Friday, 17 February 2012

क्लीनिकल परीक्षण का फॉलोअप

          दिनांक 5 फरवरी 2012 को ’ऐसे डॉक्टर और केमिस्ट दोनों ठग’ शीषर्क की पोस्ट में आपने पढ़ा कि कैसे हिन्दुस्तान में दवाओं का परीक्षण बिना किसी हिचक व रोक-टोक के यहॉं के चिकित्सालयों, मेडीकल रिसर्च सेन्टर्स, पी0जी0आई0 आदि में किया जा रहा है, जिसमें कितने ही हजार लोगों की जान बगैर यह जाने चली गई कि उनके शरीर के साथ बिना उनकी सहमति के दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है। इसी बिना पर तथ्यों पर आधारित एक जनहित याचिका गैर सरकारी संगठन स्वास्थ्य अधिकार मंच ने वकील संजय पारिख के माध्यम से भारत के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर मांग की है, कि आम लोगों पर दवाओं के गैरकानूनी परीक्षण पर रोक लगाई जाये साथ ही परीक्षण सम्बन्धी नियम कानूनों को चाक चैबन्द करने पर भी जोर दिया जाये।
          संजय पारिख का कहना था कि बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियां ठेके पर रिसर्च कम्पनियों से ये काम कराती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1727 लोगों की ऐसे परीक्षणों से मौत हो चुकी है। ऐसा खेल सिर्फ इन्दौर में ही नहीं अपितू ये पूरे देश में चल रहा है। दवाओं के गैरकानूनी परीक्षण के लिए भारत के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। मध्य प्रदेश राज्य में पिछले साल जून में पूरी हुई राज्य सरकार की जॉंच में यह साबित हो चुका है कि सिर्फ इसी मामले में 3307 लोगों पर ऐसे परीक्षण गैर कानूनी रूप से किये गये। इनमें से 81 मरीजों को तो अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। कई मामलों में तो पाया गया कि मुख्य शोधकर्ता ही एथिकल कमेटी के सदस्य भी थे। परीक्षण के लिए भारत में वर्ष 1945 से जो नियम चल रहे थे, उन्हें जनवरी 2005 में बदल कर कम्पनियों के लिए आसान कर दिया गया।
          दरअसल ये बदलाव किया ही गया था इन कम्पनियों के दवाब में। इसके तहत भारत में पहले और दूसरे फेज के परीक्षण काफी आसान कर दिये गये। इसके बाद से सारी दवा कम्पनियों ने परीक्षणों के लिए भारत का रूख कर लिया, क्योंकि यहॉं पर आम आदमी की जान की कीमत बहुत सस्ती और कभी-कभी तो एकदम मुफ्त की होती है। नई दवा मूल रूप से जहॉं खोजी गई होती है, वहॉं या तो उसका क्लीनिकल परीक्षण करने की इजाजत नहीं होती, या फिर यह काम बहुत मंहगा होता है। वैसे तो नियमों में यह प्राविधान होना चाहिए कि केवल भारत में खोजी गई दवाओं के ही क्लीनिकल परीक्षण भारत में होंगे। विदेश में खोजी गई दवा का परीक्षण भारत में किये जाने का क्या औचित्य? लेकिन पता नहीं कि याचिका में इस सम्बन्ध में मांग की गई है अथवा नहीं। याचिका पर सज्ञान लेते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार और मेडीकल काउन्सिल ऑफ इण्डिया को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में याचिका का जवाब दाखिल करने को कहा है। देखना शेष है कि अब होता क्या है। (सतीश प्रधान)





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