Monday, 24 October 2016

अलोकतांत्रिक और डेकोइट संस्थान बना, डीएवीपी

सतीश प्रधान, उपाध्यक्ष
उ0प्र0राज्य मुख्यालय मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति 
(रजिस्टर्ड अण्डर दी सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट)

           लखनऊ-भारत में सामाजिक परिवर्तन लाने और आर्थिक ग्रोथ को बढ़ाने के उद्देश्य की पूर्ति के लिए मल्टी मीडिया एडवरटाइजिंग एजेंसी के रूप में खड़े किये गये डीएवीपी (द्र्श्य प्रचार एव विज्ञापन निदेशालय) को समझना अब अपरिहार्य हो गया है। डीएवीपी एक सर्विस एजेंसी है, जिसका कार्य विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालय की ओर से उक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार द्वारा ग्रासरूट तक पहुंचाना है, लेकिन यह तो ग्रासरूट तक पहुचने के बजाय पंचसितारा होटल तक पहुच गया है। डीएवीपी की खोज वल्र्ड वॉर द्वितीय से करते हैं। द्वितीय विव युद्ध खत्म होने के बाद तत्कालीन सरकार ने एक मुख्य मीडिया सलाहकार (चीफ प्रेस एडवाइजर) की नियुक्ति करके, एडवरटाइजिंग का दायित्व सौंपा।
       जून 1941 में उसी चीफ प्रेस एडवाइजर केअधीन एक एडवरटाइजिंग कनसलटेन्ट की नियुक्ति की गयी। डीएवीपी की भूमिका यहीं से बननी शुरू हो गयी। 01 मार्च 1942 को एडवरटाइजिंग कनसलटेन्ट को कार्य करने के लिए एक कक्ष सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में ही दे दिया गया। 01 अक्टूबर 1955 को उस एडवरटाइजिंग कनसलटेन्ट के कार्यालय का नाम डीएवीपी कर दिया गया। इसके बाद 04 अप्रैल 1959 को उसे एक हेड ऑफ डिपार्टमेन्ट की मान्यता देते हुए, भारत सरकार ने उस संस्था को वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार भी हस्तांतरित कर दिये। 
              भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के कितने रिश्तेदार, नातेदार, अक्षम ,अपंग एवं नकारे उस संस्थान में नियुक्ति पाये होंगे इसका अंदाजा आप नही लगा सकते। बस तभी से डीएवीपी के कर्मचारी नशे में आ गये हैं और विज्ञापन जारी करने के नाम पर उस मीडिया का खून चूसने लगे हैं, जो समाज की सेवा में लगा हुआ है। 
              वर्तमान में हालात यहाँ तक पहुच गये हैं कि अधिकारी कहे जाने वाले बाबू स्तर के ए,एम,ई (असिस्टेन्ट मीडिया एग्जीक्युटिव) उन समाचार पत्र प्रकाशकों के साथ बदतमीजी करते हैं जो उन जैसे ए,एम,ई को नौकरी पर रखलें। ऐसा ये इसलिए करते हैं, क्योंकि ऐसे प्रकाशक, भूले -भटके ही उनके पास पहुँचते हैं और उनको ये पता नही होता कि ये ए,एम,ई केवल एजेंटों (दलालों) के माध्यम से आने वाले प्रकाशकों/प्रतिनिधियों से ही ठीक से बात करते है, बाकी के लिए उनके पास ना तो वक्त होता है, ना ही तमीज। 
            ये केवल ऐसे प्रकाशको के ही साथ रहते है जो विज्ञापन का फिफ्टी प्रतिशत उन्हें सौपने के साथ ही उनकी शामें भी रंगीन बनाये। ये ऐसे समाचार पत्र वाले है, जिनको ना तो लिखना आता है ना पढ़ना। ये उस कैटेगरी के प्रेस वाले हैं जो आपके कपड़ों पर प्रेस करते हैं। हालात यहां तक पहुच गए है कि कम्पोजीटर और मशीनमैन के साथ-साथ अण्डा बेचने वाले और समाचार-पत्र के हॉकर भी अखबार निकालने लगे हैं और मालिक एवं प्रकाशक हो गये हैं। ऐसे ही तथाकथित प्रकाशक औैर मालिक इनके साॅफ्ट टारगेट हैं।
            आपको आश्चर्य होगा कि जिस देश का प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्तित्व वाला शक्स हो, जिसके दरवाजे इस संचारक्रान्ति के युग में आम जनता के लिए खुले हुए हों, उन्हीं के सूचना मंत्रालय के अधीन डीएवीपी के मुखिया ने अपनी ईमेल आई0डी0 अपने प्राइवेट सेक्रेटरी के नाम से बनवाई हुई है, जो है (psdg.davp@nic.in) लेकिन जिसपर भेजे जाने वाले सारे ईमेल बाउन्स हो जाते हों, तो ऐसे डी,जी, को क्या एक मिनट भी उस पद पर बनाये रखे जाने का कोई औचित्य है?
Contact List of DAVP without email

