Saturday, 8 October 2011

बैंकिंग व्यवस्था के कर्णधार हैं, भारत के साहूकार



          भारत के प्रधानमंत्री पद पर भले ही आर्थिक जगत के धुरन्धर कहे जाने वाले महान अर्थशास्त्री डा0 मनमोहन सिंह विराजमान हों,  लेकिन भारत के सन्दर्भ में उनकी भूमिका अर्थशास्त्री की कम अनर्थशास्त्री की ज्यादा है। भारत की आर्थिक नीतियों को कन्ट्रोल करने वाला ऑटोनामस संस्थान, भारतीय रिजर्व बैंक, यदि किसी की चिन्ता कर रहा है,तो वे हैं देश के कार्पोरेट घराने एवं प्राइवेट बैंक्स। भारत की गरीब जनता को यदि कर्ज की कोई सुविधा उपलब्ध करा भी रहा है तो वे हैं गॉ़व के कोने-कोने में फैला हुआ साहूकारों का नेट(जाल)। एक-एक साहूकार,बैंक की एक-एक ब्रान्च के बराबर है, जिनकी संख्या हजारों में नहीं, लाखों में है एवं उनका कारोबार भी लाखों हजार करोड़ रुपयों का है। इस पर आश्चर्य केवल उसे ही हो सकता है जिसे इस सच्चाई का पता ही ना हो अथवा जो सच्चाई को जानते हुए भी जानबूझकर इसे स्वीकार करने की हिम्मत ना रखता हो।
          बैंकिंग क्षेत्र के विकास के बारे में चाहे जो भी और जितने भी दावे किये जायें, लेकिन यह कटु सत्य है कि निम्न आय वर्ग की करोडों जनता को जब भी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है तो उनका एक मात्र सहायक और मददगार साबित होता है साहूकार। यह अलग बात है कि ये साहूकार एक सौ पचास प्रतिशत प्रतिवर्ष तक का वार्षिक ब्याज वसूलने से चूकते नहीं हैं, और इन पर देश का कोई भी, किसी भी प्रकार का कानून लागू नहीं होता है। देश के कोने-कोने में साहूकार मौजूद हैं, जबकि देश को आजाद हुए साढ़े छह दशक होने को आये, इसके बाद भी क्या गॉंव-गॉव में बैंक की शाखा खोलने में भारतीय रिजर्व बैंक ने दिलचस्पी दिखाई है? कदापि नहीं, क्योंकि उसका इरादा ही ऐसा नहीं है। उसका ध्यान केवल स्वदेशी नॉन बैंकिंग संस्थाओं पर दादागिरी करने और कार्पोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने तक ही सीमित है। देश में क्रेडिट गैप को किस तरह पूरा किया जाये और बैंकों के प्राथमिकता सेक्टर में कौन से क्षेत्र डाले जायें इससे उसका रत्ती भर का भी लेना-देना नहीं है। यह केन्द्र सरकार की समस्या हो सकती है, वह तो ऑटोनामस संस्थान है, इसलिए मनमर्जी करना उसका पहला परम कर्तव्य है।


