिपाने की तरकीब बालाकृष्णनन इन्हें सिखायें। इसका सीधा मतलब है कि भारत सरकार ने इन लोगों को भरपेट खाने के लिए चारे का इंतजाम कर दिया है। आप यह सोचकर घबराईयेगा नहीं कि हमारे इन पत्रकार बन्धुओं को दिनभर के खाने के लिए केवल 32 रूपये ही मिलेंगे। इन्हें अब खाने-पीने की कोई कमी नहीं रहेगी। ये बिल्कुल कपिल सिबल, पी.चिदम्बरम, और अन्य मंत्रियों की तरह ही खा-पी सकेंगे। बस इनको यह सुविधा नहीं मिलेगी कि ये हवा में (2-जी स्पैक्ट्रम से) पैसे बना पायें। 
               इन पत्रकारों को आप कहॉं पकड़ पायेंगे? किसी को यदि किसी अपराध में पकड़ा जाता है तो उसकी भरपूर पब्लिसिटी तो यही करते हैं। जब ये ही कमाने लगेंगे तो खबर गई तेल लेने! कोई भी खबर हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स के किसी भी संस्करण में छपने से रही। दैनिक जागरण के पूरे भारत में किसी भी संस्करण में छपने से रही। पूरे हिन्दुस्तान भर में आजतक पर दिखाई देने से रही। द वीक में छपे न छपे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। पी0टी0आई0 तो पहले से ही सरकारी भोंपू है। कुल मिलाकर सरकार ने 40 भोंपुओं के एवज में एक खेप में 12 पत्रकारों को खपा कर एक ही झटके में 30 प्रतिशत खबरों पर जबरदस्त कब्जा कर लिया है। 30 प्रतिशत मामलों पर उसने कब्जा दिलीप पडगॉवकर, बरखा दत्त, वीर सिंघवी, कुलदीप नैय्यर, कमल मित्र शिनाय, रीता मनचन्दा, हरिन्दर बावेजा, गौतम नवलखा, और राजिन्दर सच्चर जैसे पत्रकारों की कलम पर पहले से ही बनाया हुआ है। बचे हुए 40 प्रतिशत की खेप को किसी दूसरे अन्य आयोग में खपाने की जुगत सरकार चला रही है। बस चालीसों चैनल को उपकृत करके सरकार आराम से बंशी बजाते हुए सो सकती है। अगर इतना सरकार कर लेती है तो समझिये सरकार ने बाजी मार ली। फिर बकौल मि0 मुदगल कौन पूछ रहा है, अण्णा हजारे को, तब क्या जरूरत है इस देश की अनपढ़, गरीब और लाचार जनता के बारे में सोचने की, कुछ करने की?
               इससे तो यही लगता है कि अगर सरकार सुधरना चाहे तो भी, हमारी बिरादरी, तथाकथित वकील से मंत्री बने नेता एवं अन्य बुद्धिमान लोग उसे सुधरने नहीं देंगे। यदि सरकार सुधर गई तो उनकी दाल-रोटी कैसे चलेगी! अब इन्हें कौन समझाये कि जब इस देश के लोगों ने देश को स्वतन्त्र कराने की लड़ाई लड़ी थी तो इस देश में इलैक्ट्रानिक चैनल नाम का कोई तंत्र नहीं था। दैनिक जागरण नामक प्रोडक्ट भी नहीं था, सरकारी ऐजेन्सी पी0टी0आई0 और यू0एन0आई0 भी नहीं थी, अगर होती तो भी उसका चरित्र वही होता जो आज है, यानी सरकारी भोंपू। मेरे अल्प ज्ञान के अनुसार जिन समाचार-पत्रों ने देश को स्वतन्त्र कराने में अग्रणी भूमिका निभाई उनमें से ज्यादातर अब बन्द हो चुके हैं, क्योंकि उस समय के अखबारों में एक तो मार्केटिंग नहीं हुआ करती थी, जिनमें कुछ प्रतिशत थी भी तो वे बन्दे एडीटोरियल हेड के अधीन कार्य किया करते थे। आज की तरह नहीं कि एडीटर, मार्केटिंग हेड के अधीन कार्य करता है, क्योंकि इलैक्ट्रानिक और प्रिन्ट मीडिया अब एक प्रोडक्ट हो गये हैं, उनमें एक ब्राण्ड मैनेजर और प्रोडक्ट मैनेजर होता है, और इसी के अधीन सबकुछ होता है। फिर चाहे इसे सम्पादक समझिये अथवा महाप्रबन्धक। सम्पादन का हुनर रखने वाला तो अनपढ़ों/कम पढ़े लिखों की बायोग्राफी लिख गुमनामी के अंधेरे में ही जीने को विवश है। 
