Wednesday, 5 October 2016

भारत के सूचना मंत्री द्वारा मीडिया को रेगुलेट करने की साजिश

सती प्रधान ( उपाध्यक्ष- उ0प्र0 राज्य मुख्यालय मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति)


लखनऊ।  भारत में मीडिया को रेगूलेट करने की साजिश एक ऐसी नीति बनाकर की जा रही है, जो किसी भी तरह का आफिशियल डाक्यूमेन्ट नहीं है। जिस पर ना तो किसी अधिकारी के हस्ताक्षर हैं और ना ही उसे किसी एक्ट अथवा नियमावली के तहत बनाया गया है। जिस प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति-2016 को लागू करने के लिए रोजाना डीएवीपी द्वारा एडवाइजरी जारी की जाती है, उसका भी कोई वजूद नहीं है। एक सनक के तहत रोजाना ही नई-नई एडवाइजरी जारी करके मीडिया के एक वर्ग को पेरशान किया जा रहा है, तथा डीएवीपी ने ये सिद्ध कर दिया है कि वहॉं के अधिकारी डिप्रेशन के शिकार हैं।

इसीलिए इसके विरोध में उत्तर प्रदेश की राज्य मुख्यालय मान्यताप्राप्त संवाददाता समिति ने अपने समस्त साथियों, पत्रकार बन्धुओं एवं उनके पोषक समाचार-पत्र मालिकान और प्रकाशकों के हित में फैसला लिया है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा किये जा रहे अन्याय एवं पक्षपातपूंर्ण रवैये के तहत प्रतिपादित की गई प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति- 2016 का विरोध करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री को शिकायत एवं सुझाव प्रेषित किया जाये तथा पन्द्रह दिनों के अन्दर यदि संविधान के आर्टिकल-14 में प्रदत्त अधिकारों के हनन को  सूचना एवं प्रसारण मंत्री द्वारा रोका नहीं जाता तथा उक्त असांविधिक नीति-2016 को रद्द नहीं किया जाता है तो माननीय उच्चतम न्यायालय में रिट दाखिल की जाये, क्योंकि प्रिन्ट मीडिया को स्ट्रीम लाइन करने के नाम पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जिस प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति-2016 (नान स्टेच्यूटरी/असांविधिक दस्तावेज) का निर्माण किया है, वह लघु एवं मध्यम समाचार-पत्र प्रकाशकों एवं उसमें कार्य करने वाले पत्रकारों एवं गैर पत्रकारों को कुचलने की साजिश है। इसी के साथ इस रेगूलेटरी एक्शन को नीति का नाम दिया जा रहा है, जिसका आधार ना तो कोई एक्ट है, ना ही कोई नियमावली। यहॉं तक की इस पालिसी पर ये भी अंकित नहीं है कि यह भारत सरकार के किस नोटिफिकेशन के तहत जारी की गई है और ना ही इस पर कोई पत्र संख्या अथवा दिनांक पडा है।

यदि वास्तव में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को मीडिया को स्ट्रीम लाइन करना ही है तो उसके लिए एक्ट लाने की आवश्यकता है, जिसके तहत नियमावली बनाई जाये, फिर उसके तहत मीडिया को रेगूलेट किया जाय। असांविधिक तरीके से मीडिया के केवल लघु एवं मध्यम स्तर के समाचार पत्रों को ही रेगूलेट करना किसी भी प्रकार से जायज एवं न्यायिक नहीं है। यह एक षड़यन्त्र है, जिसके द्वारा देखा जा रहा है कि मंत्रालय कितना सफल होता है, अपनी करनी पर। क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय बतायेगा कि इस नीति के ड्राफ्ट को प्रधानमंत्री की कैबीनेट में रखा गया था, यदि हॉ तो किस दिनांक और किस बैठक में इसका हवाला तो सूचना एवं प्रसारण मंत्री को देना ही होगा, अन्यथा ये तो एक प्रकार से भारत के प्रधानमंत्री को भी साजिश में लपेटेने का मामला हुआ।

यदि किसी निदेशालय के दो अधिकारी और शासन में बैठा सचिव स्तर का एक अधिकारी किसी ड्राफ्ट को नीति की शक्ल देकर उसके बल पर सबकुछ तहस-नहस कर देने की मंशा रखता हो तो उसकी मंशा कैसे कामयाब हो सकती है।  यदि एक नीति बनाकर पूरे देश को चलाया जा सकता है, तो फिर लोकसभा, राज्य सभा, विधान सभा, विधान परिषद, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के साथ ही जिला अदालतों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक की आवश्यकता ही क्या है। फिर तो किसी भी विभाग का कोई भी सनकी अधिकारी कोई भी आदेश जारी कर दे और न्यायालय भी उसे बगैर किसी एक्ट-रूल के प्राविधान को सांविधिक मान ले, तब तो हो गया बंटाधार इस देश का। ऐसी स्थिति तो देश में तबाही ही मचा देगी, जिसकी भरपाई ना तो नरेन्द्र मोदी जी की सत्ता कर पायेगी, ना ही कोई और।

