Thursday, 27 October 2016

डीएवीपी को तोड़ दिया जाये, काम विदेशी ऐजेन्सी को दिया जाये

 
DAVP, a unit of I&B Ministry, havily destroying
 the public image of Prime Minister of India in the Media
        
        समाचार-पत्रों  के कार्पोरेट मीडिया घरानों के प्रकाशक, (ए0बी0सी0) आडिट ब्यूरो आॅफ सर्कुलेशन, रजिस्ट्रार न्यूजपेपर्स आॅफ इण्डिया (आर0एन0आई), प्रेस काउन्सिल, प्राइवेट न्यूज ऐजेन्सियां और डीएवीपी के कमीशन खोर अधिकारियों का खेल है, प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति-2016, बगैर एक्ट, बगैर किसी रूल, बिना किसी नोटिफिकेशन के जारी की गई प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति-2016, जिसमें मीडिया के बारे में तो एक शब्द भी नहीं है, सिवाय विज्ञापन व्यवस्था को किस तरह से ऐसा बनाया जाये कि प्रतिमाह मोटी कमाई डीएवीपी के अधिकारी हड़प लें, केवल इसी का तसकरा है। देश का मीडिया जाये ऐसी-की-तैैसी में। वो परेशान होता है तो करे भाजपा और उसके नरेन्द्र मोदी को बदनाम।
Act overruled, unlawfull Print Media Advt. Policy-2016,
 framed in the regime of  the above  Minister.
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  ये फर्जी तथाकथित नीति, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने के लिए कांग्रेसी  शासन में नियुक्त डीएवीपी के महानिदेशक के0 गणेशन एवं उनके चेले आर0सी0जोशी की देन है, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है, जो न्यायालय में एक मिनट भी नहीं ठहर सकती और जिसे जज महोदय एक झटके में उठाकर फेंकने के साथ ही इन अधिकारियों के खिलाफ स्ट्रक्चर पास कर सकते हैं, क्योंकि इस ड्राफ्ट को तो कैबीनेट तक में नहीं रखा गया है, और मनमानापन कर रहे हैं।
  ये देश ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की मनमर्जी एवं मनमाने तरीके से नहीं चलाया जा सकता? डीएवीपी के तो अभी अपने ही कार्यालय पूरे देश में नहीं हैं। जिन कार्यालयों के दम पर डीएवीपी अपनी वर्किंग करने की कोशिश कर रहा है, वे पी0आई0बी0 के कार्यालय हैं, पी0आई0बी0 अलग महानिदेशालय है, और उसके अलग महानिदेशक हैं। पी0आई0बी0 के अधिकारी और कर्मचारी इतने खाली हैं कि उनके पास काम नहीं है, और वे डीएवीपी का काम करने के लिए खाली हैं तो उनके कार्यालय को खत्म करके पूरी तौर पर डीएवीपी को दे देना चाहिये।
  एकदम फर्जी एवं बकवास नीति-2016 के माध्यम से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की छवि को मीडिया विरोधी घोषित करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है, वो कतई ठीक नहीं है। इस नीति को हवा दी है, पूर्व सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने, वह भी के0 गणेशन के निर्देशन में। एक विज्ञापन बांटने वाली ऐजेन्सी डीएवीपी को मीडिया अच्छा नहीं लग रहा, क्योंकि  उसके अधिकारियों का करेक्टर लायजनिंग वाला है। उसे तो अपनी ही तरह के दलाल चाहिए। इसीलिए उसका सारा जोर ऐजेन्सियों पर ही रहता है, फिर चाहे ये विज्ञापन की हों अथवा न्यूज की।
  इस बनाई गई क्या पैदा की गई फर्जी नीति में कहीं भी न्यूज कनटेन्ट की ना तो कोई बात है, और ना ही कोई प्वाइंट। पी0आई0बी0 की खबरों, लेख और फोटोज् को छापने के लिए कुछ भी नहीं कहा गया है। कोई अखबार कितने प्रतिशत विज्ञापन छापेगा और कितना परसेन्ट उसमें न्यूज कनटेन्ट होगा, इसका भी जिक्र नहीं है। क्योंकि अखबार किसे कहते हैं, इसका तो डीएवीपी के अधिकारियों का ज्ञान ही नहीं है। बस अपनी चौधराहट दिखाने के लिए डीएवीपी वसूली ऐजेन्ट की भूमिका में कार्य कर रहा है।
