Thursday, 6 October 2016

अब पता लगा हीरा, कोयले की खान में ही होता है

दिल्ली से सतीश प्रधान के साथ विजय श्रीवास्तव

शुरू से लेकर आजतक ईमानदार छवि के वरिष्ठ आई0ए0एस0 अधिकारी अनिल स्वरुप ने ना सिर्फ पारदर्शी तरीके से कोयला खदानों की नीलामी की, बल्कि पूरे कोयला मंत्रालय को ही ऑनलाइन करके पारदर्शी बना दिया।
जिस कोयले की कालिख ने मनमोहन सहित पूरी सरकार को काला कर दिया था उसी कोयले से अनिल स्वरुप ने सरकार की साख को आसमान पर पहुया दिया। सीधे-साधे और सरल स्वभाव वाले अनिल स्वरुप ने ना सिर्फ पारदर्शी तरीके से कोयला खदानों की नीलामी की, बल्कि पूरे मंत्रालय को ऑनलाइन करके पारदर्शी बना
डाला।  अनिल स्वरुप की देखरेख में कोयला मंत्रालय देश का पहला मंत्रालय बन गया जहां एक नवम्बर 2016 से पूरा काम ऑनलाइन हो जायेगा। इस मंत्रालय में अभी से फाइल के माध्यम से काम होना बन्द हो गया है।
कैसे इतना बड़ा मंत्रालय पेपरलेस हो गया इसकी मिसाल आप स्वंय मंत्रालय जाकर देख सकते हैं।
दिल्ली के शास्त्री भवन के तीसरे तल से काम करने वाले कोयला सचिव अनिल स्वरुप से मिलने के लिए आपको भी ऑनलाइन आग्रह करना पड़ेगा और एस0एम0एस0 के माध्यम से ही आपको समय मिलेगा तथा उसी के माध्यम से आपका प्रवेश-पत्र बनेगा और आप कोयला सचिव से मिलेंगे। कैसा होता है मोदी सरकार का पेपरलेस दफ्तर, ये आप अब जान पायेंगे। नार्थ ब्लॉक हो या साउथ ब्लॉक, ज्यादातर बड़े अफसरों की मेज पर फाइलों के पहाड़ दिखते हैं लेकिन अनिल स्वरुप की टेबल से लेकर दफ्तर की अलमारियों तक में आप कोई फाइल नहीं देख सकते। अनिल स्वरूप का कहना है कि यहॉं सारा काम ऑनलाइन होता है और हर आदेश और निर्णय यहाँ समयबद्ध तरीके से मातहतों द्वारा किये जाते हैं। टाइम लाइन के अनुसार अगर कल 10 बजे तक मंत्रालय को कोई जवाब देना है तो 10 बजे से पूर्व ही जवाब दे दिया जाता है। आप कागज के माध्यम से दौड़ रही फाइल पर देर सवेर कर सकते हैं लेकिन पर ऑनलाइन में ये संभव नहीं है।
1981 बैच के आईएएस अधिकारी श्री अनिल स्वरूप का कहना है कि जब इस सरकार में कोल ब्लॉक नीलामी हुए तो कहीं भी विवाद नही था। इस नीलामी से सरकार को मजबूत आमदनी हुई। दरअसल नीलामी का सारा सिलसिला ऑनलाइन था। साफ है कि कागज की फाइल पर होने वाले फैसले और डिजिटल फैसलों में बहुत अंतर होता  है। किन्तु श्री स्वरुप ने पारदर्शिता सिर्फ खदानों की नीलामी में ही नही बरती। उन्होंने सरकारी खादानो से निकलने वाले हजारों करोड़ रूपए की कोयला चोरी को रोका जिससे सरकार को काफी नुक्सान पहुँचता था और कोल माफिया की अंधाधुंध कमाई होती थी। अनिल स्वरुप ने साल भर में इस अंधेरगर्दी को खत्म कर दिया। कोयला खदानों से निकलने वाले हर ट्रक में उन्होंने जीपीएस अनिवार्य कर दिया और खदानों के बाहर वीडियोग्राफी भी करवानी शुरू कर दी, जिससे कोयले से लदे ट्रकों का सारा मूवमेंट स्थापित नियंत्रण कक्ष में ऑनलाइन मॉनिटर किया जाने लगा।
