Monday, 20 February 2012

भू-सम्पत्ति क्षेत्र में भ्रष्टाचार

          भारत में जमीन की रजिस्ट्री, खसरा-खतौनी की नकल, दाखिल-खारिज, जिन्दा को मृतक दर्शाकर उसकी भूमि हड़पने (वर्ष 2009 तक अकेले उ0प्र0 में सम्पत्ति हड़पने के लिए राजस्व विभाग के अभिलेखों में 221 कृषकों को जिन्दा रहते मृत दिखाया गया) तथा विरासत दर्ज करने के साथ-साथ भूमि के अधिग्रहण में हर वर्ष हजारों करोड़ रूपयों की भारी भरकम रकम घूस के रूप में सरकार, सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जेब में चली जाती है। ध्यान रहे ये जमीनें यहॉं की जनता की अपनी पुश्तैनी हैं। जिन पुश्तैनी जमीनों को जनहित के नाम पर सरकारें, कानून की आड़ में पुलिस के बल पर जबरन अधिग्रहीत कर उसके उपयोग को लैण्ड यूज के माध्यम से रिहायशी, कामर्शियल, औद्योगिक एवं पर्यटन करके भूमि अधिग्रहण का खेल, खेल रही हैं, उनमें करोड़ों रूपयों का वारा न्यारा हो रहा है।
          स्ंयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन, एफ0ए0ओ0 (फूड एण्ड एग्रीकल्चर आरगेनाइजेशन) एवं ट्रान्सपेरेन्सी इन्टरनेशनल ने मिलकर एक अध्ययन किया है, जिसमें भारत में जमीन की रजिस्ट्री, उसकी नकल आदि में ही 3700 करोड़ की रिश्वत सरकारी अधिकारियों द्वारा लिये जाने का निष्कर्ष निकाला गया है। दोनों संगठनों ने संयुक्त रूप से भू-सम्पत्ति क्षेत्र में भ्रष्टाचार शीर्षक से एक अध्ययन रिर्पोट तैयार की है जिसमें कहा गया है कि कमजोर प्रशासन की वजह से जमीन से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। इस अध्ययन के अनुसार जमीन सम्बन्धी मामलों में भ्रष्टाचार देश के विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। यह अध्ययन 61 देशों में किया गया है तथा अध्ययन के मुताबिक जमीन को लेकर निचले स्तर पर भ्रष्टाचार छोटी-छोटी रिश्वत के रूप में विद्यमान है। वहीं दूसरी ओर ऊंचे स्तर पर सरकारी ताकत, राजनीतिक रूतबे और कार्पोरेट अर्थतन्त्र के गठजोड के कारण, यह बहुत बड़े स्कैम से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
          सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों को कार्पोरेट घराने जमीन हथियाने या कहिए अपना बहुत बड़ा लैण्ड बैंक बनाने के लिए उन्हें मूंह मांगी रिश्वत और सुरा-सुन्दरी की सुविधा देकर अपने मन मुताबिक नचा रहे हैं। अंर्तराष्ट्रीय स्तर की इन दो बड़ी संस्थाओं ने जमीन से जुड़े इस सबसे बड़े सच पर पर्दा डालने का काम क्यों किया आश्चर्य का विषय है! अध्ययन के माध्यम से घूस की जिस रकम का खुलासा किया गया है, उसका वास्तविकता से कोसों दूर का भी नाता नहीं है। यह रकम 70 करोड़ डॉलर बताई गई है, जबकि यह असली घूस 34500 करोड़ रूपये का पसंगा भी नहीं है।
          भारत के ही एक राज्य में केवल भू-अधिग्रहण मामले में ही 70 करोड़ डॉलर से दस गुना अधिक यानी 34500 करोड़ रूपये, सरकार, सरकारी प्रशासनिक अधिकारियों यथा भूमि अध्याप्ति अधिकारी, ए0डी0एम0, जिलाधिकारी, आयुक्त, सचिव, तथा राजस्व से जुड़े अधिकारियों यथा तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, लेखपाल के साथ ही राजनीतिक व्यक्तियों को रिश्वत के रूप में दी गई है, जिसमें राजनीति के निचले पायदान पर बैठा ग्राम प्रधान भी भरपूर लाभान्वित हुआ है। पंचायत-पंचायत, ब्लॉक-ब्लॉक, तहसील-तहसील, परगना-परगना, जिला-जिला भारतीय भूमिधरों को गिरोहबन्द तरीके से लूटा गया है। उनकी पुश्तैनी जमीन पर राजस्व से जुड़े अधिकारियों ने गिद्ध दृष्टि लगाकर उनका दोहन किया है। इन सबके बीच अभी चकबन्दी विभाग की चर्चा होना बाकी है।
