Monday, 28 July 2014

रेप्लिका आफ सरदार पटेल

इतिहास बताता है कि भारत वर्ष 1947 में आजाद हो चुका है, लेकिन सही मायनों में कहा जाए तो भारत को अंग्रेजों के कब्जे से भले ही आजादी 1947 में मिल गई होलेकिन असली आजादी तो 26 मई 2014 को ही मिली है,जिस दिन आजाद भारत में ही जन्मे भाई नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने भारत के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली है।
स्वामी विवेकानन्द जी एवं नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जैसे देशभक्तों के विचारों एवं गुणों से ओत-प्रोत और सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमूर्तिभाई नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने पूरे हिन्दुस्तान में नई ऊर्जा का संचार ही नहीं किया हैअपितु उनका व्यक्तित्व निश्चित रूप से भारत देश को उन बुलन्दियों पर पहुंचायेगा जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने अपना बलिदान देकर की थी।
दो सौ वर्षों की गुलामी कराने के बाद अंग्रेजों ने जिस हिन्दुस्तान को आजाद किया था,दरअसल उसकी चाबी अंग्रेजों ने अपने पिठ्ठुओं के ही हांथ सौंपी थी। हिन्दुस्तान का पहला प्रधानमंत्री जो व्यक्ति बनावह सम्पूर्ण कांग्रेस की पसन्द का कतई ना होकर मात्र महात्मा गांधी और अंग्रेजों की पसन्द का ही था। वरना क्या वजह थी कि उस समय मौजूद पन्द्रह कांग्रेस कमेटियों में से 12 कांग्रेस कमेटियों द्वारा सरदार पटेल का नाम कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए संस्तुत किये जाने के बाद और तीन कांग्रेस कमेटियों द्वारा किसी के भी नाम की संस्तुति ना करने के बाद भी एवं किसी भी एक कांग्रेस कमेटी से पं0 जवाहर लाल नेहरू के नाम की संस्तुति ना होने के पश्चात भी पं0 नेहरू को स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री बना दिया गया।
दरअसल सम्पूंर्ण कांग्रेस कमेटी द्वारा सरदार पटेल के नाम की ही सिफारिश मिलने के बाद महात्मा गांधी जी ने सरदार पटेल पर दबाव डाला कि वे इस पद से इस्तीफा दे दें,क्योंकि वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ही बनें। महात्मा जी की बात का आदर करते हुए सरदार पटेल ने कांग्रेस अध्यक्ष बनने से इन्कार कर दिया और पं0 नेहरू का नाम प्रधानमंत्री के लिए प्रशस्त हो गया। इसी दरम्यान लेडी माउण्टबेटन द्वारा जिन्ना के कान भरे गये कि जब एक भी कांग्रेस कमेटी द्वारा नेहरू के नाम की सिफारिश ना आने के बाद भी उनका नाम प्रधानमंत्री बनाये जाने के लिए आ रहा है,तो तुम किस हिसाब से उनसे कम हो! जिन्ना को लेडी माउण्टबेटन ने बरगलाकर प्रधानमंत्री पद लिए दौड़ लगवा दी।
बस फिर क्या था,जिन्ना ने भी प्रधानमंत्री बनने की जिद पकड़ ली और नतीजा सबकी आंखों के सामने है कि जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने के लिए हिन्दुस्तान के दो टुकड़े करके पाकिस्तान को अलग राष्ट्र बना दिया गया। तथ्यात्मक विश्लेषण से प्रकट होता है कि अंग्रेजों ने जाते-जाते हिन्दुस्तान के दो टुकड़े ही नहीं किये अपितु उस महात्मा की भी छुट्टी करा दी,जिसने उनके कहे पं0 नेहरू को भारत का प्रधानमंत्री पद सौंप दिया था। इतना ही नहीं अंग्रेज ऐसा बीज बोकर गये कि उसका खामियाजा हम हिन्दुस्तानी आजतक भुगत रहे हैं।
सोचिए यदि हिन्दुस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल होते तो जिन्ना भी मैदान में ना आते,पाकिस्तान का भी उदय ना होता और कश्मीर के लिए धारा-370 के सृजन की भी आवश्यकता नहीं पड़ती! जिस पर आज बहस के लिए भी लोग जहर उगल रहे हैं। यह सब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पं0 नेहरू को ही प्रधानमंत्री बनाये जाने की जिद के ही कारण हुआ। नरेन्द्र मोदी से पूर्व के समस्त प्रधानमंत्रियों में से एकमात्र लालबहादुर शास्त्री ही ऐसे प्रधानमंत्री थे जो यदि जिन्दा होते तो भारत की तस्वीर भी दूसरी होती। लेकिन उनकी संदेहास्पद मौत के बाद भी उनके शव का पोस्टमार्टम ना कराया जाना निश्चित रूप से जांच के दायरे में आना चाहिए था लेकिन ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया।
इसी तरह इस देश के गौरव पुरूष सुभाष चन्द्र बोस को भी गुमनामी की अंधेरी खोह में इरादतन डुबो दिया गया। जिस शक्स ने अपने देश को अंग्रेजों के चंगुल से आजादी दिलाने के लिए इण्डियन सिविल सेवा में टाप करने के बाद भी उसे ज्वाइन ना किया हो और स्वतन्त्रता के लिए इण्डियन सिविलियन आर्मी (आजाद हिन्द फौज) का गठन किया हो एवं अंग्रेजों से लोहा लेकर जंग जीती हो वह भारत को आजादी दिलाने के बाद कहीं छिप क्यों जायेगा? कहीं भाग क्यों जायेगा? जिस विमान दुघर्टना में उनके मारे जाने का भ्रम फैलाया गया है,मेरा मानना है कि दरअसल ऐसी कोई विमान र्दुघटना तब हुई ही नहीं थी।
