Friday, 30 December 2011

तानाशाही एक राजवंश की


          भारत में जनता की पसन्द का बहाना लेकर सत्ता पर काबिज राजवंश अब जनता की परवाह न करने वाले तानाशाह के रूप में सामने आ गया है। प्रधानमंत्री और संसद की ओर से सरकार के वरिष्ठ मंत्री द्वारा संसद में दिया गया आश्वासन {जिसे सेन्स ऑफ हाऊस कहना ज्यादा उचित है} को दरकिनार कर जनता को खुलेआम धोखा  दिया  जा रहा है। पूरी की पूरी सरकार राजवंश के इशारे पर नाचती हुई उल-जुलूल वक्तव्यों से जनता की इच्छा को पैंरों तले रौंद रही है और किसी को भी पूरे भारत में इटली के कैसीनो का साम्राज्य गुण्डई के साथ धन्धा करते दिखाई नहीं दे रहा है।
          राहुल बाबा कहॉं तक शिक्षित हैं यह तो वही जानें,लेकिन इतना तो के0जी0 क्लास का बच्चा तक जानता है कि हांथी कभी घास नहीं खाता है और पंजा केवल झपट्टा मारने के ही काम आता है। घास तो गधा खाता है। क्या हांथी और गधे का अन्तर भी कैम्ब्रिज स्कूल में नहीं सिखाया जाता! जनता की खून-पसीने की कमाई को चूस-चूस कर टैक्स के रूप में एकत्र किये गये धन की ऐसी रेबड़ी बांटी जा रही है कि गोया उनके दादा का माल हो। जब मन किया सबसिडी चालू कर दी और जब मन आया सबसिडी बन्द कर दी। हजारों-हजार करोड़ रूपये का बजट ऐसी योजनाओं के लिए हफ्तों में जारी कर दिया जाता है जिसके ना तो क्रियान्वयन की सही रूपरेखा है और ना ही मॉनीटरिंग की। देखिए किस तरह एक जनलोकपाल के मुद्दे को पूरी सरकार और उसके कारकूनों ने उसे जातिगत राजनीति से जोड़ते हुए आरक्षण का मुद्दा ही नहीं बनाया अपितू सारी ऊर्जा इस पर लगाई कि एक गधा लोकपाल तैयार किया जाये।
          शायद कांग्रेस पार्टी के जहन में नहीं है कि ट्यूनेशिया से उठी क्रान्ति,जिसने 30 सालों से भी अधिक सत्ता में काबिज राष्ट्रपति जैनुल आबिज जैनुल बिन अली को अपनी पत्नी और सारी धन-समपत्ति के साथ रातों-रात ट्यूनेशिया छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया,क्योंकि ट्यूनेशिया के बेरोजगार युवकों ने सत्ता के विरूद्ध धावा बोल दिया था, और देखते ही देखते बेरोजगार छात्रों का यह धावा एक क्रान्ति में तब्दील हो गया। इस क्रान्ति को चमेली क्रान्ति का नाम दिया गया और ट्यूनेशिया के महल में लाठी-डण्डा लेकर चढ़े युवकों को पूरी दुनिया में क्रान्ति के नये हिरावल दस्ते के रूप में देखा गया।
          ट्यूनेशिया से चला चमेली क्रान्ति का यह रथ उत्तरी अफ्रीका से लेकर मध्य पूर्व से होते हुए गेटवे ऑफ इण्डिया के रास्ते भारत में प्रवेशकर महाराष्ट्र के ही रालेगण सिद्धी में अपने प्रदर्शन का इंतजार कर रहा है। चमेली क्रान्ति का अगला पड़ाव मिस्र रहा,जहां होस्नी मुबारक 40 साल से सत्ता में जमे थे और भरपूर गुण्डई कर रहे थे। मिस्र की राजधानी काहिरा का तहरीर चौक आजादी की शहनाई का बिसमिल्लाह खॉं साबित हुआ। एक युवती(दुर्भाग्य है मेरा कि मेरे पास उस महान युवती का नाम नहीं है,इस पोस्ट को पढ़ने के बाद यदि कोई उसका नाम मुझे ईमेल कर देगा तो मेहरबानी होगी) ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि-मैं तहरीर चौक पर होस्नी मुबारक के खिलाफ आन्दोलन करने जा रही हूँ,बिल्कुल अकेली। अगर कोई मेरा साथ देना चाहे तो मेरे साथ आये। जब वह युवती घर से निकली तो अकेली थी,जब वह पांच किलोमीटर तक पहुंची तो उसके साथ दस लोग और जुड़ गये और इसके आगे जब वह कार्ड-बोर्ड का बैनर लिए तहरीर चौक पर होस्नी मुबारक के विरूद्व आन्दोलन करने खड़ी हुई,तबतक उसके साथ आये लोगों की तादाद दो दर्जन से ज्यादा हो गई थी।