नतीजा ये हुआ की कोयले की तस्करी पर विराम लग गया। समस्या चाहे बिजली उत्पादन से जुडी हो या फैक्ट्री पर पहुँचने वाले कोयले की ज्यादातर राज्यों की समस्याएँ अब तक दिल्ली के दफ्तर में बैठकर सुलझाने की कोशिश हो रही थी। अनिल स्वरुप ने इस परंपरा को भी तोड़ा। उन्होंने स्वंय दिल्ली से राज्य मुख्यालयों में जाने का बीड़ा उठाया। अगर समस्या झारखण्ड की थी तो वो अपना लैपटॉप लेकर रांची चले जाते। अगर समस्या छत्तीसगढ़ की होती तो वे अपने अफसरों के साथ रायपुर जाते। अगर किसी खदान पर कोई प्रॉब्लम होती तो वो खदान की साइट पर पहुँचते। उनका मानना है कि मौके पर पहुंचकर विवाद सुलझाने और फैसला लेने में आसानी होती है। यही नही, जॉइंट सेक्रेटरी या अन्य अधिकारी भी समस्या को जड़ से समझने लगते हैं।
कोयले के उत्पादन और आपूर्ती को लेकर पहले आये दिन पावर प्लांट बन्द हो जाते थे और इलाके के इलाके अँधेरे में डूब जाते थे। कोयले के आयात को लेकर अलग धांधलियां होती थीं।
अनिल स्वरुप ने कोयला उत्पादन में कारगर कदम उठाए और पहली बार इतना उत्पादन कर डाला की आज देश में कोयले की बिलकुल भी कमी नही है, बल्कि ये कहा जाये कि आज तो कोयला सरप्लस है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज देश में 538 मिलियन टन कोयले का उत्पादन हो रहा है जबकि पिछली सरकार में 2013-14 में सिर्फ 462 मिलियन टन कोयले का उत्पादन था। अनिल स्वरुप ने उत्पादन कैसे बढ़ाया इसके लिए उन्होंने सबसे पहले जिन इलाकों में खदानें  थीं उसे अधिग्रहित करना शुरू किया। आपको जानकार आश्चर्य होगा की 5000 हेक्टर इलाके में खदाने अधीग्रहितत कीं। उनके लिए समय पर पर्यावरण और वन की अनुमति ली और साथ ही कोयले की ढुलाई के लिए पर्याप्त रेलवे रैक्स की भी व्यवस्था की। इतनी बड़ी संख्या में पहले कभी न रेलवे रैक्स आई और ना ही इतने बड़े क्षेत्रफल को अधिग्रहित करके खदान का काम शुरू हुआ।
अनिल स्वरुप ऐसे अधिकारी हैं तो स्वंय से ज्यादा अन्य अफसरों की तारीफ करते हैं।
अपनी फेसबुक वाल पर भी वो अपनी जीवनी की जगह देश के नए-नए यंग अफसरों के साहसिक और कौशल से भरे फैसले शेयर करते हैं और उनकी हौंसला अफजाई करते हैं। इसी कड़ी में उन्होंने गोण्डा के जिलाधिकारी श्री आशुतोष निरंजन की काफी विद प्रधान की भी बहुत तारीफ करते हुए हौसला अफजाई की। दूसरों की उपलब्धियां वो अपने मित्रों से साझा करते हैं। अपनी तरह का नया और अनूठा किस्म का कार्य करने में उन्हें मजा आता है। ऐसा ही अधिकारी वित्त मंत्रालय में होना चाहिए जो विदेश में जमा कालेधन को भारत लाकर, प्रधानमंत्री की इच्छा को पूरा कर सके।
अन्त में आपको बता दूं कि श्री अनिल स्वरूप, उत्तर प्रदेश के सूचना निदेशक भी रहे हैं। यहॉं रहते हुए भी उन्होंने नये-नये कार्य किये हैं, उस समय उनसे मुलाकात के बाद मिश्री के साथ भुनी हुई सौंफ (उनके घर पर भुनी हुई) सेवन के लिए मिलती थी।

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