  प्रेस काउन्सिल की लेवी की वसूली उसने एक झटके में करा दी। सारा अधिकार प्रेस काउन्सिल के पास होने के बाद भी वह अपनी लेवी नहीं ले पा रहा था, लेकिन डीएवीपी के एक फर्जी और अन्यायिक आदेश/नीति ने करोड़ों की वसूली करा दी। डीएवीपी ठीक उसी रोल में कार्य कर रहा है, जैसे एक माफिया/ डाॅन करता है। जो अरबपति/व्यवसायी अपने यहाॅं कार्यरत स्टाफ को उनकी उचित सेलरी तक नहीं देता, माफिया/डान की एक फोन काॅल पर करोड़ों हग ही नहीं देता है बल्कि उसके दरवाजे पर पहुंचकर अपनी और अपने परिवार के प्राणों की भीख भी मांगता है। अपना मूंह बांधकर नगद/कैश अपनी गाड़ी में रखकर अकेला डाॅन के बताये स्थान पर पहुंचाता है, सुरक्षित लौट आये तो बहुत बड़ी बात।
  छोटे एवं मझोले अखबारों के लिए डीएवीपी ऐसा ही माफिया डाॅन बना हुआ है। एक बात और है कि उस डाॅन के पीछे वहां का सरकारी तंत्र उसके साथ होता है, तभी वह ऐसा कर पाता है, वरना तो उ0प्र0 में भी श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे माफिया डाॅन का सरकार के मुखिया ने ही एनकाउन्टर करा दिया। उसी का नहीं सारे माफियाओं /गुण्डों का यही हश्र होता है, बशर्तेे सरकार में बैठे किसी ईमानदार नेता अथवा अधिकारी को समझ में आ जाये कि इसने बहुत अत्याचार कर लिया अब बस। बस समझिये जिस दिन कायदे के ईमानदार और देशभक्त सचिव अथवा कैबीनेट सचिव को समझ में आ गया कि डीएवीपी की तो आवश्यकता ही नहीं, ये काम तो अंर्तराष्ट्रीय   स्तर की किसी संस्था से भी कराया जा सकता है, तो उसी पन्द्रह प्रतिशत के कमीशन में ही वह ऐजेन्सी डीएवीपी से अच्छा कार्य कर देगी, जिसे डीएवीपी समाचार-पत्रों को जारी किये गये विज्ञापन में से काट लेता है। वैसे डीएवीपी जैसे सफेद हांथी की इस गरीब देश में  कोई आवश्यकता नहीं है। ये संस्थान केवल भ्रष्टाचार करने के लिए बना हेै।
  ए0एम0ई0 और एम0ई0, उप-निदेशक, निदेशक, अति0 महानिदेशक एवं महानिदेशक के पदों पर बैठे अधिकारियों के पाप का घड़ा अब भर गया है, जिसका फूटना अत्यंत आवश्यक है। कितने अधिकारी सी0बी0आई0 की गिरफ्त में आयेंगे, कितने सोसाइड करेंगे, इनकी गिनती किया जाना ही शेष है। देश के छोटे एवं मझोले समाचार-पत्रों को समाप्त करने के उद्देश्य से बड़े कहे जाने वाले कार्पाेरेट मीडिया घरानों के नेक्सस ने ऐसी नीति को बनाने में अपनी महत्वपूंर्ण भूमिका निभाई है। अरबों के विज्ञापन बटोरने के बाद भी उसका पेट नहीं भर रहा।
  अपने यहाॅं कार्यरत पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए उसके पास पैसा नहीं है, लेकिन नर्तकी नचाने, इवेन्ट आयोजित करने, बालीवुड में प्रोग्राम आयोजित करने और फैशन शो आयोजित करने के लिए धन की कमी नहीं है। उसने अपने संस्थान से सम्पादकीय लोगों को किनारे कर दिया है। प्रबन्ध सम्पादक और सम्पादक पद पर मालिक बैठ गया है अथवा विज्ञापन का कार्य करने वाले को बिठाकर हर तरह से सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापन लूटने में लगा है। जिसके लिए वह कमीशन और लड़कियों का भी इस्तेमाल करता है। 