          अब इस बात के आंकड़े राहुल गांधी और डा0 मनमोहन सिंह के द्वारा मोंटेकसिंह आहलुवालिया से निकालवाये जायें कि किस दर से आंदोलनकारियों की संख्या बढ़ी कि 11वें दिन वह युवती तहरीर चौक पर 10 लाख लोगों के साथ मौजूद थी। ये लोग किसी भी कीमत पर अपने घर वापस जाने को तैयार नहीं थे,भले ही उन्हें वहीं दफन ही क्यों न कर दिया जाये। किसी भी आन्दोलन की नब्ज,खुफिया ऐजेन्सियों अथवा अपने चमचों से नहीं टटोली जा सकती! मंहगाई से कराहती जनता को आपने रिजर्व बैंक के हवाले कर दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक तो एक सफेद हांथी है,जो केन्द्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार में जबरदस्त सहयोग कर रहा है। उसके पास मंहगाई कम करने का कोई फॉर्मूला है ही नहीं सिवाय रेपो रेट को जब-तब घटाने अथवा बढ़ाने के। जिसकी खुद की रेपो नहीं बची वह देश में रेपो की रेट तय कर रहा है,कैसा भाग्य है इस देश का। जो स्वंय दो कदम चलने को मजबूर है वो देश चला रहा है, है ना आश्चर्य की बात!
          राहुल गांधी आंकलन नहीं कर पा रहे हैं कि इस देश में बाजाफ्ता ट्यूनेशिया,जो क्रान्ति का दौर शुरू हुआ है वह मिस्र होता हुआ भारत में पहुंच चुका है,वह भारत की मगरूर सत्ता का क्या हश्र करेगा! राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने अपने पूरे मंत्रीमण्डल को 74 वर्षीय बुजुर्ग समाजसेवी अण्णा हजारे एवं उनकी टीम को बदनाम करने के लिए पीछे लगा दिया है, और पूरे देश में किये जा रहे भ्रष्टाचार जो विशेष रूप से उनकी ही पार्टी और मंत्रीमण्डल द्वारा किया जा रहा है, को छोड़कर केवल एक दलित महिला मुख्यमंत्री और उसकी पार्टी ही दिखाई दे रही है। कौन उनकी बात पर यकीन कर सकता है कि वे सच बोल रहे हैं,जबकि देश के सामने वे भट्टा-पारसौल मामले में लाशों के ढ़ेर को राख के ढ़ेर में तब्दील होने का फर्जी और गुमराह करने वाला झूंठा ढिंढ़ोरा पीट चुके हैं।
          ख्वाब उनका है प्रधानमंत्री बनने का और अपनी सरकार के तमाम लाखों करोड़ के भ्रष्टाचार की बात न करके केवल उ0प्र0 में मनरेगा के भ्रष्टाचार की बात करते हैं,गोया मनरेगा केवल उ0प्र0 में ही चल रही है। महाराष्ट्र,राजस्थान अथवा अन्य प्रदेशों में न तो यह स्कीम चल रही है और ना ही करोड़ों का घोटाला हो रहा है। वह भूले जा रहे हैं कि राजस्थान में तो उनकी पार्टी के मंत्री पूरी की पूरी औरत को अय्यासीबाजी करने के बाद चूने की भट्टी में झोंके दे रहे हैं। इस पर उन्हें शर्म नहीं आती है कोई क्षोभ नहीं होता है।
          मिस्र में होस्नी मुबारक के विरूद्ध तहरीर चौक के आन्दोलन ने कितनी तेजी से पूरे मिस्र को अपनी गिरफ्त में लिया,इसको मापने का कोई पैमाना न तो होस्नी मुबारक के पास था,ना ही हमारे भारत में सरदार मनमोहन सिंह, सरदार आहलुवालिया,सोनिया गांधी अथवा राहुल गांधी के पास है,बल्कि ये तो स्वंय पैमाने पर सवार हैं। होस्नी मुबारक ने सार्वजनिक रूप से प्रगट होकर जल्द चुनाव कराने की घोषणा की,लोगों को शांत करने के लिए तात्कालिक रूप से अपने मंत्रीमण्डल में कुछ फेरबदल भी किये,लेकिन जनता अड़ी थी कि वह किसी भी कीमत पर होस्नी मुबारक को सत्ता से बाहर देखना चाहती है।
          मिस्र की सेना जो कि होस्नी मुबारक के इशारे पर नाचती थी,सैद्धान्तिक रूप से ही मुबारक के साथ थी,और आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने से उसने भी इन्कार कर दिया था। व्यतीत होते हर पल के साथ तहरीर चौक का आन्दोलन इतिहास रचता रहा और हालात इतनी तेजी से बिगड़े कि होस्नी मुबारक को न चाहते हुए भी शर्म अल शेख भागना पड़ा। वर्तमान में होस्नी मुबारक नजर कैद हैं,उन पर मुकदमा चल रहा है और कोई नहीं जानता कि उनके साथ क्या होगा?
