Wednesday, 21 December 2011

साइबर मीडिया पर नियंत्रण की सनकी कवायद

          अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस की पूर्व संध्या पर, दिल्ली स्थित यूनाइटेड नेशन इन्फारमेशन सेन्टर से महासचिव मून का बयान जारी किया गया । इस बयान में मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा पर जोर देते हुए कहा गया कि अपने विचारों को बेधड़क रूप से व्यक्त करने के लिये बहुत से लोगों ने खुद को सशेल मीडिया से जोड़ा है। अब वे दिन बीत गये जब दमनकारी शासक सूचना के प्रवाह पर अंकुश लगा देते थे। उनका इशारा स्पष्ट रूप से मनमोहन सरकार और उनके हैसियत भूले मंत्री कपिल सिब्बल की ओर ही था। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर अंकुश लगा ही नहीं सकती सरकार- बान की मून, महासचिव, यूनाइटेड नेशन। 
          मून ने कहा ‘मानवाधिकारों पर सभी का अधिकार है। दुनिया भर में लोग न्याय, गरिमा, समानता और भागीदारी की मांग को लेकर एकजुट हुए हैं। उन्हें यह सब पाने का पूरा अधिकार है। उन्होंने कहा कि ‘यह सच है कि दुनिया में दमन बहुत है और कानून से बचने के रास्ते भी बहुत हैं। फेसबुक, गूगल, याहू, ट्विटर, यू-ट्यूब जैसी तमाम सोशल नेटवर्किंग और मीडिया वेबसाइट्स पर रोक लगाने के लिये चाटुकार कपिल सिब्बल ने नये दिशा- निर्देश बनाने की अंतिम इच्छा जताई है,जिससे कि वह मैडम सोनिया गांधी और सरदार मनमोहन सिंह को अपनी वफादारी का सुबूत पेश कर सकें। वैसे भी उनके पास, इसके अलावा दिखाने को कुछ शेष नहीं रहा है।
            सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय,भारत सरकार के साइबर सलाहकार नीरज अरोड़ा का कहना है कि गलत, अश्लील या भद्दी सामग्री वेबसाइट पर डालने पर आईटी एक्ट की धारा-79 के तहत कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। ऐसा ही केन्द्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल भी कह रहे हैं। इस पर गूगल का कहना है कि अगर कोई विवादास्पद सामग्री कानूनन जायज है तो हम उसे नहीं हटाते, ताकि विभिन्न लोगों के विचारों का सम्मान हो- 
गूगल इण्डिया 
इसी के साथ फेसबुक ने भी कुछ ऐसा ही कहा है। उसका कहना है कि हम उस सामग्री को हटा देंगे,जो हमारी शर्तों का उल्लंघन करती हैं। हम नफरत,हिंसा और अश्लीलता फैलाने वाली किसी भी सामग्री के खिलाफ हैं।
राज्यसभा सांसद व उद्योगपति राजीव चन्द्रशेखर ने कहा कि सिब्बल भारत में इन्टरनेट पर नियंत्रण का चीनी मॉडल लागू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वह इसमें सफल नहीं होंगे। बुनियादी तौर पर कहा जाये तो सरकार गलत दिशा और गलत लक्ष्य की ओर कदम बढ़ा रही है। जहां तक चीन की बात है तो वह एक गैर-लोकतांत्रिक देश है, इसलिए हमें उसका अनुशरण नहीं करना चाहिए। उसका अनुशरण हम तब कर सकते हैं,जब चीन का 1,36,000 वर्ग किलोमीटर से दूना क्षेत्रफल कब्जा कर लें। कम से 12 देशों के साथ हमारे विवाद हों और कम से कम तीन देशों पर हम कब्जा कर लें,जैसे चीन ने पूर्वी तुर्किस्तान, भीतरी मंगोलिया और तिब्बत को कब्जा रखा है। सिब्बल को शायद यह सब दिखाई नहीं देता है अथवा उनको इसकी जानकारी ही न हो, यह भी सम्भव है।
          जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि वह आनलाइन सामग्रियों पर प्रतिबन्ध के खिलाफ हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अक्सर दुरुपयोग किया जाता है।
लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन के आरोपी कपिल सिब्बल ने फेसबुक,गूगल और ऑर्कुट जैसी कई सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर शिकंजा कसने के इरादे जाहिर कर दिये हैं। दरअसल कपिल सिब्बल, सरदार मनमोहन सिंह के सबसे प्यारे मंत्री हैं,क्योंकि एक तो वे पेशे से वकील है,दूसरे उनके पास दूरसंचार मंत्रालय है,तीसरे वे राहुल की लुटिया डुबा सकते हैं और चौथे उन पर सोनिया गांधी का हाथ है। हिन्दुस्तान में वे कैबीनेट से ऊपर हैं,संसद से ऊपर हैं, जनता उनके जूतों तले पड़ी है और ये सोशल नेटवर्किंग साइट्स उनके रहम पर ही भारत में कुछ कर सकती हैं, वरना उनकी भौंहें टेढ़ी हो गईं तो प्रतिबन्ध लगने में देर कैसी?
            दरअसल स्वामी अग्निवेश के मित्र सिब्बल महाराज ने इतना सब कुछ महज,सरदार मनमोहन सिंह और मैडम सोनिया गांधी के विरुद्ध सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दर्ज की गयी टिप्पणीयों को देखकर सोनिया गांधी के प्रति अपनी वफादारी सिद्ध करने के इरादे से किया है। इसी के साथ चूंकि वे जननायक अन्ना हजारे से भी मुंह की खा चुके हैं,इसलिए बहुत ही शातिराना अन्दाज में उन्होंने,अन्ना के आन्दोलन को ठंडा करने के लिये ये तरकीब सोची है। सबसे पहले उन्होंने 5 सितम्बर को फेसबुक,ट्विटर,ऑर्कुट और गूगल इण्डिया के अधिकारियों को तलब किया। आगे सिब्बल ने कहा कि दूरसंचार विभाग के सचिव चन्द्रशेखर ने भी 19 अक्टूबर 11 को इन कम्पनियों के अधिकारियों के साथ बैठक की थी,जिसमें यह निर्णय लिया गया था कि आपत्तिजनक सामग्रियों को लेकर उपचार संहिता बनाई जायेगी।
           कपिल सिब्बल को शायद उनके मुंशी ने बताया नहीं है कि सोशल मीडिया पर मानहानि से जुड़ी सामग्रियों के प्रकाशन व प्रसारण को रोकने व दण्डात्मक कार्रवाई हेतु संशोधित भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कानून-2008 पहले से मौजूद है। इस कानून की धारा 66-ए के मुताबिक ऐसी इलैक्ट्रानिक सामग्री जो किसी भी सम्भव स्वरूप में मानहानि से जुड़ी है,वह दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आती है। इसी तरह कानून की धारा-67 के तहत अश्लील सामग्री आदि का प्रकाशन व प्रसारण दंडनीय अपराध है,जिसके लिये अधिकतम तीन साल की सजा व पांच लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
          11 अप्रैल 2011 को संशोधित सूचना प्रौद्योगिकी कानून में कहा गया है कि यदि सोशल मीडिया अथवा इंटरनेट पर उपलब्ध कोई सामग्री किसी की मानहानि करती है तो सरकार इसका सज्ञान ले सकती है तथा सम्बन्धित नेटवर्क के सेवा प्रदाता को शिकायत के बाद अधिकतम 36 घंटों के भीतर प्रकाशित सामग्री को हटाना होगा।
