Thursday, 17 November 2011

मार्कण्डेय काट्जू जी, पूरा इंडियन मीडिया आपके खिलाफ नहीं है।

 Justice Markandey Katju, Chairman, Press Council of India
        सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे और वर्तमान में भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष नियुक्त हुए जस्टिस काट्जू ने एक टी0वी0 कार्यक्रम में कहा था कि मीडिया के लोगों के बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है। मीडिया देश को साम्प्रदायिक आधार पर बांटने का काम करता है। उन्होंने कहा कि उन्हें आर्थिक नीतियों, राजनीतिक सिद्धान्तों, साहित्य और दर्शनशास्त्र की जानकारी नहीं होती है।
          श्री काट्जू के इस बयान से गिरोहबन्द मीडिया का उद्वेलित होना लाजमी था,और हुआ भी ठीक वैसा ही। पत्रकारों के कुछ संगठनों द्वारा काट्जू के बयानों पर गहरी आपत्ति दर्ज कराई गईइनमें एडिटर्स गिल्ड ऑफ इण्डिया, ब्रॉडकॉस्ट एडिटर्स एसोसियेशन(बीईए),न्यूज ब्रॉडकास्ट एसोसियेशन एण्ड प्रेस एसोसियेशन में काफी रोष है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इण्डिया की महासचिव कूमी कपूर ने तो यहां तक कह दिया कि काट्जू उन लोगों के लिए बहुत ही अपमानजनक रवैय्या अपना रहे हैं जिनके साथ उन्हें अगले तीन वर्षों तक कार्य करना है। कूमी कपूर का कथन पूरे मीडिया जगत का नहीं है,और हो सकता है, यह केवल उन्हीं की आवाज हो जिसे वे इस संगठन के बैनर से बुलन्द करना चाह रही हैं।
Coomi Kapoor, General Secretary , Editors Guild of India
          कूमी कपूर के इस वकतव्य से यह स्तम्भकार भी अचंम्भित है कि कूमी कपूर का यह बयान धमकी वाला है अथवा यह प्रदर्शित कर रहा है कि यदि कोई किसी संस्था का अध्यक्ष बनाया जाये तो वह उससे जुड़े लोगों की संख्या और उनके कृत्य को देखकर उनसे डर-सहम कर टिप्पणी करे। इस देश के पत्रकार यदि अपने को इतने ही ताकतवर समझने की हद तक पहुंच चुके हैं तो उन्होंने वेतनबोर्ड के फैसले का विरोध कर रहे आईएनएस के वक्तव्य पर टिप्पणी करने की जहमत क्यों नहीं उठाई। अगर जस्टिस काट्जू को प्रेस काउन्सिल के अध्यक्ष के रूप में कार्य करना है तो इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि वे पत्रकार संगठनों से सांठ-गांठ करके अपना कार्यकाल पूरा करें।
          इस देश में कितने ही तथाकथित नामी गिरामी पत्रकार संगठन हैं जिनमें दशकों से चुनाव नहीं हुए हैं। 70 से 90 वर्ष के बुजुर्ग कुण्डली मारकर बैठे हुए हैं, तथा संगठन को पान की दुकान की तरह चला रहे हैं। ये पत्रकारों के संगठन कम, पत्रकार पैदा करने वाले जनाना हास्पिटल ज्यादा हो गये हैं। पत्रकारिता के नाम पर उन्हें ऐसा बन्दा चाहिए जो लिखना-पढ़ना भले ही ना जाने लेकिन उसे खिदमत करना अवश्य आता हो। भले ही वह विज्ञापन एकत्र करने का कार्य करता हो अथवा अखबार की प्रतियां वितरित करने का कार्य करता हो, उसे पत्रकार घोषित करने का कार्य ये मीडिया संगठन बखूबी करते हैं। यहॉं तक कि सत्ता को............ सप्लाई करने वाले कितने ही लोगों को ये पत्रकार ही नहीं बनाते हैं अपितू अपने साथ-साथ घुमाकर उसे बड़ा दिखाने और वास्तविक पत्रकार को यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि-हमारी सेवा नहीं करोगे तो पत्रकार नहीं कहे जाओगे,और हमारी चरण वन्दना करोगे तो भले ही तुम्हारी परचून की दुकान हो या आतंकी संगठन को सूचना पहुंचाना तुम्हारा काम हो,हम तुम्हारी पैठ ग्रह मन्त्रालय तक में करा देंगे।
Ghulam Nabi Fai, ISI Agent & Director, Kashmir American Council.