          गॉंव की ओर रुख करने से पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ही बैंकिंग जगत की हालात से आपको रूबरू कराते हैं। बैंक चाहे प्राइवेट सेक्टर का हो या वाणिज्यिक, ये बैंकें, पत्रकार, वकील और पुलिस वालों को कर्ज देने को अपनी निगेटिव लिस्ट में रखती हैं। इस लखनऊ क्या पूरे देश का मुश्किल से प्वांइट एक प्रतिशत पत्रकार होगा जो शायद पत्रकार बताकर बैंक से कर्ज पा गया हो वरना कर्ज पाना उसके लिए टेढ़ी खीर है। वकीलों में भी लोअर कोर्ट का वकील शायद ही कर्ज पा सका हो और यही हाल पुलिस वालों का भी है। यहां बात मालिक-कम-पत्रकार, हाईकोर्ट के वकील और पुलिस के आईपीएस अधिकारियों की नहीं की जा रही है, क्योंकि ये तो इलीट क्लास में आते हैं। एक बडे समाचार पत्र के वरिष्ठ पत्रकार जिनका एक अपना जबरदस्त नेक्सस है और जिनकी तूती बोलती है, वह भी अपने नाम से कार का लोन पाने में असमर्थ रहने के पश्चात अपने पिता (जो कि सरकारी टीचर हैं) के नाम से ही कार का लोन पा सके। यह हाल है समाज के इन रसूखदार लोगों का, तो भारत की दीन-हीन निरीह, निम्न आय वर्ग वाली आबादी को कैसा लोन कहॉं का लोन!
          इन खास श्रेणी के प्वाइंट एक प्रतिशत लोगों को भी यदि किसी बैंक ने कर्ज दे दिया हो तो बड़े अचम्भे की बात है। अगर ऐसा हुआ भी होगा तो वह भी उस ग्राहक की क्रेडिबिलिटी इतनी गजब की होगी कि उसे कर्ज देने से इंकार करना उस बैंक के स्वयं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक दिखाई दिया होगा तभी उस पत्रकार को कर्ज दिया गया होगा, वरना 365 घूमते हैं, बैंक वालों के सामने। नान गजेटेड पुलिस वालों को भी बैंकें पतली गली का राश्ता दिखाने से नहीं चूकती हैं। कमोबेश यही हाल लोअर कोर्ट के वकीलों का भी है, लेकिन वक्त जरुरत इन बैंकों की खिदमत में ये सारा तबका बड़ी मुस्तैदी से अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए तैनात रहता है।
          भारत के निम्न आय वर्ग वाले अपनी अस्सी प्रतिशत आर्थिक जरूरतों की पूर्ति के लिए साहूकार पर ही निर्भर करते हैं, जबकि मात्र एक प्रतिशत मामलों में ही उन्हें वाणिज्यिक बैंकों से कर्ज मिल पाता है। दस प्रतिशत मामलों में उनके रिश्तेदार-दोस्त-यार, साहूकारों से कम दर पर और बैंको से अधिक ब्याज पर कर्ज दे देते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ही सरकारी कर्मचारियों को इन बैंकों से कर्ज नहीं मिल पाता, जिसका परिणाम यह है कि नब्बे प्रतिशत सरकारी कर्मचारी, साहूकारों के चंगुल में फंसे हुए हैं, जिनमें रेलवे में कार्य करने वाले लोगों की परसेन्टेज सबसे अधिक है। ये साहूकार दस से पन्द्रह प्रतिशत प्रतिमाह का ब्याज वसूलते हैं और आश्चर्य की बात तो यह है कि कर्ज देते समय अपना ब्याज काटकर ही बाकी का पैसा कर्जदार को दिया जाता है। इसमें किसी भी प्रकार की लिखा-पढ़ी की आवश्यकता नहीं होती है। इन साहूकारों के अपने लठैत होते हैं जो रिकवरी का कार्य करते हैं और इन लठैतों की सुरक्षा के लिए तो अपना पुलिस विभाग है ही! फिर चाहे ये पुलिस, रेलवे की हो अथवा सिविल की।