          जबकि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के पास अपनी बात उनके ट्वीटर एकाउन्ट, फेसबुक एकाउन्ट, इन्स्टाग्राम, पिनट्रेस्ट अथवा ऑफिसियल से लेकर प्राईवेट वेबसाइट तक पर पहुचाने के लिए आम जनता को आसानी से सुलभ है, जबकि डीएवीपी जो कि मीडिया संस्थानों के लिए ही बना है, उसके हाल ये हैं। आप ना तो डीजी का टवीटर एकाउन्ट जान सकते हैं, ना ही फेसबुक एकाउन्ट ना ही मोबाइल नं0। डी0जी0 हैं अथवा लोकतंत्रिक देश में एक तानाशाह। डीएवीपी एकदम बद्त्तर और डेकोइट संस्थान बन गया है। 
     इस महानिदेशालय में बस दो ईमेल mediarate@gmail.com और mediarate1@gmail.com..ही टनाटन काम करते हैं। जिसे डीएवीपी के अधिकारियो ने नियमविरुद्ध तरीके से बनाया हुआ है। इसे gmail.com  पर किस अधिकारी ने स्थापित करने की अनुमति दी और किस ऑफिस मेमो के तहत ? इसकी गहनता से जांच होनी चाहिए।
Contact List of I&B Ministry with Email ID's and Address of the Officials
               यदि सरकारी कार्य किया जा रहा है तो उसे @nic.in  अथवा @gov.in  पर बना होना चाहिए। डीएवीपी बहुत बड़ा भ्रष्टाचार इस ईमेल के माध्यम से कर रहा है जिसमें कपतमबजवत (डत्ब्) का उल्लेख रहता है। gmail.com पर बने ये पते धन वसूली के काम आ रहे हैं। इन ईमेल पर म्उचंदमसउमदज के व्इरमबजपवद डालकर प्रकाशकों को बुलाया जाता है, वह भी ...... और घिसे-पिटे ऑबजेक्शन लगाकर। 
                  एम्पेनलमेंट के लिए फाइल लगी फरवरी 2016 में उसका परिणाम सितम्बर 16 में निकाला गया। एम्पेनलमेंट, एप्रूव होने के तुरन्त बाद mediarate@gmail.com से दो माह के अखबार पुनः मांगे जाते हैं। ये कौन सा एप्रूवल हुआ? जब कमी थी तो एप्रूवल क्यों हुआ? और नहीं है तो डायरेक्टर (एम0आर0सी0) द्वारा (mediarate@gmail.com) से अखबार की  प्रतियां क्यों मांगी जा रही हैं?
                @gmail.com पर बने ये पते धन वसूली के काम आ रहे हैं। इन ईमेल पर एम्पेनलमेन्ट के आॅब्जेक्शन डालकर प्रकाशकों को बुलाया जाता है, वह भी प्रोटोटाइप और घिसे-पिटे आॅब्जेक्शन लगाकर। प्रकाशकों को परेशान करने और एकदम चूस लेने की व्यवस्था डीएवीपी ने की हुई है। इतना बड़ा खेल चल रहा है, और डीएवीपी के निदेशक एवं महानिदेशक को पता नहीं हो, ऐसा कैसे समझा जा सकता है। यदि डीजी, डीएवीपी पाक साफ हैं तो सी0बी0आई0 जांच की संस्तुति सूचना मंत्रालय से करें, यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो निश्चित रूप से वे भी इस खेल में सम्मलित हैं।
भरपूर पैसा कमाने के लिए डीएवीपी ने बिना किसी एक्ट-रूल के फर्जी प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति-2016 को लागू कर दिया है, जिसके माध्यम से प्वाइन्ट सिस्टम लागू करते हुए विज्ञापनों को प्रीमियम दरों पर जारी किये जाने की व्यवस्था की ली है। यह नया तरीका बेशक बड़े (कार्पोरेट मीडिया घरानों) ग्रुप की मिलीभगत का ही परिणाम है।
