Thursday, 8 September 2011

संसद, जहां से दूरदर्शी सुधार और कानून निकलते ही नहीं


         राजनीतिक पार्टियों को समझ में नहीं आ रहा है कि दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर मुंबई के आजाद मैदान तक हवा में लहराती हजारों मुठ्ठियों ने संसद पर ही सवाल उठाये हैं। जनता के सवाल लोकतंत्र में महाप्रतापी संसद की गरिमा और सर्वोच्चता पर हैं, जनता तो संसद की स्थिति, उपयोगिता, योगदान, नेतृत्व, दूरदर्शिता, सक्रियता और मूल्यांकन पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर मजबूर हुई है। बदहवास सरकार, जड़ों से उखड़ी कांग्रेस और मौकापरस्त विपक्ष को यह कौन बताए कि जब-जब संसदीय गरिमा का तर्क देकर संविधान दिखाते हुए पारदर्शिता रोकने की कोशिश होती है तो लोग और भड़क जाते हैं। 
        देश उस संसद से ऊब चुका है जो चलती ही नहीं है, जिसे अपने व्यक्तिगत उद्देश्य की पूर्ति के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने में आपत्ति नहीं होती लेकिन लोकपाल बिल पास करने के लिए विशेष सत्र बुलाना उसे गंवारा नहीं। वह संसद, जिसका आचरण शर्म से भर देता है, वह संसद, जहां नोट बंटवाने वाले सम्मान के साथ आराम से घूम रहे हैं, वह संसद जिसमें गम्भीर से गम्भीर मुद्दों पर बहस होने के बजाय शोर-शराबे, हल्ला-गुल्ला और सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ती है।
        वह संसद, जो उन्हें लंबे इंतजार के बावजूद भ्रष्टाचार का एक ताकतवर पहरेदार यानी लोकपाल उसके दरबार में आठ बार पेश होने के बाद भी उस निरीह जनता को आजतक नहीं दे सकी है। वह संसद, जो महिलाओं के आरक्षण पर सिर्फ सियासत करती है। वह संसद, जहां से दूरदर्शी सुधार और कानून निकलते ही नहीं। वह संसद, जो सरकार के अधिकांश खर्च पर अपना नियंत्रण खो चुकी है, ऐसी संसद से जनता खफा न हो तो और क्या उसकी आरती उतारे। जिस भारत में गरीबों को रैन बसेरा दिलाने से लेकर पुलिस को सुधारने तक और गंगा से लेकर भ्रष्टाचारियों की सफाई तक जब बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट ही कराता हो, तो अपनी विधायिका यानी संसद के योगदान व भूमिका पर सवाल उठाना नागरिकों की प्रथम और महत्वपूंर्ण जिम्मेदारी बनती है।
        जनलोकपाल का आंदोलन दरअसल संसद पर ही सवाल उठा रहा है, जिसके दायरे में सत्ता पक्ष व विपक्ष, दोनों आते हैं। यह एक नए किस्म का मुखर लोकतांत्रिक मोहभंग है। राजनीतिज्ञ एवं मोहल्ले-टोले की राजनीति कर रहे लोग अभी भी भाड़े की भीड़ वाली रैली छाप मानसिकता में ही जी रहे हैं, उन्हें अण्णा के आंदोलन में जुटी भीड़ तमाशाई दिखती है! अण्णा के पीछे खड़ी भीड़ आधुनिक संचार की जुबान में एक वाइज क्राउड थी, जिसे एक समझदार समूह समझना ही राजनीतिज्ञों के लिए बेहतर होगा, वैसे यह उनकी मर्जी कि वे इसे क्या समझते हैं। यह छोटा समूह जो संवाद, संदेश और असर को जानता-पहचानता है, तकनीक जिसकी उंगलियों पर है, जिसे अपनी बात कहना और समझाना आता है। जिसके पास भाषा, तथ्य, तजुर्बे और तर्क हैं।
        भ्रष्टाचार पूरे देश के पोर-पोर में भिदा है इसलिए अण्णा की आवाज से वह गरीब ग्रामीण भी जुड़ जाता है, जिसने बेटे की लाश के लिए पोस्टमार्टम हाउस को रिश्वत दी और वह बैंकर भी सड़क पर आ जाता है जो कलमाड़ी व राजा की कालिख से भारत की ग्रोथ स्टोरी को दागदार होता देखकर गुस्साया है। जनलोकपाल की रोशनी में जनता यह तलाशने की कोशिश कर रही है कि आखिर पिछले तीन दशक में उसे संसद से क्या मिला है? वैसे तो इस सवाल पर जोरदार सार्वजनिक बहस होनी चाहिए थी, लेकिन इसके लिए ये नेता तैयार नहीं हैं। 15 लोकसभाएं बना चुके इस मुल्क के पास अब इतिहास, तथ्य व अनुभवों की कमी नहीं रह गई है।
