Monday, 18 June 2012

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा



लगभग 44 वर्ष की उम्र तक पत्रकारिता से दूर-दूर तक का नाता ना रखने वाले एवं प्रबन्धकीय पद पर कार्य करने वाले एक व्यक्ति नेअचानक रातों-रात लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक समाचार-पत्र, जनसत्ता एक्सप्रेस (फ्रेन्चाइजी के तहत वर्तमान में बन्द हो चुके) के तत्कालीन अनुबन्धकर्ता एवं स्वामी डा0 अखिलेश दास की मेहरबानी से महाप्रबन्धक होने के बावजूद सम्पादक का चार्ज ले लिया और पत्रकार बन गये। डा0 अखिलेश दास ने भी बगैर यह विचार किये कि इस महाप्रबन्धक का पत्रकारिता से कोई लेना-देना ही नहीं है, फिर भी सम्पादकीय विभाग में एक से एक पत्रकारों के मौजूद रहने के बाद भी उन सबको नजरअन्दाज करते हुए समाचार-पत्र का सम्पादक बना दिया। मि0 दास एक बिजनेसमैन हैं और उन्होंने अपने फायदे के लिए ही ऐसा कर डाला। दोनों पद एक व्यक्ति को देकर उन्होंने सम्पादक को दी जाने वाली सेलरी को आराम से बचा लिया।
इस प्रकार सीनियर प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों को आम की पेटी एवं उपहार के बल पर अपने को जिन्दा रखने वाले इस व्यक्ति, मि0 पंकज वर्मा ने महाप्रबन्धक एवं सम्पादक का चार्ज लेते ही समाचार-पत्र के ब्यूरो प्रमुख की मेहरबानी से दिनांक 31 जनवरी 2004 को राज्य सम्पत्ति विभाग का शासकीय आवास, राजभवन कालोनी में नं0-1 आवंटित करा लिया। वर्ष 2005 में मि0 पंकज वर्मा को डा0 अखिलेश दास ने विज्ञापन के धन में हेरा-फेरी करने के आरोप में नौकरी से भी निकाल बाहर किया।
पंकज वर्मा के पत्रकार न रहने और मेसर्स शोंख टैक्नोलॉजी इण्टरनेशनल लिमिटेड में वाइस प्रेसीडेन्ट का पद पाने और इसके बाद हेरम्ब टाइम्स में राजनीतिक सम्पादक होने और फिर वारिस-ए-अवध का संवाददाता दर्शाने की स्थिति में विशेष सचिव एवं राज्य सम्पत्ति अधिकारी, उ0प्र0 शासन ने 15 फरवरी 2006 को उनका आवंटन आदेश निरस्त कर दिया। इस आदेश के विरूद्ध मि0 पंकज वर्मा ने वर्ष 2006 में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में रिट पिटीसन संख्या-1272 दाखिल की।

जिसकी पूरी तरह से सुनवाई करने के बाद विद्धान न्यायाधीषों क्रमशः श्री संजय मिश्रा एवं श्री राजीव शर्मा ने रिट पिटीसन संख्या-1272 पर फाइनल आर्डर किया कि- 
                   The impugned order does not suffer from any error in law and as such, the writ petition having  no merit is accordingly dismissed. 

इसके बाद मि0 पंकज वर्मा ने माननीय सुप्रीम कोर्ट में संख्या-18145 से वर्ष 2007 में एस0एल0पी0 दाखिल कर दी।
माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 05 अक्टूबर 2007 को हुई पहली सुनवाई में आदेश हुए कि-
              Upon hearing counsel the court made the following ORDER-
              Issue notice. Status quo shall be maintained in the meantime. 