          दरअसल उत्तर प्रदेश में विधान सभा के आम चुनाव होने वाले हैं,जिसके प्रसारण की गूगल इण्डिया ने गम्भीर तैयारी की हुई है। ये साइट्स इतनी लोकप्रिय हो चुकी है कि मैडम सोनिया गांधी को लग रहा है कि यदि ऐसे ही चलता रहा तो अन्ना इफेक्ट,उत्तर प्रदेश में तो उनकी लुटिया ही डुबा देगा, जिससे उनके युवराज का राजतिलक होना असम्भव हो जायेगा। वैसे भी अब तो उ0प्र0 में कांग्रेस का लोकदल के अजित सिंह से समझौता हो ही गया है, इसी के तहत उन्हें केन्द्र में नागरिक उडड्यन मंत्रालय सौंप कर उनको नवाजने की कोशिश की गई है कि उनका ही कुछ करतब कांग्रेस के काम आ जाये। ऐसी स्थिति में भी वह 50 के आस-पास पहुंच जाये तो बड़ी बात है। बगैर अजित सिंह के सहयोग के उसकी क्या स्थिति होगी,व्यक्त करना दिलासा देने लायक भी नहीं है।
          भारत की आम जनता की आवाज को दबाने का खेल सत्ता के दीवाने,कपिल सिब्बल क्यों और किसके इशारे पर खेलना चाह रहे हैं,इसे तो सरदार मनमोहन सिंह ही बता पाने में सक्षम हो सकते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि मनमोहन के इशारे पर कपिल सिब्बल,मनीष तिवारी,दिग्विजय सिंह आदि नेता इस तरह की हरकत कर रहे हैं जिससे जनता की सारी नाराजगी राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर निकले और उनके खिलाफ जबरदस्त विरोध खड़ा हो जाये,जिससे प्रधानमंत्री पद पर सरदार जी का बना रहना अपिरिहार्य हो जाये। ऐसा नुस्खा मैडम सोनिया गांधी के साथ पूर्व श्रूड प्रधानमंत्री नरसिंम्हा राव भी बखूबी आजमा चुके हैं। सोनिया गांधी को अच्छी तरह से पता है कि नरसिंम्हाराव ने आतंकी खतरा बताकर उनकी जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था करा दी थी। उन्हें जनता के मध्य नहीं आने दिया था। अब चूंकि वह जनता के बीच हैं तथा लला को प्रधानमंत्री पद पर देखने के लिए अधीर एवं व्याकुल भी, इसीलिए प्रधानमंत्री पद पाने से पूर्व राहुल गांधी को जनता की भावना का आदर करने के साथ ही उत्तर प्रदेश की जनता का सम्मान करना भी सीखना पड़ेगा। वैसे भी जब तक उ0प्र0 के लोग भीख मांगने की प्रवृत्ति से ऊपर नहीं आ जाते हैं,उनकी प्रधानमंत्री बनने की चाहत कोई मायने नहीं रखती है।
          पूरे उत्तर प्रदेश के लोगों को भीख मांगने से वे क्या रोक पायेंगे,जब वे स्वयं ही वोट की भीख मांगने के लिये पूरे प्रदेश में दर-दर घूमने को मजबूर हैं। वे पहले सुल्तानपुर और रायबरेली के लोगों को ही बेहतर स्थिति में ला दें यही बहुत है। रायबरेली और सुल्तानपुर में सर्वे कराकर वह आंकड़ा प्रस्तुत करें कि वहां के कितने लोग भीख मांगने के लिये अपने जनपद से बाहर नहीं निकलते हैं। देश स्वतंत्र होने से लेकर आज तक पूरी तौर से सत्ता में बने रहने के बावजूद वे केवल दो जनपदों से भिखारीपन दूर नहीं कर पाये तो आगे क्या करेंगे,सिवाय इसके कि एक गरीब दलित के घर खाना खाकर उसे एक सप्ताह के लिये भूख से मरने के लिये छोड़ दें। क्या वे ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं कि केवल इन दो जनपदों के लोगों को ही अपने घर पर एक माह में एक ही दिन सही,खाना खिलाने का लंगर खोल दें। सालभर के लिए बारह लंगर रायबरेली में और बारह लंगर सुल्तानपुर के लिए। कुल मिलाकर 24 लंगर प्रधानमंत्री का पद पाने के लिए कौन सी बड़ी चीज़ है?