          यदि ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि पाकिस्तानी खुफिया ऐजेन्सी आई0एस0आई0 के एजेण्ट गुलाम नबी फई द्वारा संचालित कश्मीर अमेरिकन काउन्सिल के बैनर तले सेमीनार और कान्फ्रेन्स अटैण्ड करने वाले पत्रकारों के नाम इन ब्रॉडकॉस्ट की एसोसियेशनों ने ब्रॉडकॉस्ट नहीं किये? अथवा बड़े कहे जाने का दम्भ भरने वाले किसी भारी भरकम समाचार-पत्र ने इन मूर्धन्य पत्रकारों के नामों की लिस्ट क्यों नहीं छापी?
          ए0राजा को मंत्री बनाने में कार्पेारेट लाबीस्ट नीरा राडिया,जो नामी-गिरामी वकील आर0के0आनन्द को भी बेवकूफ बनाकर उनका मेहनताना खा गई, उसका साथ हिन्दुस्तान टाइम्स के वीर संघवी और एनडीटीवी की एंकर बरखा दत्त क्यों दे रही थीं? इन संगठनों ने बरखा दत्त, वीर संघवी, इत्यादि पत्रकारों को आईना दिखाने में बढ़-चढ़कर भूमिका क्यों नहीं दिखाई। आज देश का हर नागरिक देख रहा है कि किस तरह इलैक्ट्रानिक चैनल पर सरकार के पक्ष में ग्रुप डिस्कसन कराये जाते हैं। कैस एक पत्रकार बाकायदा वकील की भूमिका में सरकार का पक्ष मजबूत करने में लगा रहता है। कैसे अण्णा हजारे की रणनीति को उनकी टीम के मूंह में हांथ डालकर निकालने की कोशिश होती है। सरकार का एजेण्ट बनकर पत्रकारिता करने वालों में आलोक मेहता प्रमुख हैं।
          यह स्तम्भकार जस्टिस मार्कण्डेय काट्जू के कथन से हूबहू इत्तेफाक रखता है कि इस मीडिया को अपने अन्दर भी झांककर देखना चाहिए। जस्टिस मार्कण्डेय काट्जू के कथन पर मीडिया संगठनों के पदाधिकारियों का विरोध इसलिए आवश्यक हुआ कि यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनकी दुकानदारी पर आंच आ रही है, जबकि विरोध करके वे अपनी शक्ति दिखाने के अलावा अपनी महत्ता भी प्रदर्षित करना चाह रहे हैं। ये सारे संगठन जेबी संगठन हैं, जिनमें मात्र दस-बारह लोगों के जेब में ही सत्ता रहती है। जितने देश में पत्रकार नहीं उससे कई गुना इन संगठनों की सदस्य संख्या है। किसी भी प्रकार का और कभी भी पत्रकारों का मेला लगाने के लिए ये संगठन उन छोटे-छोटे कहे जाने वाले अखबारों के प्रतिनिधियों के बल पर ही प्रदर्शन कर पाते हैं, जो इनके पास अपनी पत्रकार मान्यता अथवा विज्ञापन पाने के लिए इनके तलुये चाटते हैं। इस देश में मीडिया एक रैकेट की तरह कार्य कर रहा है, यह कहने में मुझे तनिक भी झिझक नहीं है।
          एक दैनिक समाचार-पत्र के सम्पादकीय पृष्ठ पर छपी ब्राडकॉस्ट एडीटर्स एसोसियेशन के महासचिव श्री एन0के0सिंह की उस टिप्पणी को देख रहा था, जिसमें उन्होंने (उस आरोप कि- जिस देश का 80 प्रतिशत भाग अभाव में जी रहा हो, उस देश में मीडिया एक फिल्म अभिनेता की पत्नी को एक बच्चा होगा अथवा जुड़वा होगा, यह दिखा रहा है) पर सफाई दी कि भारतीय मीडिया अगर गरीबी को न दिखा रहा होता तो शायद समाज के सुविधाभोगी वर्ग को इसका पता भी नहीं चलता कि इस देश में गरीबी है। शायद इसी तर्ज पर मि0 सिंह यह जस्टिफ़ाय करने की कोशिश कर रहे हैं कि अभिनेत्री ऐश्वर्या राय के बच्चा होने को दिखाना इसीलिए आवश्यक था कि इस देश का गरीब तबका यह जान ले कि ऐश्वर्या राय मॉं बनने वाली हैं, वरना उसकी गरीबी दूर नहीं हो पायेगी।