ऐसे वीर सपूतों के हांथ में यदि भारत की सत्ता आई होती तो माना जाता कि देश स्वतन्त्र हुआ लेकिन भारत देश वास्तव में 26 मई 2014 की दोपहर तक परतन्त्र ही था। असली मायनों में स्वराज तो 26 मई की शाम को आया है, जब इस देश के प्रधानमंत्री की शपथ भाई नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने ली है। इस आजाद भारत के प्रधानमंत्री को मेरी एक छोटी सी सलाह है कि वे अबसे किसी भी मायने में सरदार वल्लभ भाई पटेल वाली गलती नहीं दोहरायेंगे। अब आप देश के लिए हैं। आपका समय, आपका शरीरआपकी आत्मा सब देश के लिए हैऔर ऐसा आप कर भी रहे हैं, फिर भी इसे आपको हमेशा अपने जहन में रखना होगा।
सरदार पटेल ने यदि महात्मा गांधी जी की बात ना मानी होती और पन्द्रह कांग्रेस कमेटियों द्वारा उनके नाम को संस्तुत किये जाने को देशहित में मानते हुए आदर-सम्मान दिया होता तो निश्चित रूप से भारत आज विश्व का लीडर एवं हरा भरा खुशहाल राष्ट्र होता! तब धारा-370 का ना तो उदय होता और ना ही इस पर किसी बहस की आवश्यकता होती! इसीलिए नरेन्द्र मोदी जी को कोई भी निर्णय इसलिए नहीं लेना है यदि ऐसा नहीं किया तो वो नाराज हो जायेगा और वैसा ना किया तो ये नाराज हो जायेगा। आपको भीष्म पितामह की तरह हस्तिनापुर से बंधे नहीं रहना हैभले ही हस्तिनापुर में अधर्म होता रहे। वे इस देश के सवा सौ करोड़ से अधिक भारतीयों के संरक्षक हैं,वे अब मात्र भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री नहीं हैंवे भारतीय जनता पार्टी के नेता तो हैं, लेकिन प्रधानमंत्री भारत के हैं और पूरा भारत किसी एक पार्टी का कतई ना तो है और ना ही हो सकता है।
इसी वेबसाइट पर कई एक ऐसे लेख विगत तीन वर्षां के दौरान लिखे गये है जब स्तम्भकार को पता ही नहीं था कि इस देश से एक राजवंश का शासन कभी समाप्त भी होगा। ऐसे लेखों के लिंक नीचे लगाये जा रहे हैं। अपने उस सलाहकार को सुपुर्द करना चाहें जो जोधा की तरह अकबर को चाहता हो ना कि बेगम रूकईया की तरह शहंशाह को। तय मानिये शहंशाह जलाल को अकबर महान बनाने में एकमात्र योगदान जोधा एवं उसके बीरबल जैसे सलाहकारों का ही था।
नरेन्द्र मोदी नाम की शक्सियत एक मिश्रित व्यक्तित्व हैसरदार पटेल,स्वामी विवेकानन्द और सुभाष चन्द्र बोस का। निश्चित रूप से सरदार पटेललौह पुरूष थेलेकिन वर्तमान परिस्थितियों में भारत को आवश्यकता है स्टील पुरूष की,जिसमें लचीलापन भी हो और दृढ़ता भी। नरेन्द्र मोदी जी के शीर्ष प्राथमिकता पर इण्टरनल और बार्डर सीक्योरिटी होनी चाहिए और इन सबसे ऊपर उनकी अपनी सीक्योरिटी! मोदी जी के दुश्मनों की तादाद 26 मई 2014 के बाद से बहुत बढ़ गई हैफिर चाहे यह अपने देश में छिपे गद्दारों से हो अथवा विदेशीयों से। यह कोई हल्के में लेने या ओवर कान्फीडेन्स में होने का प्रश्न नहीं है।
आखिरकार लाल बहादुर शास्त्री को दूर देश में ही मरा पाया गया और वीर बहादुर सिंह भी विदेश में ही मारे गये। अन्दरूनी आतंक और उससे जुड़ा आतंकवाद बहुत बड़ी समस्या है। एनआईआईबीरास्पेशल ब्यूरो जैसी संस्थायें जो सुप्तावस्था में हैंउन्हें जगाने और ताकतवर बनाने की आवश्यकता है। उनके पास सारी जानकारी रहती है, वे इसे समय-समय पर सरकार के मुखिया को उपलब्ध भी कराती हैंलेकिन जब मुखिया ही उन्हें देखकर साइड-ट्रैक करने के मूड में रहता हो तो वे क्या कर सकती है। र्दुभाग्य रहा है इस देश का कि उनकी एडवाइस और फाइलें वे देखते हैं जो स्वंय गुनहगार हैं।
मेरा निश्चित मत है कि नरेन्द्र मोदी जी सरदार पटेल की ही रेप्लिका हैं। जिस सरदार पटेल ने 543 रियासतों को भारत में मिलाकर संसद की उत्पत्ति की,उस सरदार पटेल की कश्मीर के मामले में दी गई सलाह को पं0 नेहरू ने ना मानकर कश्मीर मुद्दे को यूनाइटेड नेशन काउन्सिल को रेफर कर दिया,वही मुद्दा आजतक नहीं निपट सका है और झगड़े की जड़ बना हुआ है। यही इतिहास की सबसे बड़ी भूल है, जिसके लिए नेहरू कम सरदार पटेल ज्यादा जिम्मेदार हैं। मोदी जी ध्यान रखें जो होस्टाइल कंडीशन भारत की तथाकथित आजादी से पूर्व थीं,वे ही कन्डीशन वर्तमान में भी मौजूद हैं,क्योंकि 25 मई तक इस देश में एक राजवंश का ही शासन था।
       The problem of the State (India) is so difficult that only & only Narendra Modi alone can handle it. Satish Pradhan