          अब आइये लीबिया पर! लीबिया में लगभग एक दशक से चले आ रहे सत्ता के खिलाफ विरोध ने ट्यूनेशिया और मिस्र से इतनी ऊर्जा ग्रहण की कि उसके जबरदस्त विरोधी रूख के कारण कर्नल मुअम्मर गद्दाफी को मजबूरन पहले राजधानी छोडनी पड़ी और फिर उसके बाद जान भी गवानी पड़ी। विद्रोहियों ने उन्हें उनके ग्रह नगर शर्त में उस समय गोलियों से छलनी कर दिया जब वह जान की भीख मांगने के बाद भाग खड़े होने की कोशिश कर रहे थे। लीबिया में इस समय अंतरिम सरकार है और वहां भी लोकतन्त्र की बहाली के लिए कोशिशें हो रही हैं।
           अब समय तानाशाही के अन्त का है,फिर चाहे यह सैन्य तानाशाही हो अथवा राजवंश की। सीरिया, लेबनान, यमन, सऊदी अरब कोई ऐसा देश नहीं है जहॉं सत्ता में काबिज शेखों, तानाशाहों और खलीफाओं के विरूद्व जनता में आक्रोश नहीं है। आतंक का पर्याय बने ओसामा बिन लादेन को,जिसकी खोज दस वर्षों से अमेरिकी सेना अफगानिस्तान की घाटियों में कर रही थी उसे पाकिस्तान के ऐबटाबाद में अमेरिकी सील ने एनकाउन्टर में मार गिराने का दावा कर इतिहास में दफन कर दिया। बावजूद इसके आतंक में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं आई है। आतंक में किसी भी प्रकार की कमी ना आना पूरी तरह से लादेन की मृत्यु पर सन्देह तो अवश्य प्रगट करता है। हॉं इतना जरूर है कि दुनिया जिस देश पाकिस्तान को आतंकवाद का एक्स्पोर्टर समझती है,उसी के देश में इस वर्ष दो दर्जन से अधिक आतंकवादी घटनाएं हुईं,जिसमें से अधिकतर फिदायीन दस्तों द्वारा अंजाम दी गयीं थीं।
          आतंक किसी का नहीं रहा तो कांग्रेस का कब तक रह सकता है? जनता द्वारा मांगे जा रहे एक जनलोकपाल बिल पर ऐसी हायतौबा! एक तरफ आप कहते हैं कि आप ईमानदार हैं और ईमानदारी से काम करते हैं,कांग्रेस ने अपना साथ दे रही ऐसी पार्टियों के नेताओं को समझाया कि अगर ये लोकपाल का बिल पास हो गया तो सबसे पहले तुम लोग ही पकड़े जाओगे,क्योंकि आय से अधिक सम्पत्ति का तुम्हारा ही मामला उच्चतम न्यायालय में चल रहा है। बस फिर क्या था नेता जी ने कर दिया रोना शुरू! उन्होंने भरी संसद कैसे रो-रोकर बताया कि तब तो हमें एक दरोगा जब चाहेगा जेल भेज देगा। डी.एम. और एस.पी. जब चाहेंगे हमें जेल भिजवा देंगे। हम ऐसे किसी लोकपाल बिल को पास नहीं होने देंगे।
          एक दरोगा से कैसे एक पार्टी का मुखिया इतना भयभीत दिखाई दिया कि बस रोना ही बाकी था। क्या जनता समझ नहीं रही है कि यदि ऐसा बिल पास हो जाये तो उसका भी भला हो जायेगा? जब आप ईमानदार हैं तो जनलोकपाल के एक दरोगा से डरने की क्या जरूरत? एक दरोगा से जब आप खुलेआम एसएसपी को गाली दिलवा सकते हैं,उसी दरोगा का इस्तेमाल गेस्ट हाऊस काण्ड कराने में कर सकते हैं तब आपको डर नहीं लगता,लेकिन उसी दरोगा के लोकपाल के अधीन हो जाने पर आपकी रूह कांप रही है!