डीएवीपी का गठन मीडिया का स्लाटर करने के लिए नहीं किया गया है, और वह भी मात्र लघु एवं मध्यम समाचार-पत्र/पत्रिकाओं का। बड़े ग्रुप (कार्पोरेट मीडिया घरानों) के संस्करणों को मलाई चटाने और उस मलाई में से स्वंय को भी हिस्सा मिलता रहे, इसकी भरपूर व्यवस्था डीएवीपी ने इसी नीति में बड़ी चतुराई से कर ली है। इसीलिए स्वामी/प्रकाशकों के हितार्थ वर्किंग जर्नलिस्ट और समाचार-पत्र संस्थानों में कार्यरत गैर पत्रकारों के कल्याणार्थ इस समिति ने संघर्श का फैसला लिया है। आखिरकार जब समाचार-पत्र संगठन ही नहीं रहेंगे तो हम कहॉं रहेंगे़? हमें अपने मालिकों के साथ स्वंय भी जिन्दा रहना है। इस फर्जी नीति से मरता क्या ना करता वाली स्थिति पैदा हो रही है, जिसके लिए पूंर्ण रूप से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के साथ डीएवीपी के के0 गणेशन और आर0सी0 जोशी हीे होंगे। संभवतः जोशी जी कितने ही बड़े जोशी हों, अपना भविष्यफल बांचना भूल गये हैं।



डीएवीपी की नीति के विरोध में कुछ पत्रकार साथी न्यायालय भी गये, लेकिन वे डीएवीपी की तरफ से पेश वकील की इस दलील ( कि प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन नीति को स्ट्रीम लाइन करने के लिए ऐसा किया जा रहा है) का माकूल एवं तर्कसंगत जवाब न्यायालय को नहीं दे पाये कि ये नीति मात्र विज्ञापन वितरण को स्ट्रीम लाइन करने के लिए नहीं बनाई गई है, अपितु लघु एवं मध्यम समाचार-पत्रों के स्वामियों को, जो कि कमजोर एवं वास्तव में व्यवसायी/उघोगपति नहीं हैं, दरकिनार करने के लिए बनाई गई है। इस नीति ने तो कार्पोरेट मीडिया घरानों के लिए रेड कारपेट का काम किया है।

अभीतक डीएवीपी की विज्ञापन वितरण व्यवस्था स्ट्रीम लाइन नहीं थी तो इसके लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं? डीएवीपी के अधिकारियों द्वारा समाचार-पत्रों के ऐम्पेनलमैन्ट के लिए ली जा रही प्रति समाचार-पत्र दो-दो लाख की रिश्वत गणेशन से लेकर मंत्रालय के किस अधिकारी और मंत्री तक पहुंची रही है? ऐसे-ऐसे समाचार-पत्रों को फिफ्टी-फिफ्टी कमीशन की दर पर अब भी रोजाना विज्ञापन जारी किये जा रहे हैं, जिनकी प्रिन्टिंग प्रेस का ही असतित्व ही नहीं है। डीएवीपी के ज्यादातर अधिकारियों के बेटे, बेटियों, मॉं, भाई, बाप, बहन के नाम पर समाचार-पत्रों का प्रकाशन किया जा रहा है तथा लाखों रूपये प्रतिमाह बटोरे जा रहे हैं।

क्या सबसे पहले डीएवीपी को स्ट्रीम लाइन करने की जरूरत नहीं है। डीएवीपी के कितने अधिकारियों ने अपनी आय की घोषणा की हुई है? क्या सी0बी0आई0 अथवा सतर्कता आयोग द्वारा उन अधिकारियों की आय की जॉंच नहीं होनी चाहिए जो वर्षों से विज्ञापन जारी किये जाने वाली सीट पर प्रतिमाह मोटी कमाई श्री के0 गणेशन को पहुुंचा रहे हैं। डीएवीपी का बाबू एस0यू0 व्हीकल से आता-जाता है, करोड़ों के उसके पास फ्लैट हैं, और जिसकी प्रत्येक शाम पंचसितारा होटल में ऐसे ही स्वामी/प्रकाशकों के साथ गुजरती है, जो उनकी शाम रंगीन बनवाते हैं।