          मि0 सिंह को यह पता नहीं कि जब इस देश में इलैक्ट्रानिक चैनल नहीं थे तब भी गरीबी कितनी है और कहॉं है सभी को पता थी। हो सकता है मि0 सिंह की अमीरी का किसी को पता ना हो लेकिन भारत की मीडिया का बहुत बड़ा वर्ग गरीबी में जी रहा है, इसे हर वह पत्रकार जानता है जो सत्ता से चिपक कर उसका आनन्द नहीं ले रहा है। मि0 सिंह का जवाब बिल्कुल कपिल सिब्बल के जवाब जैसा है कि यदि मंत्री बन गये तो सत्ता उनकी जेब में और वकालत करने लगे तो सुप्रीम कोर्ट उनकी जेब में।
          सिंह साहब यदि इस देश की गरीबी अथवा गरीब की बात आप कर रहे है तो कोई एहसान नहीं कर रहे हैं, लेकिन नाग-नागिन का खेल दिखा कर, स्वर्ग की सीधी सीढ़ी दिखा कर, बिग बॉस जैसे फूहड़ आइटम दिखा कर, कमेडी के नाम पर फूहड़ता परोस कर इस भारत देश और इसकी जनता के साथ अन्याय करने के साथ-साथ, इस देश के कल्चर, इसकी पवित्रता को भ्रष्ट जरूर कर रहे हैं। आप वो नहीं दिखा रहे हैं जो जनता चाह रही है, बल्कि आप जो दिखा रहे हैं, वह जनता मजबूरी में देख रही है। इससे यदि आपकी टीआरपी बढ़ रही है तो इसका यह कतई मतलब नहीं है कि दर्शक इसे बहुत पसन्द कर रहे हैं। रेड लाइट एरिया को बीच चौराहे स्थान दे दीजिए तो भीड तो वहॉं सबसे पहले लग जायेगी लेकिन इसे आप सार्वजनिक स्थान घोषित नहीं कर सकते। इसलिए यदि आप फूहडता दिखा रहे हैं तो यूनीवर्सल श्रेणी में रखा जाये अथवा एडल्ट्स में इसका नियमन तो होना ही चाहिए, और इसके लिए आप पर(आपसे तात्पर्य फूहड़ता दिखाने और देश को तोड़ने वाली बहस चलाने वाले चैनलों से है)।
          मि0सिंह ने, लगने वाले अंकुश पर खूब किन्तु-परन्तु किया है,लेकिन वह यह क्यों नही बताते कि ऐसा न होने की दशा में भी मीडिया संस्थान बहुतों को ब्लैक मेल कर रहे हैं। इसे समझने के लिए नीचे दिये गये लेख पर क्लिक करें, उसमें मंच से ही पत्रकार प्रभात रंजन दीन ने इलैक्ट्रानिक चैनल की कथनी और करनी का खुलासा किया था, जिसे मंच पर उपस्थित विनीत नारायण सहित मुदगल और आशुतोष सहन नहीं कर पाये थे, और मि0 विनीत नारायण ने तो प्रभात रंजन दीन को समय की कमी का बहाना बनाते हुए जल्द से जल्द अपना भाषण खत्म करने का आदेश सुना दिया। दूसरों को सीख देनी बड़ी आसान है,किन्तु जब अपने पर आती है तो बाजा बजने लगता है। आखिरकार कौन सा ऐसा कारण है कि मीडिया पर अंकुश नहीं लगना चाहिए।