        अगर ग्रेटर नोएडा के किसान हिंसा पर न उतरते तो संसद को यह सुध नहीं आती कि उसे सौ साल पुराना जमीन अधिग्रहण कानून बदलना भी है, बड़ी मुष्किल से उसने इसे बदला तो है, लेकिन मात्र दिखावे के लिए। अगर सुप्रीम कोर्ट आदेश (विनीत नारायण केस) न देता तो सीबीआई, प्रधानमंत्री के दरवाजे बंधी रहती और केंद्रीय सतर्कता आयोग के मातहत शायद न आई होती। दलबदल ने जब लोकतंत्र को चैराहे पर खड़ा कर दिया तब संसद को कानून बनाने की सुध आई। आर्थिक सुधारों के लिए संकट क्यों जरूरी था? नक्सलवाद जब जानलेवा हो गया तब संसद को महसूस हुआ कि आदिवासियों के भी कुछ कानूनी हक हैं। वित्तीय कानून बदलने के लिए सरकार ने शेयर बाजारों में घोटालों की प्रतीक्षा की। ऐसी परिस्थितियों के बावजूद क्या संसद से जनता का मोहभंग होना नाजायज करार दिया जायेगा?
        भारतीय संसद की कानून रचना और क्षमता भयानक रूप से संदिग्ध है। एक युवा देश आधुनिक कानूनों के तहत जीना चाहता है, मगर भारतीय विधायिका के पास हंगामे का तो वक्त है, कानून बनाने का नहीं। सांसद खुले रूप में संसद में यह वकतव्य देने के लिए स्वतंत्र हैं कि उन्हें खूब आता है, इसकी टोपी उसके सिर और फिर उसकी टोपी इसके सिर करना इसे कोई उन्हें ना सिखाये। उनका दिन भर का काम ही यही है। कानून बनाने में जानबूझकर देरी किया जाना अच्छे कानून बनाने की गारंटी नहीं है, बल्कि यह साबित करता है कि विधायिका गंभीर नहीं है। हमारी संसद न तो वक्त पर कानून दे पाती और ना ही कानूनों की गुणवत्ता ऐसी होती है जिससे विवाद रहित व्यवस्था खड़ी हो सके।
        जनलोकपाल के लिए सड़क पर खड़े तमाम लोगों के पास कार्यपालिका के भ्रष्टाचार के करोड़ों व्यक्तिगत अनुभव हैं। संविधान ने विधायिका यानी संसद को पूरे प्रशासन तंत्र (कार्यपालिका) की निगरानी का काम भी दिया था। संसद यह भूमिका गंवा चुकी है, या राजनीति को सौंप चुकी है, यह भी शोध की विषय वस्तु है। अदालतें इंसाफ ही नहीं कर  रही हैं बल्कि लोगों को रोटी और शिक्षा तक दिला रही हैं, तो लोग महसूस करते हैं कि संसद प्रभावहीन हो गई एवं कुछ करना भी नहीं चाहती है। इसलिए न्यायपालिका को आधारभूत ढांचे की तरफ लौटना पड़ा, जिसके तहत संविधान के बुनियादी मूल्यों को बचाना भी अदालत की जिम्मेदारी है (गोलकनाथ केस-1967)।
         नेता जब अदालतों पर गुस्साते हैं या संवैधानिक संस्थाओं को उनकी सीमाएं बताते हैं तो लोगों का आक्रोश और भडक जाता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का अंतरराष्ट्रीय इतिहास जनता और स्वयंसेवी संस्थाओं ने ही बनाया है। सरकारें दबाव के बाद ही बदलती हैं। इन जन आंदोलनों की बदौलत ही आज भ्रष्टाचार के तमाम अंतरराष्ट्रीय पहरेदार हमारे पास हैं। यह पहला मौका नहीं है जब जनता विधायिका को राह दिखा रही है। 2002 में निकारागुआ में पांच लाख लोगों ने एक जन याचिका के जरिए संसद को इस बात पर बाध्य कर दिया था कि भ्रष्ट राष्ट्रपति अर्नाल्डो अलेमान पर मुकदमा चलाया जाए। संसद की सर्वोच्चता पर किसे शक होगा, मगर इसके क्षरण पर अफसोस पूरी जनता को है।
         जनता, अदूरदर्शी, दागी और निष्प्रभावी संसद से गुस्से में है। वह संसद को उसकी संवैधानिक साख लौटाना चाहती है। कानून तो संसद ही बनाएगी, लेकिन इससे अच्छा लोकतंत्र क्या होगा कि जनता मांगे और संसद कानून बनाए। जनलोकपाल की कोशिश को संसद की गरिमा बढ़ाने वाले अनोखे लोकतांत्रिक प्रयास के तौर पर देखा जाना क्या 125 करोड़ की जनता का अभिवादन करने जैसा नहीं है, और इस पर क्या संसद को ईमानदारी से सेाचना नहीं चाहिए कि अब वक्त आ गया है जब संसद को जनता की आवाज बिना किसी लाग-लपट और चू-चपड़ के चुपचाप शराफत से सुन लेनी चाहिए। सतीश प्रधान

4 comments:

Anonymous [India] said...

very good work.

Anonymous [India] said...

Nicely written.Everything is good but the format is somewhat lacking(I had to search the option for giving comment & it was something difficult)

Anonymous [Latvia] said...

A truth about India's Parliament.Disgracefull

Anonymous [Nepal] said...

Bahut achcha likha hai. Padhne mein maza a gaya.

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