          भारत में तकरीबन 25 करोड़ कामगार, कम आय वाले वर्ग में हैं जिन्हें प्रतिदिन 80 रुपये से कम मजदूरी मिलती है। इसका 80 प्रतिशत यानी 20 करोड़ कामगार 20 रुपये से भी कम प्रतिदिन पाते हैं, जिनमें 5 रुपया प्रतिदिन पाने वालों की संख्या भी 5 करोड़ के करीब है। पॉच रुपया प्रतिदिन कमाने वालों का यदि औसत निकाला जाये तो वर्ष भर में उसे अधिकतम रुपये पन्द्रह सौ मिल पाते हैं, वह भी तब जब वह वर्ष में 300 दिन काम पा जाये। और भारत में हालात ये हैं कि मजदूरों को 100 दिन का काम मिलना भी मुश्किल है तभी तो भारत सरकार ने नरेगा के तहत 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराने की रोज़गार गारन्टी स्कीम चलाई हुई है। इससे आसानी से समझा जा सकता है कि इस देश में 100 दिन का रोजगार पाना भी कितनी टेढ़ी खीर है।
          निम्न आय वर्ग का उम्र के लिहाज से यदि वर्गीकरण किया जाये तो 25 से 35 वर्ष के बीच के लगभग 8 करोड़ कामगार हैं। 36 से 45 वर्ष के बीच 7 करोड़ एवं 45 वर्ष से ऊपर की यह संख्या 5 करोड़ की है तथा 25 वर्ष से नीचे भी यह 5 करोड़ हैं। सर्वेक्षण से यह निकल कर आया है कि निम्न आय वर्ग के 38 प्रतिशत लोग तभी कर्ज लेते हैं जब उन्हें आर्थिक विपदा घेर लेती है, और वह जिन्दगी तथा मौत के बीच खड़े होते हैं। 26 प्रतिशत निम्न आय वर्ग के लोग बीमारी आदि के लिए कर्ज लेते हैं तथा 14 प्रतिशत लोग खेती के लिए कर्ज लेते हैं। 12 प्रतिशत मामले ऐसे भी देखने को मिले कि उन्होंने अपने सामाजिक दायित्वों की पूर्ति यथा शादी-विवाह, अंतिम संस्कार एवं रस्म के निर्वाह के लिए कर्ज लेना पड़ा है। 10 प्रतिशत लोगों ने मकान एवं जमीन के लिए कर्ज लिया तो 10 प्रतिशत ने व्यावसायिक जरूरतों की पूर्ति के लिए कर्ज लिया।
          समाज के निचले तबके को कर्ज लेने की जरूरत तो हमेशा पड़ती ही रहती है। जैसे कि बड़े लोगों एव उद्योगपतियों को पड़ती रहती है। फर्क सिर्फ इतना है कि निचला तबका जीने के लिए कर्ज के जाल में फंसता है, जबकि बड़ा तबका एवं उद्योगपति कर्ज से घी पीता है और जनता को लाभ पहुचाने का मायाजाल दिखा कर लिए गये कर्ज में से 50 प्रतिशत की फिक्स डिपाज़िट अपने परिवारीजनों के नाम बनवा लेता है। आजतक यह देखने को नहीं मिला है कि निम्न आय वाले ने स्टार होटल में खाना खाने, शापिंग-मॉल में शापिंग करने या विलासिता की चीजें खरीदने के लिए कर्ज लिया हो। अपवाद स्वरूप एक प्रतिशत मामले में दो-पहिया वाहन खरीदने के लिए कर्ज जरूर लिया गया हो सकता है।
          देश के इन निम्न आय वालों में 64 प्रतिशत लोग दिहाड़ी मज़दूर हैं, जबकि 21 प्रतिशत लोग खेती-बाड़ी, परम्परागत शिल्पकारी आदि में, 9 प्रतिशत छोटे दुकानदार तथा मात्र 4 प्रतिशत वेतनभोगी मजदूर हैं और ये भी किसी संगठित क्षेत्र में नहीं हैं, बल्कि दुकानदारों, बड़े किसानों, छोटे-मोटे व्यावसायियों के यहां नौकरी करते हैं, जहॉं इनका ना तो प्रोवीडेन्ट फण्ड कटता है ना ही कोई इनस्योरेन्श की स्कीम इन्हें उपलब्ध होती है। ना ही किसी प्रकार की छुट्टी का भुगतान मिलता है और ना ही कोई अन्य लाभ। केवल नो वर्क नो पे का सिद्धान्त ही यहां कठोरता से लागू होता है। आईआईआईएस के सर्वे के अनुसार 80 रुपये प्रतिदिन से कम पाने वालों में से जिन पॉंच लोगों ने कर्ज लिया उसमें से चार, सूदखोरों के चंगुल में जबरदस्त तरीके से फंसे हुए थे। इन साहूकारों की ब्याज दरें दस रुपये प्रतिमाह से पन्द्रह रुपये प्रतिमाह प्रति सैकडा होती हैं। वार्षिक आधार पर यदि गणना की जाये तो यह 120 प्रतिशत से 150 प्रतिशत के बीच बैठती हैं।