          कितने चैनलों और समाचार-पत्रों के मालिकान साफ सुथरे हैं, कितने ही पत्रकारों के नाम यह स्तम्भकार दे सकता है जो पत्रकारिता के कार्ड का इस्तेमाल अपने संस्थान के मालिक की चीनी मिल, वनस्पति मिल आदि के कायों के लिए करते हैं। अपने लेख के अन्त में उन्होंने दावा किया है कि पिछले वषों में विशेषकर इलैक्ट्रानिक मीडिया ने जो उपलब्धि हासिल की है,उससे स्पष्ट है कि भारतीय इलैक्ट्रानिक मीडिया आने वाले समय में विश्व के लिए एक उदाहरण पेश कर सकता है। उनकी इस बात में कितना दम है,उसे समझने के लिए उन्हीं से यह पूछा जाना चाहिए कि लीबिया के तानाशाह कर्नल गद्दाफी का आचरण उसके अपने देश की जनता के प्रति कैसा था, इस तथ्य को नज़रअन्दाज करके मीडिया ने केवल उसी पक्ष को प्रचारित किया जिसे अमेरिका प्रचारित कराना चाहता था।
क्या एन0के0सिंह को पता है कि लीबिया के उस तानाशाह के शासन में निम्न सुविधायें वहॉं की जनता के पास थीं।
1) लीबिया में जनता को बिजली का बिल माफ़ रहता था,वहॉं लोगों को बाकी मुल्कों की तरह बिजली का बिल जमा नहीं करना पड़ता था (इसका भुगतान सरकार करती थी)।
2) लीबिया सरकार(गद्दाफी शासन)आपने नागरिकों को दिए गए ऋण(लोन)पर ब्याज नहीं वसूलता था। मानें आपको इंटरेस्ट फ्री लोन बड़ी आसानी से मिलता था और चुकाना केवल मूलधन पड़ता था।
3) लीबिया में ‘घर’ मानव अधिकार की श्रेणी में थे। लीबिया के प्रत्येक व्यक्ति को उसका खुद का घर देना सरकारी जिम्मेदारी थी। आपको बाते दें कि गद्दाफी ने कसम खाई थी कि जब तक लीबिया के प्रत्येक नागरिक को उसका खुद का घर नहीं मिलता वह अपने माता पिता के लिए भी घर नहीं बनवाएगा यही कारण था कि गद्दाफी की मां और पत्नी आज भी टेंट में ही रहती हैं।
4) लीबिया में शादी करने वाले प्रत्येक जोड़े को गद्दाफी कि तरफ से 50 हज़ार डॉलर की राशी दी जाती थी।(दुनिया में शायद ही कोई सरकार या शासक ऐसा करता हो)।
5) लीबिया में समस्त नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ पूरी तरह से फ्री थीं। जी हां लीबियाई नागरिकों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं पर आने वाला सारा खर्चा गद्दाफी सरकार खुद वहन करती थी।
Dr.Ved Pratap Vaidik
          अब आते हैं दूसरे अलम्बरदार वेद प्रताप वैदिक के पास। इनका कहना है कि पता नहीं क्यों भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काट्जू रोज ही बर्र के छत्ते में हांथ डाल देते हैं। मीडिया को बर्र का छत्ता बताने में वेद प्रताप वैदिक गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं लेकिन वे भूल रहे हैं कि बर्र का छत्ता उसका घर होता है, और जब कोई किसी का घर तोड़ने की कोशिश करता है तो हर वह प्राणी अपने घर को बचाने के लिए आखिरी दम तक जद्दोजहद करता है,उसे बचाने की,इसी वजह से बर्र किसी को काटती है,वरना किसी के घर में घुसकर वह हमला नहीं करती है। वैदिक जी मीडिया आपका अपना घर नहीं है। हिन्दुस्तान भर के पत्रकारों को मिलाकर इण्डियन मीडिया कहा जाता है,जिसके अकेले ठेकेदार न तो वैदिक हैं,ना ही एन0के0सिंह और ना ही  कूमी कपूर!
