Thursday, 8 September 2011

अभूतपूर्व लोकतांत्रिक प्रयास

        अन्ना हजारे के आंदोलन ने इस देश की जनता को एक अभूतपूर्व जगह पर ला खड़ा किया है, जो रास्ता देश को दुनिया के शिखर पर ले जा सकता है, वहीं दूसरी ओर वही पुराना रास्ता है, जो उसे एक अन्तहीन खाई में डुबोने को तैयार है। दूसरे रास्ते पर सरकार है, संसद है, उसके सदस्यों का विशेषअधिकार है, भ्रष्टाचार है, अनाचार है और सभी प्रकार का दुव्र्यवहार है। अब सरकार ही नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक पार्टियों के साथ -साथ अन्य बुद्धिजीवियों पर भी निर्भर करेगा कि वे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं । पूरे प्रकरण को समझने के लिए यह जानना होगा कि इस पूरे आंदोलन की प्रकृति क्या है, स्वरूप क्या है, इसकी दिशा क्या है, इसके व्यापक उद्देश्य क्या हैं और इससे क्या सबक लिए जा सकते हैं? आजादी के बाद यह एक ऐसा देशव्यापी आंदोलन है जिसका नेतृत्व राजनेताओं के हाथ में न होकर आम नागरिक एवं उसके मसीहा माननीय अण्णा हजारे जी के पास है। इससे पूर्व के कुछ आंदोलन जिन्होंने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया था उनमें जेपी का 74 का आंदोलन, मंदिर आंदोलन और फिर मंडल कमीशन के आंदोलन को शामिल किया जा सकता है। लेकिन अन्य सारे आन्दोलनों की प्रकृति एवं अण्णा हजारे के आन्दोलन की प्रकृति में जमीन-आसमान का फर्क अपने आप समझ में आता है।
          मंदिर आंदोलन से जहां मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध आदि धर्मावलंबी और हिंदुओं का सेक्युलर तबका अलग था, तो मंडल आंदोलन से सवर्ण एकदम से बाहर थे। इनमें जेपी का आंदोलन एकबारगी ऐसा आंदोलन समझा जा सकता है, जिससे जनता जुड़ी तो थी पर उसमें राजनीति से जुड़े लोग ही थे जिसका नेतृत्व राजनेताओं के पास था और जिनका उद्देश्य संपूर्ण क्रांति कम सत्ता परिवर्तन अधिक था। अण्णा का आंदोलन नेतृत्व-भागीदारी से लेकर उद्देश्य तक आम जनता का ही आंदोलन है और इसका तात्कालिक लक्ष्य भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए एक सशक्त जनलोकपाल कानून को लाना है, हालांकि इसके देशहितकारी अन्य दूरगामी परिणाम भी निश्चित हैं।
          अनेक राजनीतिक चिंतक, जिनके दिमाग में राजनीति को पोषित करने की चिंता ज्यादा है, इस आंदोलन को संसदीय लोकतंत्र या दलगत राजनीति के लिए एक खतरा बताते हैं, लेकिन इस सवाल का वे जवाब नहीं देते कि इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार कौन है। कठघरे में सिर्फ कांग्रेस ही नहीं खड़ी है, बल्कि भाजपा, कम्युनिस्ट पार्टियां और अन्य अधिकांश दल भी शामिल हैं। वरना क्या कारण है कि आज किसी राजनेता या दल में वह नैतिक साहस नहीं है कि वह किसी मुद्दे पर खड़े हों और पूरा देश उनके पीछे आ जाए। इसके लिए क्या अन्ना या भारत की गाय समान जनता जिम्मेदार है? जी हॉं, एक मायने में है भी।