          आखिरकार इन दरोगाओं की नियुक्ति क्या केवल जनता को परेशान करने,उन्हें बेवजह जेल में बन्द करने और इन नेताओं की गुलामी करने के लिए की गई है? इन दरोगाओं से आपको तब डर नहीं लगता है जब आप इनका इस्तेमाल शैडो की तरह करते हो! इनसे लूट करवाते हो अथवा मासूम जनता पर लाठी चार्ज कराते हो। क्या यह सच नहीं है कि आप नेताओं ने इन दरोगाओं को अपना निजी नौकर बना छोड़ा है। अब जब आपको दिखाई दिया कि अरे यह तो लोकपाल का दरोगा होगा जो हमारी हुक्म उदीली नहीं करेगा तो आपकी रूह कांपने लगी। कड़क ठंड में संसद की गर्मी के अन्दर आपके बदन से पसीना टपकने लगा। आपकी सदरी तर-बतर हो गई।
          70 प्रतिशत मतदाता को बलाये ताख रख केवल 30 प्रतिशत मतदाताओं के मत पर आप पूरे हिन्दुस्तान को गधे की तरह चरे जा रहे हो? भाई कभी तो जनता जागेगी और जब भी जाग गई समझ लीजिए इस हिन्दुस्तान में भी सुनामी आ जायेगी। आपको कर्नल गद्दाफी की तरह भागने का मौका भी नहीं मिलेगा। आपको पांच साल के लिए उत्तर प्रदेश की सत्ता चाहिए, लेकिन केन्द्र में मिली सत्ता से आपने इस देश की जनता को जो दिया है उसके बदले में आपको क्या मिलना चाहिए यहां लिखना ठीक नहीं है। लेकिन इतना ध्यान रखिए भगवान कहीं है तो वो सिर्फ हिन्दुस्तान में ही है,और आपका क्या हश्र होगा यह तय तो है, लेकिन खुलेगा भविष्य में ही।

अब हम आपको बताते हैं, कब और कहां से शुरू हुई क्रान्ति।

ट्यूनेशियाः 18 दिसम्बर 2010 को विरोध प्रदर्शन शुरू,14 जनवरी को ट्यूनेशिया के राष्ट्रपति बेन अली का इस्तीफा, सरकार ने सत्ता छोड़ी।
मिस्रः 25 जनवरी 2011 को आन्दोलन शुरू,11 फरवरी को होस्नी मुबारक ने सत्ता को कहा अलविदा।
यमनः 03 फरवरी 2011 को आन्दोलन शुरू,23 नवम्बर को सरकार सुधारों के लिए तैयार हो गई।
लीबियाः 17 फरवरी को गद्दाफी के खिलाफ शस्त्र विद्रोह,19 मार्च को लीबि‍या में नाटो की सैन्य कार्रवाई आरम्भ, 20 अगस्त को त्रिपोली में विद्रोही सेना का प्रवेश, 23 अगस्त को सत्ता से किया बेदखल, 20 अक्टूबर को विद्रोही सेना ने गददाफी व उनके पुत्र की हताया की,गददाफी शासन का अंत ।
सीरियाः 15 मार्च को बशर अल असद के खिलाफ हुआ आन्दोलन का आगाज,18 अगस्त को अमेरिका व यूरोपीय संघ ने सीरि‍या पर लगाए प्रतिबंध। (सतीश प्रधान)

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