          120 से लेकर 150 प्रतिशत प्रतिवर्ष कमाने के इस धन्धे में साहूकारों, पुलिसवालों, गॉव के प्रभावशाली व्यक्तियों एवं बैंकों का पूरा गिरोह सक्र्रिय है और भारत की अच्छी खासी जनता को गुलाम बनाये हुए है। कईबार तो यहॉं तक देखा गया है कि सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के लिए समाज के पंच जबरदस्ती कर्ज दिलाकर बिरादरी में भोज करवा देते हैं और उसे वापस न कर पाने की स्थिति में उसकी जमीन और बहु-बेटी तक पर जबरन कब्जा कर लेते हैं,और हमारे सरदार जी का सिस्टम मौन धारण किये रहता है। कितना अच्छा सिस्टम है,हमारे यहॉं,जो जनता का गार्जियन बनी सरकार केवल अपना भला सोचती है।
इसके बाद भी हमारे यहॉं का बुद्धिजीवी वर्ग, विशेष तौर पर पत्रकार जगत, यदि किसी विदेशी ने किसी भिखमंगे को 100 डालर का नोट दे दिया तो लम्बी चौड़ी बहस चलाकर इस कृत्य को अपराध घोषित करने से नहीं चूकता है। मूर्धन्य पत्रकार रूपा सुब्रह्मण्यम देहेजिया 3 अक्टूबर 2011 के वॉल स्ट्रीट जर्नल के इकॉनॉमिक जर्नल में कॉलम लिखती हैं कि क्या भीख देना सही है? महोदया दीक्षा देते हुए यह कहती हैं कि यह भिखारियों को बढ़ावा देने का मामला है। यह सीख इस स्तम्भकार ने डब्ल्यू.एस.जे. में देखी तो तरस आया इन पत्रकार महोदया पर कि अपनी काबिलियत दिखाने के लिए उन्होंने निर्धनता के सच में झांकने के बजाय, उसके नंगेपन को बॉलीवुड के नंगेपन के बराबर समझ लिया। उन्हें शायद पता नहीं कि ये गरीब शराब के नशे में नंगे नहीं रहते हैं, ये चर्बी घटाने के लिए उपवास या अनशन नहीं करते हैं, बल्कि इस हिन्दुस्तान में ये अपने लिए तन ढंकने को कपड़ा और पेट भरने को भोजन प्राप्त नहीं कर पाते इसलिए भीख मांगने मजबूरी में उतरते हैं। इनकी बुद्धि नंगी नहीं है, बल्कि इनकी तकदीर नंगी है। रूपा सुब्रह्मण्यम देहेजिया भीख देने वाली विदेशी महिला पेरिस हिल्टन को सीख देती हैं कि उन्होंने जो नेक इरादे से दान दिया उससे कदाचित अच्छे के बजाय नुकसान हुआ, क्योंकि इससे इस परिवार की इस तरह की प्राप्ति की उम्मीदें बढ़ गईं। इसलिए वह सुश्री पेरिस हिल्टन को सीख देती हैं कि कृपया रुपये या फिर डॉलर दान में देने की कोई आवश्यकता नहीं है। धन्य हैं दहेजिया जी, यदि बगैर दहेज शादी हुई हो तो बताइयेगा! दान देने वाले और दान लेने वाले पर चर्चा करनी हो तो मेरे ईमेल पर सूचित करियेगा रूपा सुब्रह्मण्यम देहेजिया जी, तब आपको बताऊंगा कि क्यों कोई दान देता है और दान लेकर बड़े-बड़े मठ, और धार्मिक संस्थान क्या कर रहे हैं। आपको 100 डॅालर, एक गरीब को दिये जाने पर ही इतनी टीस हो गई। विषय से भटक न जाऊं, इसलिए अपने मूल लेख पर वापस आता हूँ।