               सरकार के कान में यह कौन डालेगा कि मीडिया का वह हिस्सा जो उसके आस-पास दिखाई दे रहा है, अब उसके हांथ में कुछ नहीं बचा है। अण्णा हजारे की आवाज अब गॉंव-गॉंव पहुंच गई है एवं उसके साथ में वह मीडिया भी है, जिसे सरकारें दीन-हीन और देशी कुत्ता समझती हैं, लेकिन ये भूल जाती हैं कि कुत्ता काट भी तो सकता है। और ऐसा कुत्ता जिसे एण्टी रैबीज़ का सरकारी इंजैक्शन नहीं लग रहा है, काटेगा तो जान बचाने के लिए 14 इंजैक्शन तो लगवाने ही पड़ेंगे। बावजूद इसके गारन्टी नहीं कि आप बच ही जायें। आज अण्णा हजारे के साथ वैसा ही मीडिया है, जैसा देश को स्वतन्त्र कराने के लिए उन देशभक्तों के साथ था। उनके साथ वे मीडिया के बन्धु हैं, जो स्वंय में मालिक, सम्पादक, विज्ञापन प्रबन्धक, प्रसार प्रबन्धक, रिर्पोटर और चपरासी सबकुछ वही हैं। वह भी 32 रूपये का दिनभर में खाना खाकर,खुशहाल एवं तन्दरूस्त हैं। ऐसे इस देश में कितने करोड़ लोग हैं, सरकार को आंकड़ा निकलवाना पड़ेगा, जो दिल, दिमाग और शरीर से अण्णा के साथ हैं। तभी तो ये नारा बुलन्द हुआ है कि तू भी अण्णा, मैं भी अण्णा, अब तो सारा देश है अण्णा। इन कई करोड़ लोगों को सरकार किसी भी और कितने ही आयोग में खपा नहीं सकती, क्योंकि उसकी नीयत ही ऐसी नहीं है। इस तथ्य को भली प्रकार समझते हुए सरकार को अब दिखावा नहीं अपितू वह कार्य करना चाहिए जो जनता, अण्णा हज़ारे जी के माध्यम से मॉंग रही है।
               यदि अब भी सरकार को लगता है कि दिल्ली के इण्डिया गेट पर आइसक्रीम खाने वाली भीड़, अण्णा के रामलीला मैदान पर फिल्म का प्रीमीयर देखने चली गई थी, वह भी छोटे-छोटे, नन्हे-नन्हे बच्चों को लेकर, तो फिर अल्लाह ही मालिक है ऐसी सरकार का! जब इस देश की 543 रियासतों को अर्श से फर्श पर आने में 24 घन्टे का वक्त नहीं लगा तो फिर इन डुप्लीकेट राजाओं को जो फर्श से ही अर्श पर पहुंचे हैं, फर्श पर आने में कितना वक्त लगेगा, इस अर्थमेटिक को तो सरकार का प्लानिंग कमीशन बगैर कमीशन के हल कर सकता है। यह देश तो सोने की चिड़िया था, है,और रहेगा, जो इसे अपना ना समझे, वह जितनी तबीयत करे लूटे, लेकिन डकैतों का क्या हश्र होता है, किसे बताने की जरूरत है। यह तो वह देश है, जिसे 700 वर्ष तक मुगलों ने लूटा और 300 वर्ष तक अंग्रेजों ने तबीयत से लूटा, अब चोरों के सरदार लूट रहे हैं, लेकिन क्या फर्क पड़ता है! हिन्दुस्तान कल भी सोने की चिड़िया था,आज भी सोने की चिड़िया ही है एवं आगे भी सोने की चिड़िया ही रहेगा, ये मेरा दावा है।
सतीश प्रधान

0 comments:

Post a Comment

Pls. if possible, mention your account address.