          देश को स्वतन्त्र हुए 64 वर्ष हो गये लेकिन क्या आपको ताज्जुब नहीं होता कि अभीतक उत्तर प्रदेश में चकबन्दी ही पूरी नहीं हो पाई है। क्या यह दुर्भाग्य अथवा लूट का विषय नहीं है कि आजतक चकबन्दी विभाग बदस्तूर चालू है। लूट के दम पर खड़ा यह विभाग आजतक मजे मारते हुए मलाई काट रहा है। सहायक चकबन्दी अधिकारी स्तर के कई कर्मचारी करोड़पति हैं। जनता की सहूलियत के लिए बनाया गया यह विभाग जनता के लिए लुटेरा बन चुका है। दोनों संगठनों ने ऐसा अध्ययन 61 देशों में किया जाना बताया है, जिसमें भारत भी एक है। अंर्तराष्ट्रीय स्तर के इन संस्थानों से ऐसे लचर अध्ययन की उम्मीद नहीं की जाती है। इन संस्थानों ने या तो अध्ययन ही लचर तरीके से किया अथवा उसकी रिर्पोट प्रस्तुत करने में गोल-माल कर दिया। या जिन संस्थाओं/एन0जी0ओ0 के माध्यम से इसका अध्ययन कराया गया उनको राजस्व विभाग और यहॉं के किसानों/भू-मालिकों की तकलीफ का अन्दाजा ही नहीं था। उन्हें शायद पता ही नहीं कि राजस्व विभाग का एक अदना सा कर्मचारी लेखपाल, किसी जागीरदार से कम नहीं है।
          भारत की जमीन का एक-एक इंच टुकड़ा, बगैर लेखपाल की सहमति के आप इधर से ऊधर नहीं कर सकते। भारत का सुप्रीम कोर्ट और राजस्व अधिनियम चिल्ला-चिल्ला कर कुछ भी कहते हों, लेकिन वह नियम के हिसाब से तभी काम करेगा जब उसकी जेब गरम हो जायेगी। खसरा-खतौनी की नकल, दाखिल-खारिज, और वसीयत दर्ज कराने एवं जमीन की रजिस्ट्री कराने में कई हजार करोड़ रूपये प्रतिवर्ष सरकारी कर्मचारियों की जेब में चले जाते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि राजस्व विभाग के इन अदने से कर्मचारियों (लेखपाल) के पास सैकड़ों बीघे के फार्म हाऊस के साथ ही करोड़ों रूपये के बैंक बैलेन्स हैं।
          अध्ययन में यह बताया गया है कि जमीन सम्बन्धी भ्रष्टाचार भारत तक ही सीमित नहीं है, यह पूरी दुनिया में फैला हुआ है। ऐसा अध्ययन भारत के लिए किसने किया और किस स्टेट एवं जनपद में किया गया पता नहीं। हिन्दुस्तान में सारा खेल जमीन का ही है। यह हिन्दुस्तान ही है, जहॉं मुस्लिमों ने 700 वर्षों तक शासन किया और उसके बाद अंग्रेजों ने 200  वर्षों  तक शासन किया। इसके बाद देश स्वतन्त्र हुआ और यहीं के तथाकथित गोरे दिखने वाले दिल के कालों के हांथ में अंग्रेजों ने सत्ता सौंप दी। असली काला तो गोली खाकर हे-राम हो गया और गोरे से दिखने वाले कालों ने यहॉं के राजाओं का प्रीवीपर्स छीन लिया। 543 इस्टेट 543 संसदीय क्षेत्र में तब्दील हो गये। राजाओं की जगह सांसद आ गये और बस बन गया झमाझम लोकतन्त्र।
          राजाओं को सरवाइव करने के लिए अपनी जमीनें बेंचनी पड़ रही हैं। धीरे-धीरे विकास के नाम पर यहॉं की जनता की एवं राजाओं की जमीनें इन नये पैदा हो रहे सांसदों, ब्यूरोक्रेट्स और कार्पोरेट घरानों के हांथ में आना शुरू हो गईं। असली राजाओं का वंश तबाह होने लगा और नकली राजाओं की फौज खड़ी होने लगी। वाजिदअली शाह के खान्दानी चाय बेचने लगे और चाय बेचने वालों के खान्दानी एवं नहर के किनारे से सत्ता में आये लोग विकास के नाम पर लूट मचाकर विदेशी बैंकों में कालाधन जमा करने लगे।
          आज की तारीख में सत्ता से जुड़ा कौन सा ऐसा सांसद है जिसकी हैसियत किसी राजा से कम है। केवल घड़ी का डायल बदला है, अन्दर खाने वही 35 रूपये वाली मशीन लगी है जो आपके हांथ की घड़ी भी चला देगी और घंटाघर की घड़ी भी। क्या इन दोनों ऐजेन्सियों का संयुक्त अध्ययन एक औपचारिकता तो नहीं थी? अध्ययन किसी और मकसद की पूर्ति के लिए किया गया और परिणाम कुछ और दिखाया गया है।
          एफ0ए0ओ0 के अध्ययन में तो यह स्पष्ट रूप से आना ही चाहिए था कि पहले कितने हेक्टेयर पर कृषि होती थी और वर्तमान में कितने हेक्टेयर क्षेत्र पर कृषि हो रही है। कौन-कौन सी पैदावार की कमी आ गई है। कौन सी फसल नदारत हो गई है, और किसकी पैदावार बढ़ गई है। पूर्व में उत्पादन कितना था और अब कितना रह गया है। कृषि क्षेत्र कितना सिकुड़ गया है, आदि-आदि। खाद्यान्न जो भी पैदा होता है, गोदामों की कमी, ऊंचे परिवहन भाड़े के कारण या तो खपत की जगह तक ही नहीं पहुंच पाता अथवा एफ0सी0आई0 के गोदामों में सड़ा दिया जाता है । व्यक्ति और खाद्यान्न के बीच के गैप को पूरा करने के लिए मंत्रीगण आयात का रास्ता खोलते हैं और करोड़ों डॉलर खर्च दिखाकर उसका कमीशन विदेशी बैंकों में जमा करा देते हैं। ऐसे ही कालेधन को भारत में लाने की मांग हो रही है।(सतीश प्रधान)

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