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 04 फरवरी 2008 को हुई दूसरी सुनवाई में आदेश हुए कि-
              Ms Shalini Kumar, learned Advocate appearing on behalf of Ms. Niranjana Singh, Advocate on Record accepts notice for all the respondents and seeks time to file Vakalatnama & Counter Affidavit. 
              They may do so, before 29th Feb. 2008. 
              List the matter on 29th Feb. 2008.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 29 फरवरी 2008, को हुई तीसरी सुनवाई में आदेश हुए कि-
              Office is directed to rectify the data base so as to disclose the names of all the concerned Advocates in the Cause List who have filed their appearance. 
               List the matter before the Hon’ble Court. 

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 21 अप्रैल 2008, को हुई चैथी सुनवाई में आदेश हुए कि-
              Two weeks time is granted to file rejoinder affidavit.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 14 जुलाई 2008, को हुई पांचवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-

             We find that the petitioners counsel had made a request by letter dated 16/04/2008 for grant of time & time was accordingly granted on 21/04/2008. 
             Again similar request is made by writing an identical letter. We see no ground for extending the time.The request for extending further time to file a rejoinder is rejected. 

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 19 अगस्त 2008, को हुई छठी सुनवाई में आदेश हुए कि-
             Place before appropriate Bench.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 13 अक्टूबर 2008, को हुई सातवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             Order dated 14/07/2008 is recalled. Rejoinder affidavit be filled within two days.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 01 जनवरी 2009, को हुई आठवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             Pleadings are complete. List this matter for hearing in the last week of Feb.2009. In the meantime, the State Govt. is at liberty to take a decision on the representation stated to have been filed by the petitioner if the said representation is still pending for decision.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 23 फरवरी 2009, को हुई नौवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             In view of the letter circulated on behalf of learned counsel for the petitioner, list after four weeks.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 27 मार्च 2009, को हुई दसवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
            On the joint request made by the parties, list this matter after the ensuing Summer Vacation.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 06 जुलाई 2009 को ग्यारहवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             List for final disposal in Nov. 2009.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 17 सितम्बर 2010 को हुई बारहवीं सुनवाई में आदेश हुए कि-
             The matter is adjourned for eight weeks.

माननीय सुप्रीम कोर्ट में दिनांक 26 अगस्त 2011 को हुई फाइनल सुनवाई में एस0एल0पी0संख्या-18145 को न्यायमूर्ति माननीय श्री आर.बी रविन्द्रन और न्यायमूर्ति माननीय श्री ए0के0पटनायक ने अंतिम रूप से निस्तारित करते हुए आदेश दिये कि-
           
         Upon hearing counsel the Court made the following ORDER-
             Special Leave Petition is dismissed.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी पंकज वर्मा के वकील महोदयों ने टाइम-पर टाइम लेने और कोर्ट का समय जाया करने की असफल कोशिश की, एवं मा0 सुप्रीम कोर्ट की जल्द निपटारे की मंशा के बाद भी चार साल लग गये। मि0 पंकज वर्मा ने इस प्रकार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वाद दाखिल करके छह साल आराम से गुजार दिये और अब 26 अगस्त 2011 को दिये गये सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी अनादर करते हुए आराम से उसी सरकारी आवास में अवैध एवं अविधिक कब्जा जमाये हुए हैं।

जिस आवास को खाली कराने के लिए राज्य सम्पत्ति विभाग ने जनता के धन के लाखों रूपये वकीलों की फीस के रूप में खर्च कर डाले और दोनों ने मिलकर माननीय हाई कोर्ट और माननीय सुप्रीम कोर्ट का समय भी बर्बाद किया, उसी आवास को पुलिस बल से कब्जा मुक्त कराने की कोई मंशा राज्य सम्पत्ति विभाग की नहीं दिखाई देती। नहीं तो क्या कारण है कि 26 अगस्त 2011 को मा0 सुप्रीम कोर्ट से फैसला राज्य सम्पत्ति विभाग के पक्ष में होने के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग आज दिनांक 18 जून 2012 तक मि0 पंकज वर्मा से शासकीय आवास रिक्त नहीं करा पाया है? जब मि0 पंकज वर्मा से आवास खाली ही नहीं कराना था तो आवंटन आदेश रद्द ही क्यों किया गया? और मा0 हाईकोर्ट में एवं मा0 सुप्रीम कोर्ट में प्रतिवाद ही क्यों किया गया? यदि प्रतिवाद सही किया गया तो राज्य सम्पत्ति विभाग मि0 पंकज वर्मा के खिलाफ पब्लिक प्रिमाइसेज (इविक्सन) एक्ट के तहत बेदखली की कार्रवाई क्यों नहीं करता है?