क्या कर्मचारियों और अधिकारियों का वेतन सिस्टम एक सा है? क्या दोनों को एक सी सुविधायें सरकार देती है? नहीं। फिर किस तरह से लघु, मध्यम, एवं बड़े समाचार-पत्रों के लिए एक सी नीति रखी गई? जब डीएवीपी के बजट में लघु, मध्यम एवं बड़े ग्रुप के लिए अलग-अलग बंटवारा किया गया है तो उनके लिए बनाई गई पालिसी भी अलग-अलग होनी चाहिए।
तीनों का अलग बजट और अलग-अलग, नियम होने चाहिए। बड़े ग्रुप को प्रिंटिग मशीन लगाना उसकी मजबूरी है, जबकि यही शर्त लघु दर्जे के अखबार वाले के लिए जबरिया थोपी गई शर्तें हैं, जिनका कोई औचित्य नहीं हैं। यदि वह भी मशीन लगाने की हैसियत में हो तो वह लघु वर्ग में क्यों रहेगा। समाचार ऐजेन्सी की सेवा लेना बड़े ग्रुप की मजबूरी है, जबकि लघु ग्रुप वाले के तो परिवार के ही तीन-चार लोग अखबार के काम में लगे रहते हैं। क्यों लें वे सड़ी-गली ऐजेन्सियों की सेवा, जिनके यहाॅं मात्र तीन हजार पर रखे गये टाइपिस्ट खबरें भेजते हैं।
लघु, मध्यम और बड़े ग्रुप का वर्गीकरण भी डीएवीपी ने जायज तरीके से नहीं किया है। ये इस प्रकार से होना चाहिए। लघु ग्रुप में 0001 से लेकर 15,000 तक। मध्यम ग्रुप में 15,001 से लेकर 50,000 तक एवं बड़े ग्रुप मे 50,001 से लेकर अधिकतम जो भी हो।
                   समाचार-पत्र अपनी प्रेस में छप रहे हैं अथवा काॅन्ट्रैक्ट पर दूसरी प्रेस में इससे डीएवीपी का क्या लेना देना? समाचार-पत्र अपने संवाददाताओं तथा फ्री की न्यूज ऐजेन्सी द्वारा निकाले जा रहे हैं अथवा पेड न्यूज ऐजेन्सी से, इससे भी डीएवीपी का क्या मतलब? समाचार-पत्रों ने प्रेस काउन्सिल की लेवी दी या नहीं दी इससे भी डीएवीपी का क्या मतलब? क्या डीएवीपी ने सबकी दुकान चलाने का ठेका लिया हुआ है। या वो माफिया के रूप में उभरना चाह रहा है। 
यदि हम हांथ से लिखकर फोटोकाॅपी कराकर अखबार निकालें तो क्या डीएवीपी रोक सकता है? पैम्फलेट छापकर जब अंग्रेज भारत से भगाये जा सकते हैं तो फिर ये तो डीएवीपी में बैठे काले अंग्रेज हैं, जिनके भ्रष्टाचार/कारनामों की एक हजार पैम्फलेट छापकर इनकी कालोनियों में वितरित कर दी जाये तो इसके लिए किस ऐम्पेनेलमेन्ट की आवश्यकता है। इसके लिए भी क्या अपनी प्रेस होना जरूरी है। या इसके लिए किसी ऐजेन्सी की सेवा जरूरी है। किसी की भी आवश्यकता नहीं है।
सूचना सचिव, श्री अजय मिततल को डीएवीपी द्वारा अवैध कमाई के लिए चलाये जा रहे ईमेल (mediarate@gmail.com) और (mediarate1@gmail.com) की पूरी रिर्पाेट google के CEO लैरी पेज से मंगानी चाहिए कि ये कब बना, किसने बनाया और इसके इनबाॅक्स, सेन्ट मेल, स्पैम, ट्रैस, ड्राफ्ट आदि में क्या-क्या है। इसी से डीएवीपी में व्याप्त भ्रष्टाचार का खुलासा हो जायेगा। मेरे हिसाब से इसे वर्षों से एक ही पद 
पर बैठे मीडिया एग्जीक्यूटिव बी0पी0 मीना द्वारा संचालित किया जा रहा है। इसी के साथ बी0पी0 मीना के मोबाइल नं0 की भी जांच होनी चाहिए।

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