          64 सालों से जब अनाचार, अत्याचार, जबरदस्त मंहगाई, अपने धन की जबरदस्त लूट, नेताओं द्वारा मूर्ख बनाने के बाद भी वह चुप बैठी है, तो वह कैसे जिम्मेदार न मानी जाये? लोग संसद को अपने घर की तरह चला रहे हैं। जनता ने अपना प्रतिनिधि उन्हें क्या बना दिया वे मालिक बन बैठे। इस देश का वही हाल इन राजनेताओं ने कर रखा है, जैसे कोई नाबालिग लड़की,अपनी सुरक्षा के लिए किसी व्यक्ति को सुरक्षा में रख ले, इसके बाद वह सुरक्षाकर्मी उसके हर मूवमेन्ट पर अपनी पकड़ मजबूत कर ले एवं इसके बाद वह उसी की इज्जत से भी खेले तो वह क्या कर सकती है? कहीं आवाज उठाने की कोशिश करे तो वह सुरक्षाकर्मी बोले कि अरे इसने तो मुझे ताजिन्दगी का ठेका दिया हुआ है कि वह उसकी सुरक्षा करेगा, अब इसे कुछ भी बोलने-कहने का अधिकार नहीं है। इसका माई-बाप तो मैं हूं। वही हाल इस देश की जनता का इन राजनेताओं ने किया हुआ है। पांच साल के लिए चुन क्या दिया! ये जनता के गार्जियन हो गये। चाहे जनता का धन लूटकर विदेशी खाते में जमा करें या पशुओं का सारा चारा ही खा जायें! सारा माल इनका, इनके बाप का, जनता तो इनकी गुलाम है।
          इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि इतना बड़ा, देशव्यापी और स्वतःस्फूर्त आन्दोलन होने के बावजूद, यह पूरी तरह से अहिंसक रहा है और यही इस आंदोलन की शक्ति भी रही, क्योंकि सरकार को जरा भी मौका मिलता तो इसे कुचलने में वह किंचित मात्र भी विलम्ब नहीं करती। अहिंसक होने से ही इसे व्यापक जनसमर्थन मिलता चला गया। यह अनायास नहीं है कि पूरी दुनिया के मीडिया ने इस आंदोलन को प्रमुखता से कवरेज देते हुए इसकी सफलता का गुणगान किया।और तो और पाकिस्तान जैसे सैन्य तानाशाही वाले देश या खूनी संघर्ष से उथल-पुथल हो रहे अरब देशों में अण्णा हजारे से प्रेरणा लेने की बात होने लगी है। इस आंदोलन के स्वरूप पर आरोप लगाते हुए सरकार, राजनीतिक दल और सरकारी प्रतिनिधियों के साथ ही सरकार द्वारा पोषित कुछ मीडियाकर्मीयों ने भी, जिनमें नई दुनिया के आलोक मेहता प्रमुख हैं, इसे मीडिया हाइप की संज्ञा से नवाजा और मीडिया मैनेज्ड,  आरआरएस द्वारा प्रायोजित एवं अमेरिकी सरकार द्वारा समर्थित बता दिया।
           अरे मनमोहन सिंह के अमेरिका परस्त होने के बावजूद उल्टा इलजाम सिविल सोसाइटी पर? सरकार में मंत्री रेणुका चौधरी ने तो आईबीएन-7 वालों पर पीपली लाइव की तरह बर्ताव करने वाला करार दिया। उसी तरह कुछ विश्लेषक इसे सवर्णवादी, अभिजन वादी, कारर्पारेटवादी बता रहे थे, लेकिन सच इनसे कोसों दूररहा। यह सही है कि आंदोलन को मीडिया ने खासा कवरेज दिया, लेकिन सिर्फ मीडिया के सहारे कोई आंदोलन नहीं चल सकता जब तक उसके पीछे कोई ठोस सामाजिक-आर्थिक कारण न हो। अगर ऐसा होता तो मीडिया वाले स्वंय अपने लिए विधायकों और सांसदों की तरह सुविधा-सम्पन्न न हो जाते! अथवा वे भी सांसद विधायक ना हो जाते।