मि0 पंकज वर्मा ने भी वकीलों की फौज पर लाखों रूपये बहाये, आखिरकार इतना धन मि0 पंकज वर्मा कहॉं से लाये? इनके पास आय से अधिक सम्पत्ति की आखिरकार जॉंच क्यों नहीं होनी चाहिए? उ0प्र0की राजधानी लखनऊ में तकरीबन तीन दर्जन पत्रकार ऐसे हैं जो करोड़पति हैं, एक दर्जन ऐसे हैं जो अरबपति हैं और प्रदेश की मीडिया को, नौकरशाही को एवं सरकार को अपनी उंगली पर नचाते हैं एवं पत्रकारिता की ऐसी की तैसी कर रखी है। प्रदेश के समस्त मान्यता प्राप्त पत्रकारों की आय से अधिक सम्पत्ति की जॉंच तो होनी ही चाहिए, यदि देश के इस चौथे खम्भे को दुरूस्त रखना है तो।

मि0 पंकज वर्मा और राज्य सम्पत्ति विभाग, दोनों ने मिलकर क्या माननीय उच्च एवं उच्चतम न्यायालय का वक्त बर्बाद करते हुए उसके दिये गये आदेश को ठेंगा नहीं दिखाया। यदि यह मुकदमा दोनों न्यायालय में ना लगा होता तो मा0 दोनों न्यायालयों को किसी और विशेष मुकदमे को निपटाने का समय मिला होता एवं वास्तव में किसी गरीब-गुरबे की सुनवाई हुई होती और उसे राहत मिली होती। यहॉं तो कुल मिलाकर माननीय न्यायालयों को ही बेवकूफ बनाने में दोनों पक्ष एकमत रहे

उत्तर प्रदेश में ज्यादातर पत्रकारों ने इसी तरह फर्जी तरीके से सरकारी आवास पाये हुए हैं। अपना मकान होते हुए भी (जिसे सरकार ने 40 प्रतिशत की सबसिडी पर दिया है) उसे अस्सी-अस्सी हजार रूपये प्रतिमाह किराये पर उठाकर, राज्य सम्पत्ति विभाग में झूंठा शपथ-पत्र प्रस्तुत कर कई दशकों से सरकारी आवास पर कब्जा जमाये हुए हैं और संस्थान से रिटायर होने के बावजूद पत्रकार मान्यता पाने के लिए और आवास पर कब्जा बरकरार रखने के लिए वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र पत्रकार की श्रेणी बनवाकर शासकीय आवास पर कब्जा किये हुए हैं। कितने तो करोड़ों की अचल सम्पत्ति रखने के बाद भी सरकारी आवास पर काबिज हैं। क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं है कि 70 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति भी पत्रकार बने रहकर सरकारी आवास घेरे हुए हैं और आर्थिक रूप से कमजोर एवं नौजवान, कर्मठ लगभग तीन दर्जन पत्रकार सरकारी आवास पाने से वंचित हैं और किसी तरह से गुजर-बसर कर रहे हैं।

माननीय मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट श्री एस0एच0 कपाड़िया जी से अनुरोध है कि मेरी इस अपील को पब्लिक इंटीरेस्ट लिटिगेसन की तरह ट्रीट करते हुए मुझ समेत समस्त पक्ष को नोटिस जारी करना चाहें, जिससे भविष्य में आपके न्यायालय तक पहुंचने वाला वादी और प्रतिवादी आपके आदेश का अक्षरशः पालन करे, उसके साथ ढ़ींगा-मुस्ती करने की हिम्मत ना दिखा पाये।