          देश में बढ़ते शहरीकरण के कारण गॉंव-गॉंव में पैदा हो गये बिचौलिये गॉंव में आई दैवी आपदा यथा बाढ़, सूखा आदि के समय दम्पत्ति को दस-पन्द्रह हजार रुपये अग्रिम दे देते हैं तथा सितम्बर-अक्टूबर आते-आते उस दम्पत्ति को शहर ले जाते हैं और वहॉं साल-साल भर तक बिना वेतन के मजदूरी कराते हैं। यह अलग बात है कि इस दौरान उन्हें साइट पर ही मुर्गी के दड़बेनुमा वाला अस्थायी आवास और खाने के लिए राशन बिचौलिये द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। ये भी पूंर्णरुप से बंधुआ मजदूरी का ही मामला है, लेकिन किस सरकार और किस विभाग की इस पर नज़र पडी आजतक कभी दिखाई नहीं दिया। ऐसे बंधुआ मजदूरों के बच्चों के भविष्य का अंदाजा बड़ी आसानी से समझ में आ सकता है। उस पर सोने पे सुहागा यह है कि इस देश में चाइल्ड लेबर एक्ट लागू है। इससे पहले ऐसे गरीब परिवार के जिन बच्चों को मजदूरी के अच्छे पैसे मिल जाते थे, वे अब चाइल्ड लेबर एक्ट को डील करने वाले अधिकारियों के डर से कम मजदूरी में ही कार्य करने को अभिशप्त हैं, ऐसे कानून से केवल इसे लागू कराने वाले सरकारी अधिकारियों की ही मौज आई है, जिस गरीब के पास अपने परिवार को भोजन कराने के ही लाले पडे हुए हैं, वह अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने स्कूल भेजे याकी मजदूरी कराकर पेट पाले! यह दर्द न तो मोंटेक सिंह आहलूवालिया के समझ में आ सकता है और ना ही डा0 मनमोहन सिंह एवं उनकी सरकार के।
          वैसे तो आर्थिक विष्लेषकों का कहना है कि निम्न आय वर्ग वाले व्यक्तियों का महाजनों के जाल में फंसने के पीछे गॉंवों तक बैंकिंग व्यवस्था का नहीं पहुंचना एक कारण है, पिछले 64 सालों के बाद अब उन्हें यह समस्या पता लगी है। लेकिन इस विश्लेषक का ऐसा मानना है कि यदि ऐसा है, तो इसके लिए रेसपॉन्सिबिल कौन है? दूसरी बात, जिन जगहों पर बैंकों का जाल बिछा हुआ है वहां के लोग भी कैसे साहूकारों के जाल में फंसे हुए हैं। जिन गॉंवों में सहकारी तथा ग्रामीण बैंक की शाखायें हैं वहां भी आम आदमी के लिए कर्ज पाना आसान क्यों नहीं है।
इन बैंकों के लोन देने के नियम इतने सख्त हैं कि जबतक ये बैंक स्वंय किसी को लोन देना न चाहें ग्राहक कितनी ही आर्हता पूरी क्यों न करता हो उसे लोन मिल ही नहीं सकता है। भारत सरकार की प्रधानमंत्री रोजगार योजना का भी सच यही है। इसके तहत मिलने वाली सब्सिडी बैंकवाले और जिला उद्योग केन्द्र वाले मिलकर खा जाते हैं। अब आप स्वंय अंदाजा लगा सकते हैं कि एक लाख के किसी प्रोजेक्ट में जब 20 हजार रिश्वत में ही निकल जायेंगे तो 80 हजार में वह प्रोजेक्ट कैसे चलेगा? क्योंकि यह बेरेाजगारों का प्रोजेक्ट है जिसमें वर्किंग कैपिटल उसे स्वंय अरेन्ज करनी पड़ती है, किसी टाटा, बिरला, अम्बानी या अन्य की नहीं है, जहॉं का सीएमडी करोड़ों की सेलरी पाता है तथा हजारों को रोजगार देने की बात करता है और वर्किंग कैपीटल के साथ-साथ गैसटेशन पीरीएड का भी मजा वैसे ही लेता है जैसे लोग होलीडे पीरीएड का लेते हैं।