            यह अनायास नहीं था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जो देश की मुस्लिम राजनीति को एक बौद्धिक दिशा देता है, के शिक्षकों और छात्रों ने अण्णा के समर्थन में उदघोष किया। उसी तरह यह भी गलत है कि यह आंदोलन सवर्णवादी, अभिजनवादी है। वैसे भी निम्न वर्ग के लोग पूरे समाज के आन्दोलन की न तो बात करते है और ना ही ऐसी सोच उनकी है। उन्हें तो हर स्थान पर बिना कुछ किये अपनी भागीदारी ही सुनिश्चित कराने के लिए झंडा उठाने की बात ही ध्यान में रहती है। यह ठीक है कि इसका नेतृत्व अभी सवर्ण और अभिजन कर रहे हैं, लेकिन आंदोलन से सबसे अधिक फायदा समाज के निम्न वर्ग के लोगों को ही होगा, जिनके बुनियादी हक को भ्रष्टाचार का दानव हड़प और हजम किए जा रहा है। इस रूप में यह आंदोलन दलितों, पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के लिए सबसे अधिक हितकारी है। अनेक दलित और पिछड़ी जातियों के बुद्धिजीवियों ने बताया है कि वे पूरी तरह से अण्णा के साथ हैं।
             इस आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति युवा वर्ग है, जो समाज के सभी धर्म-जाति-वर्ग-क्षेत्र के हैं और जिनकी संख्या 25 करोड़ से ज्यादा है। यह युवा वर्ग पहले के किसी भी भारतीय आंदोलनों की अपेक्षा ज्यादा शिक्षित, ज्यादा सूचनाओं से लैस और ज्यादा जागरूक और समझदार है। सबसे बड़ी बात यह है कि दिग्भ्रमित कहे जाने वाली इस युवा पीढ़ी की ऊर्जा अभूतपूर्व रूप से जाग गई है जिसकी आकांक्षाओं को ज्यादा दबाया नहीं जा सकता। वैसे तो युवा नेतृत्व के नाम पर धुरन्धर राजनेताओं के ही पुत्र-पुत्रियों को राजनीति में लाने की साजिश रची जा रही थी, और कांग्रेस के युवराज लला राहुल ने अपनी टीम ऐसे ही लोगों की बनाई हुई है, लेकिन उनकी सोच भी उनके पुरखों से भिन्न कतई नहीं है।
     सरकार, कांग्रेस, भाजपा या अन्य सभी राजनीतिक दलों को समझ लेना चाहिए कि उनका कोई भी गलत अथवा दम्भ भरा कदम राजनेताओं और राजनीति पर पहले से ही गहरे अविश्वास को और मजबूत ही करेगा जिसके जिम्मेदार वे स्वयं होंगे। सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा आंदोलन को अमेरिका पोषित कहना या इसे भ्रष्ट बताते हुए यह कहना कि कहां से आंदोलन के लिए पैसा आ रहा है, सच्चाई को ठुकराने वाली बात है। अण्णा में लोगों का इतना विश्वास है कि उनके आंदोलन को धन की कमी ना है और न रहेगी। आरोप लगाने वाले यह भी सोच लें कि यह पैसा स्विस बैंक से तो कतई नहीं आ रहा है। एक सरल गणित को समझ लें कि देश के एक करोड़ लोग इतने सक्षम तो हैं ही कि हर कोई अण्णा को सिर्फ सौ-सौ रुपये भी दे तो यह राशि सौ करोड़ हो जाती है। हालांकि अण्णा के आंदोलन का कुल खर्च अब तक एक करोड़ का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाया है।
              आज अन्ना का समर्थन करने के बावजूद जनलोकपाल बिल से अन्य राजनीतिक पार्टियां भी पूरी तरह से सहमत नहीं हैं, लेकिन क्या इसमें उनका स्वार्थ आड़े नहीं आ रहा है! या सचमुच इसके दूरगामी दुष्परिणाम भी उन्हें ही भुगतने पड़ सकते हैं इसका अन्दाजा लगाने का उनमें माद्दा ही नहीं है। राजनीतिक पार्टियों को समझ लेना चाहिए कि न तो उनको इतिहास माफ करेगा, न ही भविष्य स्वीकारेगा और वर्तमान तो उनके सामने है, जो उन्हें कतई माफ करने को तैयार नहीं है क्योंकि वह अपनी विश्वसनीयता ही खो चुके हैं। 
सतीश प्रधान

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