डीएवीपी के हालात ये हैं कि वह दलालों का अड्डा बना हुआ है। फिफ्टी- फिफ्टी की तर्ज पर विज्ञापन दिलाने वाली प्रा0 लि0 कम्पनियां तक गठित हैं, जो यहॉं के विज्ञापन जारी करने वाले अधिकारियों को पैसे से लेकर लड़कियां तक सप्लाई करके व्यवसाय कर रही हैं। ऐसी व्यवस्था अपनी ऑंखों से आप स्वंय डीएवीपी में अन्दर घुसकर देख सकते हैं। जो इसके विरोध में कुछ करने-कहने की कोशिश करता है, उससे कहा जाता है कि चले हो भगत सिंह बनने! अरे जैसे उसे फांसी पर लटका दिया गया, वैसे तुम भी लटका दिये जाओगे, अरे जैसी व्यवस्था चल रही है, उसी में अपने को एडजस्ट करो, और मजे करो। आपका अपना परिवार है, कौन इस देश में सुधार करने आया है, जो कुर्सी पर बैठा वही लूट मे लग गया। तुम भी कोई पार्टी पकड़ लो और डीएवीपी से रोजाना विज्ञापन पाओ। ये नरेन्द्र मोदी का देश है, यहॉं अडानी और अम्बानी जैसे ही जिन्दा रहेंगे, हम-तुम जैसे नहीं। ये कहना है, डीएवीपी में विज्ञापन जारी करने वाले एक मीडिया एग्जीक्यूटिव का।

डीएवीपी के ऐसे अधिकारी देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करते हुए अपने एकशन/नीति को जस्टीफाई करते हुए करोड़ों कमा रहे हैं। के0 गणेशन इस सरकार के आने से पूर्व से ही महानिदेशक की कुर्सी पर बैठे हैं, अतिरिक्त महानिदेशक श्री रेड्डी और शर्मा भी तब ही से हैं और निदेशक श्री जोशी को श्री गणेशन, महानिदेशक नियुक्त होने के बाद लेकर आये हैं। डीएवीपी के भ्रष्टाचार में इनके आने के बाद से चार गुना इजाफा हुआ है। के0 गणेशन तो किसी छोटे एवं मध्यम समाचार-पत्र के प्रकाशक से मिलना तो दूर टेलीफोन पर भी वार्ता नहीं करते। उनके निजी सचिव, बमुश्किल यदि फोन उठा लें तो पहले पूछेंगे कि आपकी समस्या क्या है, यदि आपने कहा कि समस्या कोई नहीं, मुझे उनसे मिलना है, तो कहेंगे कि जब समस्या नही तो मिलकर उनका समय क्यों बर्बाद करेंगे। अतः जो समस्या है बताइये, और आपने यदि समस्या बताई तो निदान सिर्फ यही है कि वह किसी दूसरे अधिकारी से मिलने को कह देंगे। अब बताईये मुझे शिकायत करनी है कि आपके यहॉं विज्ञापन की सीट पर बैठा अमुक अधिकारी कहता है कि विज्ञापन चाहिए तो दलाल को पकड़िये, तो इसे कौन सुनेगा। 

समिति का कहना है कि मीडिया को स्ट्रीम लाइन करने से पहले डीएवीपी के महानिदेशक, श्री के0 गणेशन, अति0 महानिदेशक, श्री रेड्डी एवं श्री शर्मा, निदेशक श्री आर0सी0 जोशी, की आय से अधिक सम्पत्ति की जांच की जाये तथा विज्ञापन व्यवस्था से जुड़े प्रत्येक अधिकारी/कर्मचारी द्वारा प्रत्येक छह-छह माह में आय का घोषणा-पत्र इस शर्त के साथ लिया जाये कि यदि जांच में गैर-आनुपातिक आय पायी जाये तो उसे सेवा से बर्खास्त करने के साथ ही उसकी सारी सम्पत्ति जब्त करते हुए उससे दस गुना जुर्माना वसूल लिया जाये।

इसी के साथ डीएवीपी में सूचीब़द्ध सभी समाचार-पत्रों की प्रसार संख्या की जांच आर0एन0आई0 के माध्यम से कराई जाये फिर चाहे उसकी प्रसार संख्या पांच हजार हो अथवा पांच लाख। उसके प्रसार दावों का प्रमाण, व्यक्तिगत सी0ए0 ने दिया हो अथवा आर0एन0आई0 या ए0बी0सी0 ने।

ए0बी0सी0 तो नेक्सस है, कार्पोरेट मीडिया घरानों के संस्करणों का, तीन सौ से ऊपर सी0ए0 के समूह का, विदेशी असतित्व वाली विज्ञापन ऐजेन्सियों का, विदेशी विज्ञापन दाता कम्पनी ( जैस कोका कोला, एवं आई0टी0सी0) एवं न्यूज ऐजेन्सियों का। क्या आपको पता है कि किस तरह से इसको कम्पनीज एक्ट के सेक्शन -25 के तहत निगमित किया गया है?

आगे भी जारी..............कृपया इंतजार करें!

1 comments:

Samachar Abhimat said...

Very good,pl keep it up.

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