          ऐसे उद्योगपतियों की प्रोजेक्ट कास्ट को कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और उस पर ही बडी बडी बैंकें लोन भी पास कर देती हैं, क्योंकि उसमें बैंकों को भी एक ही ग्राहक से करोड़ों रुपये सुविधा शुल्क के नाम पर प्राप्त हो जाते हैं। उसे प्रति ग्राहक साढ़े सात हजार की दर से रिश्वत एकत्र नहीं करनी पड़ती है। बड़ी प्रोजेक्ट पास करने पर इन ओद्योगिक घरानों से दोस्ती होती है अलग से, जिसका फायदा ये बैंक वाले अपने किसी सगे सम्बन्धी को उस प्रोजेक्ट में अच्छी प्लेसमैन्ट दिलाकर प्राप्त कर लेते हैं।
          यह देश अमीरों का है, गरीब तो उनके लिए एक रिसोर्स आइटम है, जिसका इस्तेमाल वह आउटसोर्स के रूप में भी कर लेता है। क्या भारतीय रिर्जव बैंक दावे के साथ कह सकता है कि उसने अपने उदभव काल से आजतक वाणिज्यिक बैंकों के फोकस में कभी निम्न आय वर्ग के लोगों को रखने का कोई नियम बनाया या सरकुलर जारी किया है? यह तो बात रही निम्न आय वर्ग वालों की, जबकि सत्यता तो यह है कि मध्यम आय वर्ग के 80 प्रतिशत लोग भी इन बैंकों के ग्राहक जरूर हैं, लेकिन बैंकिंग के नाम पर वो केवल अपना पैसा जमा करने, उसे चेक के माध्यम से निकालने के अलावा और कुछ नहीं जानते। इसके लिए भी वे झिड़के जाते हैं अलग से। इसी को भारत की बैंकिंग समझ लीजिए वरना तो कर्ज पाने के लिए वे भी मारे-मारे घूमते हैं।
          इन बैंको से वे ही कर्ज पाने में सफल होते हैं जो इन्हें खुश रखने की तरकीब जानते हैं, जिनकी लायजनिंग अच्छी होती है अथवा जिनकी साख नहीं बल्कि हैसियत अच्छी होती है। हैसियत अच्छी होने का मतलब है आप साम, दाम और दण्ड से सम्पन्न हों। आपकी धमक ऐसी हो कि बैंक वाला भी आपसे डरे कि यदि उसने आपको लोन नहीं दिया तो उस मैनेजर का ट्रान्सफर हो सकता है, ऐसी स्थिति में ही वह आपको घास डालेगा। वरना, कर लीजिए जो आप करना चाहें, उसकी सेहत पर फर्क पड़ने वाला नहीं। डा0 मनमोहन सिंह, वर्ष 2004 से लगातार भारत के प्रधानमंत्री बने हुए हैं। इससे तो अच्छे बम्बई के डिब्बे वाले हैं जो जाहिल गवांर हैं, लेकिन जिनकी प्रबन्धन क्षमता की तारीफ करने के लिए ब्रिटेन का प्रधानमंत्री भारत आता है। हमारे बड़े-बड़े प्रबन्धकीय संस्थान उन्हें अपने यहां आमंत्रित करते हैं, लेकिन गरीबों को अमीर बनाने का कोई उपाय नहीं सुझा पाते हैं। निम्न आय वर्ग एवं मध्यम आय वर्ग के लोगों को डेढ़ लाख प्रतिवर्ष की आय के आयकर विभाग के दायरे में लाने की जिम्मेदारी क्या सरकार की नहीं बनती है, जो इस देश की गार्जियन समझी जाती है।
          क्या कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर इस समस्या का निदान नहीं कराया जा सकता है ? हमारा योजना आयोग कुटीर उद्योगों के विकास के बारे में क्यों नहीं सोचता है, बडे़ दुख का विषय है। इस समस्या का समाधान कम से कम योजना आयोग के उपाध्यक्ष मि0 मोंटेक सिंह आहलुवालिया को तो अर्थशास्त्री की श्रेणी में ला ही सकता है, जो भारत के ग्रामीण को 26 रुपये में एवं शहरी को 32 रुपये में पूरे दिन का भोजन कराकर खुशहाल जिन्दगी जीने का प्रमाण-पत्र दे चुके हैं।
सतीश प्रधान

3 comments:

Ankit[India] said...

Very Goood, Keep up the gud work

Anivesh(India) said...

Very Very nicely composed.Fabulous work

Abhishek[India] said...

Magnificent work !!!!!

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