          राहुल गांधी,गरीब दलित के घर खाना खाकर उसे और गरीब बना रहे हैं एवं जबरदस्त फर्जी पब्लिसिटी पा रहे हैं, अलग से। क्योंकि अभी तक यह सुनने में नहीं आया कि राहुल गांधी ने जिस गरीब दलित के घर खाना खाया उसे वहॉं से जाते वक्त पॉंच- दस हजार रूपये दे दिये हों! जबकि वे कोई कमजोर व्यक्ति नहीं हैं। इसके विपरीत यदि वे गरीब अगर राहुल गांधी के घर खाना खायेंगे तो न तो वह पब्लिसिटी गरीबों के काम आयेगी और न ही गरीबों की गरीबी दूर हो जायेगी, जबकि इसकी पब्लिसिटी भी बाबा राहुल गांधी को ही मिलेगी। टी-सीरीज वाले का मॉ वैष्णों के दरबार में रोजाना लगाया जाने वाला भंडारा, टी-सीरीज की ही पब्लिसिटी कर रहा है। वहां कितने करोड़ लोग खाकर चले गये कौन जानता है? हो सकता है राहुल बाबा ने भी वहां प्रसाद पाया हो। देश में चारों तरफ ऐसा देखकर भी उनके मन से यह हूक नहीं उठती कि सुल्तानपुर और रायबरेली में ही सही,कम से कम,एक-एक भंडारा तो खोल दिया जाये,जिससे वहां की गरीब और भिखमंगी जनता रोजाना भरपेट भोजन तो कर सके। राहुल गांधी कितना इस देश से कमायेंगे और किसके लिये,उनकी तो अभी शादी भी नहीं हुई है। 
         कपिल सिब्बल अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री की आड़ में घिनौना खेल खेलना चाह रहे हैं। ‘बिगबॉस’ कार्यक्रम क्या आपत्तिजनक नहीं है? कितनी ही पोर्न साइटें चल रही है, क्या वे आपत्तिजनक नहीं हैं? कितने ही ब्लू फिल्म दिखाने वाले अड्डे चल रहे हैं, वे आपत्तिजनक नहीं हैं? जहां तक धार्मिक भावनाएं भड़काने की बात है,उसमें भी दम नहीं है,क्योंकि जब धार्मिक भावनाएं भड़काकर भाजपा कुछ भी प्राप्त न कर सकी तो कोई और क्या पा सकेगा। हिन्दू-मुस्लिम सभी जानते हैं कि यह सत्ता का खेल है,फिर चाहे सत्ता पाकिस्तान की हो या गुजरात की। मनमोहन सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी पर फरसा लगाने की सोच पर उसे मुंह की ही खानी पड़ेगी। जिसकी एक घुड़की पर सरदार मनमोहन विचित्र मोहन की स्थिति में आ जाते हों,उसके कन्ट्रोल वाली साइबर मीडिया को कुटिल सिब्बल क्या खाकर नियंत्रण में कर पायेंगे,यही देखना शेष है। 
          इंटरनेट निहित हितों, मीडिया स्वामित्व से मुक्त है। सिब्बल इस पर लगाम क्यों लगाना चाहते हैं।
                  
 -वरूण गांधी,भाजपा सांसद।



       इंटरनेट की सेंसरशिप। इसकी जरूरत को एक मिनट के लिए भूल जाइए। क्या यह सम्भव है?
             
-जयन्त चौधरी, लोकदल सांसद एवं केन्द्रीय उड्डयन मंत्री, अजित सिंह के सुपुत्र।
 (सतीश प्रधान)



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