  वरना तो हालात ये हैं कि अपने को अंर्तराष्ट्रीय  स्तर का घोषित करने वाला समाचार-पत्र जिलों-जिलों से निकलता है, डाक संस्करण बताकर, जबकि प्रेस एण्ड बुक्स रजिस्ट्रेशन एक्ट में ऐसे किसी संस्करण का कोई स्थान/औचित्य नहीं है। जिलों-जिलों से संस्करण निकाल कर यह केवल छोटे एवं मझोले समाचार-पत्रों का हक ही नहीं मार रहा है, बल्कि उनके हक पर डांका डाल रहा है। ये है इथिक्स इन तथाकथित बड़े कहे जाने वाले अखबारों की। ऐसे जिलों-जिलों से छपने वाले अखबार को कैसे अंर्तराष्ट्रीय स्तर का कहा जा सकता है, आप ही समझिये। जो व्यक्ति पार्षद हो और कहे कि मैं अंर्तराष्ट्रीय स्तर का हूं तो कौन कैसे समझेगा, ये आप ही समझिए।
  खैर! ऐसे अंर्तराष्ट्रीय स्तर के समाचार-पत्र के सम्पादक, प्रबन्ध सम्पादक कम मालिकान की उसकी कोठी में घुसकर एक डीआईजी ने उसके घर की महिलाओं की जो बेइज्जती की कि क्या कहा जाये। यहाॅं तक कि महिलाओं की ......तक फाड़ डाली, लेकिन ऐसे अंर्तराष्ट्रीय अखबार का प्रबन्धतंत्र चूं तक नहीं कर पाया। एक काॅलम की खबर अपने अखबार में नहीं छाप पाया, बल्कि उस दिन तो सारे नियम कायदे तोड़ते हुए उसके अखबार में 80 प्रतिशन विज्ञापन छपा। इज्जत गई तेल लेने। इससे तो वे कमजोर और दीन-हीन महिलाएं बेहतर हैं जो अपने साथ घटी शर्मनाक घटनाओं पर एफ0आई0आर0 तो दर्ज कराती हैं।
  बहरहाल इनकी मजबूरी भी ही है, एक्शन ना लेने की, क्योंकि चोरी की प्रिन्टिंग मशीन इनके यहाॅं लगी है, एक फायनान्स कम्पनी की कई एकड़ जमीन फर्जी कागजातों पर इन्होंने कब्जाई हुई है। चीनी, वनस्पति का धंधा ये करते हैं। जाने दीजिए कुछ चीजें दबा भी देता हूॅं। वरना एक रामनाथ गोयनका जी भी थे और उनका था एक अखबार। जिसने इंदिरा गाॅंधी जैसी डिक्टेटर की हेकड़ी मिट्टी में मिला दी थी। उन्हीं की कलम के दम से खिन्न होकर इन्दिरा ने इमरजेन्सी लगाई और उसके बाद जेल भी गईं, लेकिन बहुत बड़ा व्यापार चलाने के बाद भी स्व0 श्री रामनाथ गोयनका का बाल भी टेढा नहीं कर पाई इन्दिरा गाॅंधी।
  दरअसल कलम की मार का डीएवीपी को अन्दाजा नहीं है, वो कमीशन की चकाचैंध में अन्धा होकर इतरा रहा है, उसे केवल इतना पता है कि जो ज्यादा बिकता है, प्रचार वहाॅं से मिलता है। प्रसार तो रेड लाइट एरिया का भी ज्यादा होता है। पोर्न स्टार के ग्राहक और लाइक करने वाले करोड़ों हैं, तो डीएवीपी को सरकार के प्रचार के लिए ऐसी ही जगहों पर जाना चाहिए। क्या जरूरत प्रिन्ट मीडिया में विज्ञापन देने की। उसे याद रखना चाहिए कि भारत एक कल्याणकारी राज्य है। यहाॅं सारी चीजें मात्र नफा-नुकसान के लिए ही नहीं रची जा सकतीं।
  विज्ञापन व्यवस्था को स्ट्रीम लाइन करने के नाम पर डीएवीपी ने नये धन्धे की ही शुरूआत कर दी। उसने समाचार-पत्रों के पेज को भी प्रीमियम पर विज्ञापन देने का नया धन्धा शुरू कर दिया है।
The only work of DAVP, to collect the money, either form
 Publication, Drama, Nautanki or from release  Advts.
डीएवीपी के अधिकारियों ने इतना भ्रष्टाचार कर लिया है कि या तो एक-एक अधिकारी की आय से अधिक सम्पत्ति की जांच कर ली जाये एवं इस विभाग को खत्म करते हुए इसका कार्य किसी अन्र्तराष्ट्रीय स्तर की संस्था को अधिकतम पन्द्रह प्रतिशत के कमीशन की दर पर दे दिया जाये। इससे भ्रष्टाचार भी खत्म हो जायेगा और सरकार को भी डीएवीपी केएस्टेब्लिशमेंट पर होने वाले करोड़ों रूपये की बचत होगी अलग से। वैसे भी हमें अमेरिका की नीति का पालन करते हुए अपने यहाॅं ज्यादातर चीजें प्राइवेट सेक्टर में देनी चाहिए। फिर इसकी शुरूआत डीएवीपी से ही क्यों नहीं  
सतीश  प्रधान, उपाध्यक्ष
उ0प्र0राज्यमुख्यालय मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति (रजि0 अण्डर दी सो0 रजि0 एक्ट)

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