मेरे जैसे और भी लाखों भारतवासी आपको भारत का स्वतंत्र पंधानमंत्री बनते देख अपार खुशी का अनुभव करते हैं और आपके दीर्घायू होने और देशहित में कठोर से कठोर निर्णय लेने की कामना करते हैं। यदि शरीर का कोई अंग कैंसर से पीड़ित है तो उसका पोषण करने के बजाय उसका काटा जाना ही श्रेष्ठ इलाज है।
आपके साथ इस देश के 282 सांसद ही नहीं हैं, पूरा देश आपके साथ है। देशहित के हर निर्णय में यह पूरा देश आपके साथ खड़ा मिलेगा। इसे ना तो जयललिता रोक सकती हैंना ही ममता अथवा कोई और। बस जिसकी जगह जहां हैउसे वहीं पहुंचा दीजिए। जिसका जो काम हैउसे वही करना चाहिए। सरकार का काम नीतियां बनानाशासन एवं प्रशासन चलाना और अपना इकबाल कायम करना है। उसका काम आटादालतेलजूतामिट्टी का तेल और पैट्रोल बेचना नहीं है। इस पैरे को यदि सरकारें जान जाएं तो किसी भी और नुस्खे की आवश्यकता नहीं है।

0 comments:

Post a Comment

Pls. if possible, mention your account address.