उपरोक्त की हार्ड कॉपी मय आवश्यक कागजातों के द्वारा रजिस्ट्री आपके पास इस उम्मीद से भेज रहा हॅूं कि आपके आदेश के बाद भी मि0 पंकज वर्मा का निरस्त आवास संख्या-1, राजभवन कालोनी, लखनऊ जो मुझे 30 मई 2012 को आवंटित किया गया है,उस पर अभी तक मि0 पंकज वर्मा का कब्जा किस प्रकार से बना हुआ है? आवास निरस्तीकरण के बाद फैसला आने पर भी राज्य सम्पत्ति विभाग ने अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की?
(सतीश प्रधान)
http://janawaz.com/archives/2020

5 comments:

Rakesh Srivastava said...

I am agree with you. kindly tell me how to support.

Suresh Chatterjee [India] said...

A very exciting but serious article. Journalism sector is getting worse than ever but even then some dedicated journalists/writers/authors (like you) are present even today.

Divakar Singh [India] said...

A fantastic editorial by a fantastic writer.
There are many more Pankaj Verma's in this country, Government should take necessary steps to avoid fake "Journalists" to enter this field.

Anonymous said...

प्रधान जी]
आपने समस्त पत्रकारों से पंगेबाजी शुरू कर दी, यह ठीक बात नहीं है. आप जिन्हें अपने खिलाफ समझ रहे हैं] दरअसल उनकी आड़ में दूसरे लोग आपसे खेल-खेल रहे हैं. आपने कुबेर टाइम्स में सर्वशक्तिमान सम्पादक एवं महाप्रबन्धक रहते हुए जितने पत्रकारों को निकाल बाहर किया, वे सब इसी लखनऊ में विभिन्न समाचार-पत्रों में कार्यरत हैं, और आपकी काटने में लगे रहते हैं। ध्यान करिये आपकी हुई मान्यता को भी उसी गु्रप ने कैन्सिल करा दिया था। वहॉं कार्य करने वाली एक महिला पत्रकार भी आपसे सख्त नाराज है, यही लोग आपके सबसे बड़े दुश्मन हैं.
अशोक पाठक ने आपको आगे रखकर सारा खेल खेला. दैनिक जागरण को मशीन बेंची उसने और प्रचार यह कि आपने बेंच दी। अब प्रभात त्रिपाठी बन्धु आपको आगे करके श्री शिवपाल जी के खास को आपके माध्यम से नुकसान करने की साजिश कर रहे हैं। आपसे लोग इसलिए भी नाराज हैं कि आप जे0पी0ग्रुप में होते हुए भी किसी भी पत्रकार को न तो दावत देते हैं और ना ही गिफट वगैरह। अन्य पत्रकार भी हैं जो पोण्टी चडढ़ा] मुकेश अम्बानी] अनिल अम्बानी] आदि से जुड़े हैं] लेकिन वे सबको ओबलाइज करते हैं।
आप प्रभात त्रिपाठी] त्रिपाठी] रजा रिजवी] मोइज खाऩ आदि का साथ देकर अच्छा नहीं कर रहे हैं। मेरा भाई आपका कतई विरोधी नहीं है] उसका नया-नया निकाह हुआ है] इसलिए उसे और उसके मित्र शर्मा जी एवं सच्चे का साथ दीजिए] ये सब आपके काम आयेंगे। आपको पता नहीं इनके पास क्या ताकत है। सच्चे का साथ दीजिए] झूंठों का नहीं। पत्रकारों की पोल-पट्टी खोलने से कोई फायदा नहीं है। मकान पर कब्जा करना है तो साम को मीडिया सेन्टर में बैठिए] दावत दीजिए। आप भी खुश हम भी खुश। बाकी आपकी मर्जी।
यासिर जाफरी] पत्रकार

jnn9 said...

Mr Jafri,
Are u the brother of Asif Jafri.

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