 मीडिया प्रोफेशन की तुलना बर्र के छत्ते से करना पूरी मीडिया बिरादरी की तौहीन करने के बराबर है,इसके लिए मि0 वैदिक को माफी मांगनी चाहिए। मीडिया उनके विरासत की वस्तु नहीं है कि खतौनी में उनके नाम चढ़ा दी गई हो। वैदिक जी को ऐसी कोई शक्ति न तो संविधान से मिली है और ना ही ऊपर वाले ने दी है कि पत्रकारों के संगठन के नाम पर वे जो चाहें,जैसा चाहें,जब चाहें,किसी को भी धमकाने की कोशिश करें। वैदिक जी पत्रकारिता एक मिशन है,इसे मशीनगन से चलाने की कोशिश मत कीजिए,नहीं तो आप अपने साथ पूरी पत्रकार कौम की ऐसी की तैसी करा देंगे। स्वतन्त्रता को स्वच्छन्दता में बदलने की हिमाकत मत कीजिए। चूंकी स्वतन्त्रता,स्वच्छन्दता में तब्दील हो रही है इसीलिए नियमन की जरूरत महसूस की जा रही है।
जस्टिस काट्जू का एक-एक वाक्य सही एवं खरा-खरा है, इसीलिए वैदिक जी को अखर रहा है और वे धमकी दे रहे हैं,प्रेस परिषद के अध्यक्ष को, कि वे जज का चोला उतारकर प्रेस परिषद का हैट पहनें। ये अध्यक्ष को हैट कब से पहना दिया,इस मीडिया ने? क्या मीडिया के ये बुजुर्ग अभीतक अंग्रेजों की गुलामी से अपने को मुक्त नहीं कर पाये हैं। अपने लेख में वेद प्रताप वैदिक ने उसी तीव्रता और दम्भी भाषा का प्रयोग किया है,जिस भाषा का प्रयोग दिवंगत प्रभाष जोशी जी करते थे, लेकिन तब जब उन्हें वह बात व्यक्तिगत तौर पर बुरी लगती थी।
आत्म संयम के नाम पर स्वच्छन्द रहने की प्रवत्ति को यदि अनुशासन के दायरे में लाया जाये तो गलत कैसे हो सकता है? क्या ऐसा तर्क देकर कोई अपने गुनाह को माफ करवा सकता है कि अमुक व्यक्ति तो चार खून करके भी खुला घूम रहा है,मैंने तो अभी पहला ही कत्ल किया है और जज साहब आप मुझे फांसी की सजा सुना रहे हो। यदि इस देश के एक भी जज ने अपने को लोकपाल के दायरे में आने की वकालत नहीं की तो इसका मतलब यह तो नहीं कि इस बिना पर हर वर्ग इससे छूट पाने का अधिकारी हो गया। मीडिया का जो काम है वह करिये। आप जस्टीफाई कीजीए की जज को भी लोकपाल के दायरे में होना चाहिए। आप इसे कैसे जस्टिफ़ाय कर सकते हैं कि जब जज, प्रधानमंत्री आदि लोकपाल के दायरे में नहीं हैं तो मीडिया कैसे!
          वैदिक जी अपनी बची ऊर्जा का इस्तेमाल जजों को,प्रधानमंत्री को, राजनीतिज्ञों को, कार्पोरेट घरानों के साथ-साथ मीडिया को भी लोकपाल के दायरे में लाने का जस्टीफिकेशन बताने में करिये, ना कि राहुल गॉंधी की तरह कि-लोकपाल को तो कोई सौ करोड़ में खरीद लेगा। इसका मतलब तो आपको अच्छी तरह पता है कि कौन कितने में खरीदा गया है। आप केवल खरीदने बेचने का ही धन्धा कर रहे हैं।
यदि मीडिया को नियम कायदे में लाने के लिए कैबिनेट ने गलत नियम बनाये हैं तो उन नियमों का विरोध कीजिए, बजाय इसके कि आप पूरी नीति का ही विरोध करने पर उतारू हो जायें। आप और आपके पत्रकार संगठनों को स्वंय बताना चाहिए कि नियमन किस प्रकार से किया जाये। प्रोग्राम संहिता के उल्लंघन पर क्या कार्रवाई की जानी चाहिए इसे आप,मि0 एन0के0सिंह, कूमी  कपूर इत्यादि सरकार को सुझा सकते हैं,और सुझाना चाहिये।
सतीश प्रधान




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  • चलिए भारत सरकार का ठप्पा तो लगा

    1 comments:

    one man army said...

    आपका लेख अत्यंत ही सरहनीय है आशा है की ऐसे विषय हम पाठकों को भविष्य मैं भी मिलते रहेंगे |

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